बुधवार, 23 दिसंबर 2015

रजाई में लेखन

अगर रजाई न होती तो मैं लेखक भी न होता! न न हंसिए नहीं, ये सच है। देश-दुनिया में तमाम तरह के लेखक-साहित्यकार हुए हैं। लेखन का सबका अपना-अपना मिजाज रहा है। कुछ ने अपना लेखन नहा-धोकर, पैंट-शर्ट, सूट-बूट पहनकर किया तो कुछ ने रेल या हवाई यात्रा के दौरान। सभी ने अपने-अपने क्षेत्र में लेखन से पाई सफलता के झंडे गाड़े हैं।

लेखन में सफलता के झंडे तो मैंने भी गाड़े हैं पर रजाई में रहकर। जी हां मैंने अपना ज्यादातर लेखन रजाई में ही किया है। रजाई में लेखन का जो 'मजा' है, वो अन्यत्र नहीं। खासकर जाड़ों में रजाई के भीतर बैठकर लिखने में जो आनंद मिलता है, उसका जवाब नहीं। हालांकि लोग कहते हैं कि जाड़ों में चिंतन व लेखन की वाट लग जाती है मगर मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। मेरी 'क्रिएटिविटी' की बत्ती सबसे अधिक जाड़ों में ही जला करती है, रजाई के साथ।

मुझे जाड़े पसंद हैं। जाड़ों से मुझे जरा भी डर नहीं लगता। जाड़ा जित्ता अधिक पड़ता है, मेरे लेखन व चिंतन का ग्राफ उत्ता ही बढ़ता चला जाता है। रजाई में रहकर गर्मा-गर्म कॉफी पीते हुए लेखन करना स्वर्ग जित्ता सुखद है मेरे लिए। अपने लेखन का 'सर्वश्रेष्ठ' मैंने रजाई में बैठकर ही लिखा है।

पिछले पंद्रहा सालों से मेरे कने एक अदद रजाई है। इत्ते सालों में घर की जाने कित्ती ही चीजें चेंज हो गईं लेकिन रजाई नहीं बदली। रजाई बदलने के पीछे पत्नी से कित्ती ही दफा ठन भी चुकी है। बात मैयके जाने तक आ गई है। मगर मैंने साफ कह दिया- मैं एक बार को तुम्हें बदलने की सोच सकता हूं किंतु अपनी प्रिय रजाई को नहीं। रजाई में मेरा लेखन ही नहीं, मेरी जान बसती है। इसका साथ कभी नहीं छोड़ना मुझे।

अब तो मोहल्ले वाले भी रजाई को लेकर मेरी 'मजाक' बनाने लगे हैं किंतु मैं किसी की परवाह नहीं करता। केवल अपने मन की करता हूं। जिस रजाई ने मुझे लेखन में इत्ती ऊंचाईयों तक पहुंचाया, भला उसे ही बदल डालूं। क्यों...? अरे, ये तो जाड़े रहे मैं तो गर्मियों में भी अपना लेखन रजाई में रहकर ही करता हूं। गर्मियों में मेरी रजाई मुझे 'ठंडक' का एहसास कराती है।

अपनी रजाई मुझे इत्ती प्रिय है कि मैं इसे बाहर शादी-ब्याह में भी ले जाता हूं। वो क्या है कि मुझे अपनी रजाई के अलावा किसी दूसरे की रजाई में नींद ही नहीं आती। नींद का असली सुख मुझे मेरी रजाई में ही मिलता है। कभी-कभार तो रात के सफर में भी अपनी रजाई को साथ ले लेता हूं।

भला कंबल ओढ़ने वाले रजाई के सुख को क्या समझेंगे। जब भी मैंने कंबल में बैठकर चिंतन या लेखन किया, फेल ही रहा हूं। ससुरी दिमाग की बत्ती ही गोल कर देता है कंबल का बोझ। आलम ये है, जिस घर या कमरे में कंबल होते हैं, मैं वहां जाना ही पसंद नहीं करता। कंबल से मुझे उत्ती ही ऐलर्जी है, जित्ती बुद्धिजीवियों को आजकल मोदी सरकार से।

मैं तो हरदम अपनी रजाई का शुक्रिया अदा करता रहता हूं। अगर ये मेरी जिंदगी में न आई होती तो शायद मैं लेखक भी न बन पाता। लेखन के क्षेत्र में रजाई ने मुझे कभी 'घमंडी' नहीं होने दिया। हमेशा 'डाउन टू अर्थ' ही बनाए रखा। न कभी बुद्धिजीवि बनने का आईडिया दिया, न बुद्धिजीवियों के बीच बैठने को प्रेरित किया। लेखक पर जब बुद्धिजीवि होने का बुखार चढ़ जाता है फिर न वो घर का रह पाता है न घाट का। किंतु मेरे साथ ऐसा नहीं है, मैं कल भी रजाई में था, आज भी रजाई में हूं, भविष्य में भी रजाई में ही रहूंगा।

आज मैं फख्र के साथ कह सकता हूं कि हां मैं रजाई में रहकर लेखन करता हूं। रजाई मेरी दिलरूबा सरीखी है।

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