सोमवार, 7 दिसंबर 2015

ईमानदारी के प्रति नतमस्तक

तब शायद मैं 'बेवकूफ' था। मुझमें चीजों को आईने के आर-पार देखने की अक्ल ही नहीं थी। बताइए, मैं केजरीवालजी की ईमानदारी पर शक किया करता था। रात-दिन उन्हें गरियाता था। उनके साथ उनकी पार्टी का 'मजाक' उड़ता था। न जाने कित्ते ही लेख मैंने उनकी 'बुराई' में अखबारों में लिख डाले। मगर आज मुझे उन सब लिखे गए लेखों पर 'घणा अफसोस' हो रहा है। खुद को गलिया रहा हूं कि हाय! ये मैंने क्या किया।

जबकि समूचे राजनीतिक परिदृश्य में केजरीवालजी से बड़ा ईमानदार कोई है ही नहीं! चाहे तो एलईडी लाइट लेके ढूंढ सकते हैं। सिर्फ ईमानदारी के बल पर उन्होंने न केवल दिल्ली में अपनी सरकार बनाई बल्कि अपने गरीब विधायकों की सैलरी भी चौगुना करवा दी। इसे कहते हैं, पार्टी एवं अपने गरीब विधायकों के प्रति समर्पित एक कर्मठ (ईमानदार) मुख्यमंत्री।

जब से 'आप' के गरीब विधयाकों की सैलरी में चौगुना वेतन वृद्धि की खबर पढ़ी है- सच बताऊं- मेरा दिल केजरीवालजी की दया-प्रधान ईमानदारी के प्रति 'नतमस्तक' हो गया है। मुख्यमंत्री होकर अपने विधायकों के जेब खर्च एवं पापी पेट के बारे में इत्ता सिर्फ केजरीवालजी ही सोच सकते हैं। असल मायने में, अपनी पार्टी के विधायकों के 'अच्छे दिन' तो वे ही लेकर आए हैं। मोदीजी का अच्छे दिन का जुमला आखिरकार केजरीवालजी ने उनसे झटक ही लिया। बहुत-बहुत बधाई उन्हें।

कहने वाले कह रहे हैं कि केजरीवाल ने विधायकों की सैलरी चौगुना कर जनता से धोखा किया। ईमानदारी की आड़ में उन्हें ठग है। न स्वराज ला पाए, न जनलोकपाल बिल दे पाए। अरे, कुछ नहीं। लोग नादान हैं। राजनीति और ईमानदारी की समझ नहीं रखते। उन्हें पता ही नहीं हाथी के दांत की तरह ईमानदारी भी दो प्रकार की होती है। दिखाने वाली अलग, खाने वाली अलग। केजरीवालजी ने दोनों ही तरह की ईमानदारी दिखाकर अपना टेढ़ा उल्लू सीधा कर लिया। पहले ईमानदारी को दिखाया बाद में उसे ही खा लिया। क्या गलत किया? राजनीति ये सब चलता है। अगर नेता ये सब न करे तो बेचारे की भूखों मरने की नौबत आ जाए।

भला कौन मुख्यमंत्री चाहेगा कि उसके विधायक तंगहाली में जीवन बिताएं। मेट्रो-बस-ऑटो के धक्के खाएं। आखिर उनका भी परिवार है। उनकी भी भौतिक इच्छाएं हैं। ये सब ईमानदारी से नहीं केवल पैसे से ही पूरी हो सकती हैं। फिर क्या गलत किया उन्होंने- अपने विधायकों की सैलरी चौगुना कर। ध्यान रखें, राजनीति में कुर्सी मिलने के बाद जनता के हित बाद में, पहले अपने-अपनों के हित देखे जाते हैं।

देने के लिए ईमानदारी से बढ़िया दूसरी कोई गोली नहीं होती। बहलाने के लिए ईमानदारी से उम्दा कोई खिलौना नहीं होता। केजरीवालजी ने दोनों ही तरीके से इसका सद्पयोग किया। ईमानदारी के दम पर दिल्ली में सरकार बनाई। खुद मुख्यमंत्री बन बैठे। अब विधायकों की सैलरी को सीधा चौगुना कर दिया। इसे कहते हैं, हर हाथ में लड्डू देना।

आदर्श या आदर्शवाद एक सीमा तक ही भला लगता है। राजनीति, साहित्य, समाज में अगर आप सिर्फ आदर्शवाद या ईमानदारी के साथ ही जिंदगी बिताना चाहते हैं तो आप कोरे मूर्ख हैं। जमाना अब पहले जैसा नहीं रहा। आज की तारीख में सुखी वही है, जो तिकड़मबाज है। बिना तिकड़मबाजी के न रोटी मिल सकती है, न नौकरी। इस मामले में नेता बहुत समझदार होता है। वो आदर्शवाद और ईमानदारी को जनता के समक्ष अच्छे से भूनाना जानता है। जनता भी सबकुछ जानते हुए हर दफा उसके झांसे में आ जाती है। झांसे में आने के अतिरिक्त उसके कने कोई 'विकल्प' नहीं होता न।

केजरीवालजी की बुराई चाहे कित्ती भी कर लीजिए। सैलरी बढ़नी थी, बढ़ गई। दिल्ली में 'ऑड' और 'इवन' का फरमान जारी होना था, सो हो गया। करते रहिए काएं-काएं। दिल्ली सरकार मस्त है। जनता के पस्त होने की फिकर किसे है।

जब ईमानदार सरकार बनवाई है, तो उसकी ईमानदार नीतियों को झेलना तो होगा ही। हंसकर झेलें या रोकर। यह आप पर है।

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

मोदीजी का अच्छे दिन का जुमला आखिरकार केजरीवालजी ने उनसे झटक ही लिया। बहुत-बहुत बधाई उन्हें।