गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

गणित और सम-विषम का लफड़ा

गणित मेरी बचपन से ही 'कमजोर' थी। गणित से मुझे उत्ता ही 'डर' लगा करता था, जित्ता पहाड़ देखकर उस पर चढ़ने से लगता है। गणित की वजह से मैं भिन्न-भिन्न क्लासों में कित्ती ही दफा 'फेल' हुआ। पापा के थप्पड़ खाए। क्लास-टीचर की घुड़कियां सहीं। मोहल्ले वालों के ताने झेले। पर गणित को मुझ पर 'दया' न आई। फिर आखिर में थक-हारकर उसने मुझे नहीं मैंने ही उसे 'छोड़' दिया।

आलम यह है कि आज भी कोई मुझसे नौ का पहाड़ा सुनाने को कहता है तो मैं बगलें झांकने लग जाता हूं। नौ का पहाड़ा सुनाना मुझे बीवी की जली-कटी सुनने से भी कठिन लगता है। बताने में कैसे 'शर्म' कि मुझे केवल दो का पहाड़ा ही अच्छे से आता है। बाकी पहाड़े न मैंने कभी याद करे, न ही मेरे पल्ले पड़े। फिर भी, जैसे-तैसे कर-कराके काम चला लेता हूं।

अभी कल ही बेटी ने, दिल्ली की गाड़ियां अब सम और विषम नंबरों के हिसाब से चला करेंगी, के बारे में मुझसे पूछ लिया। बेटी बोली- 'पापा, सम और विषम को जरा 'डिटेल' में समझाइए।' पहले तो मैं ना-नुकूर करता रहा। कल-परसों बताने पर टाल दिया। तिस पर भी जब वो नहीं मानी तो मैंने उससे कहा- 'देखो बेटा, गणित है मेरी बचपन से कमजोर। इसलिए सम और विषम को डिटेल में तो नहीं समझा सकता। हां, 'शॉर्ट' में बता सकता हूं पर प्रोमिस करो अपनी मम्मी को नहीं बोलोगी।'

खैर, बेटी मम्मी को न बोलने की बात पर राजी हो गई। फिर मैंने उसे बताया कि 'जब तलक तुम्हारी मम्मी से मेरी शादी नहीं हुई थी, तब तक मेरी स्थिति सम थी मगर शादी होने के बाद स्थिति विषम हो गई। यानी, कभी खुशी, कभी गम। तो बेटा ठीक ऐसी ही स्थिति अब दिल्ली वालों की हो गई है। अब वे सम और विषम नंबरों की गाड़ियां ही चला पाएंगे।'

बेटी ने कहा- 'पापा, दिल्ली के मुख्यमंत्री तो बहुत 'ईमानदार' हैं। उन्हें दिल्ली वालों का ख्याल रखना चाहिए। दिल्ली में जगहें कित्ती दूर-दूर हैं न। हमारी बरेली की तरह थोड़े न कि कुतुबखाना से पैदल चलकर दस-पंद्रहा मिनट में सिविल लाइंस पहुंच गए।' हां, बात तो तेरी ठीक है बेटा। पर ईमानदारी का कुछ खामियाजा तो दिल्ली वालों को भुगतना होगा ही न। अब तो वही होगा जैसा ईमानदार मुख्यमंत्री का फरमान है।' मैंने उत्तर दिया।

वैसे ईमानदारी भी किसी गणित से कम 'कठिन' नहीं होती। ससुरी शुरू से लेकर अंत तक समझ नहीं आती। कि, ईमानदार बंदा कब क्या कर जाए। मगर कोसने से क्या फायदा। दिल्ली वालों को सम और विषम के बीच खुद को 'एडजस्ट' करना ही होगा। चाहे हंसकर करें या रोकर।
इससे तो अपनी बरेली ही भली। यहां न सम का झंझट, न विषम का चक्कर। लाइफ एकदम चकाचक।

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