गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

रजाई में नया साल

देख रहा हूं, लोग बाग नई-नई जगहों पर जाकर नया साल मनाने की तैयारियां कर रहे हैं। कोई विदेश की सैर को निकल रहा है तो कोई देश में रहकर ही किसी गर्म-ठंडे प्रदेश को। कोई क्लब-पार्टी में जाम और डांस के साथ नया साल मनाने को उतावला हुआ जा रहा है। तो कोई बुरी को छोड़कर अच्छी आदतें डालने का 'संकल्प' ले रहा है। नए साल के स्वागत का क्रेज लोगों के मन-मस्तिष्क पर जुनून की माफिक तारी है।

लेकिन मैं नया साल मनाने कहीं बाहर नहीं जा रहा। पत्नी व रिश्तेदारों से साफ कह दिया है कि मैं नया साल घर पर रहकर अपनी प्यारी रजाई में ही मनाऊंगा। नए साल के जश्न के वास्ते फूंकने को न मेरे कने पैसे हैं, न टाइम। साल का स्वागत तो रजाई में रहकर भी किया जा सकता है।

इधर-उधर जाकर यहां-वहां पीकर गिर पड़ने से तो बेहतर है, अपनी रजाई में ही पड़े रहना। रजाई में बैठकर पीने का आनंद ही अलग है। कम पीयो या ज्यादा, यहां कौन टोकने वाला है। पीकर बहको या ओको करना सब रजाई में ही है। इस बहाने दुनिया की नजरों से तो बचा रहूंगा।

सुनकर हैरानी जरूर होगी। मैंने आज तलक कोई भी नया साल रजाई से इतर सेलिब्रेट नहीं किया। मित्रों ने अगर कभी जिद करी भी तो उन्हें घर पर ही बुला लिया। रजाई में रहकर नया साल मनाने के लिए। रजाई का अपना ही मजा है। रजाई में रहकर चिंतन और सेलिब्रेशन दोनों ही बड़े आराम से किए जा सकते हैं।

मेरी रजाई के मुझ पर बहुत 'एहसान' हैं। मैं कित्ती ही देर इसके भीतर बैठकर चिंतन, लेखन, मनोरंजन करता हूं, कभी बुरा नहीं मानती। बल्कि खास ख्याल रखती है कहीं मुझे ठंड न लगे। इत्ते सालों के बाद- मेरी जवानी भले ही ढल रही हो- मगर रजाई की जवानी आज भी टनाटन है। इसमें बैठकर मुझे वो सुख मिलता है, जो हिटर या ब्लोअर तक नहीं दे सकता।

एक सच यह भी है, अगर रजाई न होती तो शायद मैं लेखक भी न होता। मुझे लेखक बनाने में किसी गॉड-फादर का नहीं बल्कि रजाई का बहुत बड़ा हाथ है। मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन रजाई में रहकर ही किया है। हर तरीके से मैं मेरी रजाई का एहसानमंद हूं।

अब इत्ती प्यारी रजाई को छोड़कर नया साल मैं किसी क्लब या होटल में मनाऊं; न जी न कतई नहीं। मैं भला, मेरी रजाई भली।

नया साल मुबारक।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

जाने वाले साल को सलाम

...और कुछ घंटों बाद ये साल भी अलविदा कह लेगा। साल के साथ बिताए दिनों-लम्हों की यादें ही हमारे कने रह जाएंगी। खट्टी-मीठी बातें ही यादगार बनी रहेंगी। बिना किसी से शिकवा-शिकायत किए-रखे मेरे लिए तो ये साल 'मस्त' रहा।

मैंने तो साल भर दबाकर लिखा। लिखकर खूब कमाई की। पढ़ा भी खूब। हां, बुद्धिजीवियों की मंडली से दूर ही रहा। न किसी बुद्धिजीवि से मिलने गया, न किसी को घर बुलाया। जिंदगी को जित्ता 'आराम' से जिया और लेखन को जित्ता 'चैन' से किया जाए, उसी में मजा है। वरना खाली-पाली 'ठलुअई' करने में क्या जाता है।

देश के राजनीतिक माहौल ने 'मनोरंजन' को दोगुना कर दिया। कभी चुनावी मनोरंजन तो कभी नेताओं की आपसी तू-तू, मैं-मैं। कभी जुमलों की फेंका-फांकी तो कभी बयानों की फुलझड़ियां। देश के नेताओं ने पूरे साल इस बात का खास ख्याल रखा कि जनता के मनोरंजन में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। चाहे जन-हित में आ जाए।

साथ-साथ सहिष्णुता-असहिष्णुता पर बहस-विवाद भी 'धांसू' चली। गौरतलब ये रहा कि असहिष्णुता के डंक ने सबसे अधिक तथाकथित बुद्धिजीवियों-साहित्यकारों, फिल्मी कलाकरों को ही 'परेशान' किया। हवाबाजी में कित्तों ने ही अपने सम्मान-पुरस्कार लौटा दिए। लेकिन आम आदमी को ये सब कहीं महसूस नहीं हुआ। उसे तो केवल अपनी रोजी-रोटी से ही मतलब रहा। सही भी है, बंदा जब महानता के ग्राफ से आगे बढ़ जाता है, तब उसके नखरे भी आला-दर्जे के हो जाते हैं। अपना तो मनोरंजन यहां भी जबरदस्त हुआ।

दिल्ली की हवा प्रदूषण ने खराब कर रखी है। इसीलिए केजरीवालजी ऑड-इवन का फार्मूला लेके आए हैं। ऑड-इवन के फार्मूले पर सहमतियां कम, आलोचनाएं अधिक हो रही हैं। जिनके कने एक ही कार है, वे बेचारे दफ्तर आने-जाने की परेशानियों से कैसे जूझेंगे ये सोच-सोचकर ही दुबले हुए जा रहे हैं। उधर कार कंपनियां ये उम्मीद बांधे बैठी हैं कि शायद हमारी सेल में और बृद्धि हो जाए। ऑड-इवन की आड़ में सब अपनी-अपनी जुगाड़ तलाश रहे हैं। ये मनोरंजन भी कम दिलचस्प न है प्यारे।

महंगाई की तल्खी भी पूरे साल छाए रही। न वो, न ये इत्ते वायदों के बाद भी महंगाई पर लगाम न कस सके। विपक्ष और जनता ने महंगाई पर कुछ दिन हंगामा काटा फिर सब शांत होकर बैठ गए। सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर मनोरंजन किया सो अलग।

अच्छा, मोदी विरोधियों ने भी साल भर जमकर अपना मनोरंजन करवाया। बेचारे हर वक्त इस जुगाड़ में लग रहे कि कब मोदीजी कुछ कहें और वे लपकर हाय-हाय करने में जुट जाएं। मोदीजी भी क्या खूब निकले, उन्होंने अचानक से पाकिस्तान पहुंचकर न केवल नवाज शरीफ बल्कि विरोधियों को भी चारों-खाने चित्त कर दिया। विरोधी अब घणी मुसीबत में हैं कि कहें तो क्या कहें। यह गुजरते साल का सबसे 'मनोरंजक सीन' रहा। क्यों प्यारे।

खैर, साल भर जो-जैसा घटा कुछ मीठा, कुछ कड़वा रहा। मगर मनोरंजन कायम रहा। मनोरंजन ही जिंदगी है। बाकी में क्या रखा है।

अब तो बस जाते हुए साल को 'सलाम' कहने का दिल है। और आने वाले साल का स्वागत।

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

जो लिखा सर्वश्रेष्ठ लिखा

चंद रोज पहले एक परम-मित्र ने मुझसे पूछा- 'यार, साल 2015 का अपना लिखा कोई 'सर्वश्रेष्ठ' व्यंग्य बताओ? मैंने कहा- 'इत्ते लिखे व्यंग्यों में किसी एक को 'सर्वश्रेष्ठ' बताना मेरे तईं बहुत कठिन है। मेरे लिए मेरा लिखा सबकुछ सर्वश्रेष्ठ ही है। सर्वश्रेष्ठ से नीचे मैं कुछ लिखता ही नहीं।'

मेरी सुनकर मित्र थोड़ा सकुचाया-मुस्कुराया। फिर बोला- 'तूने तो अपने संपूर्ण लेखन को ही सर्वश्रेष्ठ करार दे दिया। यानी, अपना आकलन एवं मूल्याकंन खुद ही। गजब।' मैंने उसे समझाया- 'प्यारे, मैं अपने लेखन का आकलन या मूल्याकंन दूसरों से करवाने में यकीन नहीं रखता। 'बाल की खाल' न दूसरों की निकालता हूं, न खुद की निकालने देता हूं। सर्वश्रेष्ठ हूं। सर्वश्रेष्ठ से कमतर कुछ लिखता नहीं।'

अबकी दफा मित्र अपने माथे पर थोड़ा बल रखकर बोला- 'वाह! खुद को महान कहने का बड़ा शौक है तुझे। ऐसा तो कभी न परसाई, न जोशी, न प्रेमचंद, न रेणु ने अपने बारे में नहीं कहा। लोगों ने ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ और उनके लेखन को 'महान' बनाया।' मैंने उसकी गलती को सुधारते हुए कहा- 'पहली बात इत्ते बड़े-बड़े लेखकों से मेरी तुलना ही गलत है। उन्होंने अपना लिखकर महानता हासिल की, मैं अपना लिखकर कर रहा हूं। भले ही उन्होंने अपने लेखन को सर्वश्रेष्ठ न कहा हो पर मैं अपने बारे में कह रहा हूं। खुद के बारे में कुछ भी राय रखना, ये मेरा लोकतांत्रिक अधिकार है मियां।'

मित्र लगभग खीझते हुए बोला- 'अगर ऐसा ही है तो तेरे लेखन में सर्वश्रेष्ठ जैसा कुछ है ही नहीं, जिसकी तू इत्ती तारीफ कर रहा है। तू एकदम 'कूड़ा' लिखता है। तेरे लेखन में न धीरता है, न गंभीरता, न ही सुंदरता।'

सच बोलूं तो मेरे लेखन पर खीझने वाले लोग मुझे बेहद पसंद हैं। इसीलिए मैं मेरे परम-मित्र की जली-कटी पर रत्तीभर नाराज न हुआ। इत्मिनान से जवाब दिया। 'प्यारे, तेरा तहे-दिल से शुक्रिया कि तुझे मेरा लिखा कूड़ा लगा। अब गर्व के साथ कह सकता हूं कि मैं 'सर्वश्रेष्ठ कूड़ा' लिखता हूं! शायद यही वजह है कि मेरी अब तलक न कोई किताब है, न अंटी में कोई पुरस्कार। किताब और पुरस्कार के लिए जुगाड़ वे बैठाते हैं, जिन्हें अपने तईं किसी छोटे-बड़े सम्मान को हासिल करना होता है। मेरे लिए तो मेरा लिखा ही सबकुछ है। तेरे साथ-साथ पाठकों का धन्यवाद कि वे मुझे पढ़ते हैं। उनकी आलोचना और प्रशंसा दोनों के प्रति नतमस्तक हूं।'

लगे हाथ मैंने उसे ये भी बता दिया कि 'व्यंग्य में अगर गंभीरता और धीरता को घुसेड़ दूंगा फिर व्यंग्य किस काम का रह जाएगा? व्यंग्य का मतलब ही है, मीठी छुरी से मीठा वार करना ताकि सामने वाले की सुलगे तो मगर मीठास के साथ। इसी में व्यंग्य-लेखन का मजा है।'

लगा कि मेरे प्रवचनों सुनकर मित्र काफी पक गया है सो उसके मूड को थोड़ा 'लाइट' किया- 'चार बोतल वोदका, काम मेरा रोज का...' गाना दिखाकर। कुछ देर बाद मित्र मूड में आ गया और बोला- 'ये गाना भी तेरे लेखन जित्ता ही सर्वश्रेष्ठ है!' तुरंत सवाल दागा- 'यार, तू फिल्मों में गाने क्यों नहीं लिखता? बड़ा स्कोप है। कहें तो बात करवाऊं, मेरी जुगाड़ है वहां।'

मैंने कहा- 'नहीं प्यारे मैं मेरे व्यंग्य-लेखन से ही संतुष्ट हूं। चादर से बाहर पैर पसारने की आदत नहीं मुझे। तुझ जैसे सुधि पाठक मुझे पढ़कर राय दे देते हैं, मेरे तईं बहुत है। शिकायत किसी से रखता नहीं हूं। मस्ती के साथ जिंदगी और लेखन को जीता हूं। तेरे प्रपोजल का शुक्रिया।'

मित्र ने 'मेरी बात का बुरा न मानना यार...' कहते हुए मुझे 2016 की शुभकामनाएं देते हुए विदा ली। मैं भी उसे शुभकामनाएं देने के बाद अपने सर्वश्रेष्ठ लेखन में जुट गया।

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

असहिष्णुता पर छिड़ा अजीबो-गरीब दंगल

डरे सिर्फ आमिर खान या उनकी पत्नी ही नहीं हैं, डर मैं भी गया हूं। और, इत्ता डर गया हूं कि सड़क चलते अगर कोई मुझसे कहीं का पता ही पूछने लगता है, तो 'घबराकर' बता नहीं पाता। मन में तुरंत यह 'डर' घर कर जाता है कि सही पता बताने के बावजूद अगला मुझे कहीं 'असहिष्णु' न समझ ले। असहिष्णुता के डर ने हमारे आस-पास ऐसा माहौल बना दिया है कि अब तो बाहर वालों की छोड़िए पत्नी की बात काट में ही डर लगता है। क्या पता कब पत्नी मुझे असहिष्णु घोषित कर गरिया दे!

असहिष्णुता पर छिड़ी तकरार दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जा रही है। सड़क, चौराहे, दफ्तर, घर पर अब सामाजिक या परिवारिक मुद्दों पर बात कम असहिष्णुता पर बहस ज्यादा होती है। अब तो लोग फेसबुक, टि्वटर, वाह्ट्एप पर एक-दूसरे का हाल-चाल बाद में पूछते हैं, पहले असहिष्णुता के मुद्दे पर सामने वाले की 'राय' जानना चाहते हैं। अगले की राय अगर उनकी राय से मेल खाती है तो ठीक; नहीं तो दे गाली, दे गाली, दे गाली...।

यानी, असहमति का मतलब अब गालियां हो गई हैं। लोगों के बीच अपने नायकों के प्रति 'भक्तिभाव' जरूरत से ज्यादा ही बढ़ गया है। यही वजह है कि मैं किसी को भी किसी भी मुद्दे पर अपनी राय न देता हूं न उनकी राय लेता हूं। जो दिल में होता है, उसे लिखकर खुद को हल्का कर लेता हूं। आजकल का जमाना कुछ ऐसा ही है प्यारे- न किसी से हिलगो, न किसी को हिलगाओ। कानों में तेल डाले और आंखों पर पट्टी बांधे जो चल रहा है, यों ही चलते रहने दो।

डर के साथ-साथ असहिष्णुता अब 'मनोरंजन' या 'हिट' होने का सबब भी बनती जा रही है। जिनके कने कुछ नहीं है, वे असहिष्णुता पर ही बेतुके बयान दे-देकर मस्त फिरकी लेने में लगे हैं। टीवी चैनल वाले रात-दिन उन्हीं के बयानों पर डिबेट चला रहे हैं। डिबेट में भी खास कुछ होता नहीं। दो भिन्न पार्टियों के नेता आधा घंटे तक एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते हैं। बेचारा दर्शक क्या करे, वो भी उनकी लड़ाई-भिड़ाई का असहिष्णुता के बहाने घर बैठे मनोरंजन करता रहता है। सड़क पर आनकर खुलकर बोल नहीं सकता। क्या पता कौन सी पार्टी या नेता उसे भी असहिष्णु घोषित कर दे।

पहले मैं रात में 'रंगीन सपने' आने से परेशान रहता था, अब मुझे 'असहिष्णुता' के सपने आते हैं। कल रात का सपना तो बहुत ही भयानक था। मैंने देखा कि पत्नी ने मुझे इस वजह से तलाक देने की घमकी दी है क्योंकि मैंने उसे आईफोन दिलवाने से मना कर दिया था। उसने तुरंत मुझे असहिष्णु पति कहते हुए तलाक देने की घमकी दे डाली। कल रात से मैं इत्ता डरा हुआ हूं कि आज का पूरा दिन 'तलाक के बाद मेरा क्या होगा' इसी सोच में बीत गया। हालांकि वो मात्र सपना ही था। पर पत्नी के मूड का क्या भरोसा कब सेंसेक्स की माफिक बदल जाए!

काबिल लोग हालांकि बार-बार यह कहकर 'सांत्वता' दे रहे हैं कि देश-समाज का माहौल जरा भी असहिष्णु नहीं है। यहां हर कोई 'आराम' से रह सकता है। हम एक 'सहिष्णु मुल्क' हैं। अफवाहों पर ध्यान न दें। मानना तो मेरा भी यही है कि असहिष्णुता जैसा यहां कुछ भी नहीं। मगर बयानवीरों का क्या कीजिएगा, वो तो पिद्दी भरी बात पर ही ऐसा करारा बयान दे डालते हैं कि भीतर तलक सुलग जाती है। बात-बात में तो पाकिस्तान चले जाने की धमकी दे डालते हैं। अब आप ही बताओ कि डर लगेगा कि नहीं? आखिर असहमति-आलोचना का भी तो 'सम्मान' होना चाहिए न। इस बात पर तो राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक अपनी मोहर लगा चुके हैं। किंतु दिलजलों कौन समझाए?

रही बात आमिर खान की तो उन्हें अपनी पत्नी की बात अपने तक ही सीमित रखनी चाहिए थी। काहे भरी सभा में यह सब उगल दिया। अगर ये सब उन्होंने असहिष्णुता पर फिरकी लेने या फिर अपनी आने वाली फिल्म 'दंगल' में मंगल करवाने के लिए कहा तो बात अलग है। मगर समाज का सेंटिमेंट भी तो उन्हें समझना चाहिए न। पहले माहौल कुछ और था, अब कुछ और है।

असहिष्णुता पर छड़ा दंगल चाहे कोई-कैसा भी एंगल ले ले पर हमें इस बात पर 'संतोष' करना चाहिए कि देश-समाज में 'सहिष्णु' लोग भी रहते हैं।

किस्मत हो तो सल्लू मियां जैसी

मां कसम खून खौल जाता है अगर मुझे कोई लेखक कहकर पुकार ले। मन करता है कहने वाले के मुंह में लाल मिर्ची भर दूं। और प्रोमिस लूं कि अब कभी मुझे वो लेखक कहकर नहीं बुलाएगा। चाहे गुंडा, मवाली, चोर, उचक्का कुछ कह ले मगर लेखक न कहे।

अब तो लेखक शब्द से ही मुझे एलर्जी-सी होने लगी है। दो-चार व्यंग्य-श्यंग्य क्या लिख दिए, यहां वहां क्या छप-छपा गए कि लेखक होने का ठप्पा लग गया। लेखक होकर कमाया क्या, यह कोई नहीं पूछता। न न इज्जत और नाम की बात न कीजिएगा। अमां, इज्जत और नाम तो बदनाम लोग खूब कमा लेते हैं। नाम के साथ-साथ 'धाक' जमाते हैं सो अलग। शहर और मोहल्ले में 'सिक्का' चलता है उनका। लोग भाई-भाई कहकर इज्जत के साथ बुलाते हैं।

और एक मैं हूं न ढंग से मोहल्ले वाले जाते हैं न शहर-परिवार वाले। कभी-कभी तो पत्नी तक फुक्का-लेखक कहकर मजाक उड़ा डालती है। ताना मारकर कहती है- 'तुम अपने लेखन के दम पर एक ढंग का फोन तक तो मुझे दिलवा न पाए। क्या खाक बड़े लेखक हो! अरे, तुमसे भले तो नेता-अभिनेता लोग हैं। देखा है कभी उनकी पत्नियों को कित्ते ऐश से रहती हैं। बात मुंह से निकलने की देरी होती है और चीज हाजिर। एक तुम हो, सुबह से लेकर रात तक पन्ने काले-नीले करते रहते हो और बदले में मिलता क्या है ठेंगा।'

हालांकि पत्नी के ताने चूभते बहुत विकट हैं पर कभी-कभी उसकी कही बात ठीक लगती है। यह बात सही है, लेखक आप चाहे कित्ते भी बड़े या वरिष्ठ क्यों न हो लो पर कमाई उत्ती नहीं हो पाती। अपवाद को जाने दें पर सच यही है। लेखक का स्टेटस लेखक से ऊपर कभी नहीं उठ पाता। भले ही अपनी पीठ खुद चाहे वो कित्ती ही थपथपा ले।

जब से सल्लू मियां के बरी होने की खबर पत्नी को लगी है, उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं। बता दूं- मेरी पत्नी सल्लू मियां की बहुत बड़ी फैन है। हमारे बेडरूम में मेरी जगह सल्लू मियां की फोटू टांगकर रखती है। उस दिन मुझे हड़काते हुए कह रही थी- 'देखा तुमने सल्लू मियां बच गए। बचते क्यों नहीं, आखिर रूतबे का कुछ तो असर होना था न। इसे कहते हैं, सिक्का जमाके चलाना। सबके सब देखते रह गए और सल्लू मियां बेदाग निकल आए।'

जरूरी समझते हुए पत्नी को बीच में टोकते हुए मैंने कहा- 'लेकिन ये हुआ गलत। न्याय सबके साथ समान होना चाहिए। भेदभाव नहीं।' पत्नी ने आंखे तरेरी और बोली- 'क्या न्याय-फ्याय की रट लगाए हुए हो। जमाना बहुत बदल गया है। अब सबकुछ 'पैसा' है। जिसके कने पैसा खरच करने की कुव्वत है, यहां बस वही टिका रह सकता है। पैसे में बहुत ताकत होती है। ज्यादा दूर क्यों जाते हो, अपने को ही देख लो न, लेखक बनकर नाम भले ही कमाया हो पर पैसा तो नहीं कमाया न। दुनिया 'आदर्शवाद' से नहीं, सिर्फ पैसे और पैसे से ही चलती है। बात कड़वी है मगर है खरी।'

प्रैक्टिकली पत्नी कड़वा मगर सही कह रही थी। सारा खेल है पैसे का ही। इधर सल्लू मियां के बरी होने पर मिठाइयां बांटी जा रही थीं। उनके प्रशंसक ढोल-ताशे बजा रहे थे। उधर पीड़ित परिवारों के दिलों पर क्या गजरी, कोई पूछने वाला नहीं। यही तो फर्क है अमीरी-गरीबी के बीच चलने वाले न्याय का।

इसीलिए तो कभी-कभी लगता है कि बेकार ही लेखक हो गया। इससे अच्छा तो नेता या अभिनेता होता। कम से कम नाम-पैसा-रूतबा सब जेब में तो होता। पत्नी भी खुश रहती। जिंदगी एकदम ताने और तनाव से मुक्त टनाटन चल रही होती। मगर सबकी 'किस्मत' सल्लू मियां जैसी थोड़े न होती है प्यारे। है कि नहीं...।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

गणित और सम-विषम का लफड़ा

गणित मेरी बचपन से ही 'कमजोर' थी। गणित से मुझे उत्ता ही 'डर' लगा करता था, जित्ता पहाड़ देखकर उस पर चढ़ने से लगता है। गणित की वजह से मैं भिन्न-भिन्न क्लासों में कित्ती ही दफा 'फेल' हुआ। पापा के थप्पड़ खाए। क्लास-टीचर की घुड़कियां सहीं। मोहल्ले वालों के ताने झेले। पर गणित को मुझ पर 'दया' न आई। फिर आखिर में थक-हारकर उसने मुझे नहीं मैंने ही उसे 'छोड़' दिया।

आलम यह है कि आज भी कोई मुझसे नौ का पहाड़ा सुनाने को कहता है तो मैं बगलें झांकने लग जाता हूं। नौ का पहाड़ा सुनाना मुझे बीवी की जली-कटी सुनने से भी कठिन लगता है। बताने में कैसे 'शर्म' कि मुझे केवल दो का पहाड़ा ही अच्छे से आता है। बाकी पहाड़े न मैंने कभी याद करे, न ही मेरे पल्ले पड़े। फिर भी, जैसे-तैसे कर-कराके काम चला लेता हूं।

अभी कल ही बेटी ने, दिल्ली की गाड़ियां अब सम और विषम नंबरों के हिसाब से चला करेंगी, के बारे में मुझसे पूछ लिया। बेटी बोली- 'पापा, सम और विषम को जरा 'डिटेल' में समझाइए।' पहले तो मैं ना-नुकूर करता रहा। कल-परसों बताने पर टाल दिया। तिस पर भी जब वो नहीं मानी तो मैंने उससे कहा- 'देखो बेटा, गणित है मेरी बचपन से कमजोर। इसलिए सम और विषम को डिटेल में तो नहीं समझा सकता। हां, 'शॉर्ट' में बता सकता हूं पर प्रोमिस करो अपनी मम्मी को नहीं बोलोगी।'

खैर, बेटी मम्मी को न बोलने की बात पर राजी हो गई। फिर मैंने उसे बताया कि 'जब तलक तुम्हारी मम्मी से मेरी शादी नहीं हुई थी, तब तक मेरी स्थिति सम थी मगर शादी होने के बाद स्थिति विषम हो गई। यानी, कभी खुशी, कभी गम। तो बेटा ठीक ऐसी ही स्थिति अब दिल्ली वालों की हो गई है। अब वे सम और विषम नंबरों की गाड़ियां ही चला पाएंगे।'

बेटी ने कहा- 'पापा, दिल्ली के मुख्यमंत्री तो बहुत 'ईमानदार' हैं। उन्हें दिल्ली वालों का ख्याल रखना चाहिए। दिल्ली में जगहें कित्ती दूर-दूर हैं न। हमारी बरेली की तरह थोड़े न कि कुतुबखाना से पैदल चलकर दस-पंद्रहा मिनट में सिविल लाइंस पहुंच गए।' हां, बात तो तेरी ठीक है बेटा। पर ईमानदारी का कुछ खामियाजा तो दिल्ली वालों को भुगतना होगा ही न। अब तो वही होगा जैसा ईमानदार मुख्यमंत्री का फरमान है।' मैंने उत्तर दिया।

वैसे ईमानदारी भी किसी गणित से कम 'कठिन' नहीं होती। ससुरी शुरू से लेकर अंत तक समझ नहीं आती। कि, ईमानदार बंदा कब क्या कर जाए। मगर कोसने से क्या फायदा। दिल्ली वालों को सम और विषम के बीच खुद को 'एडजस्ट' करना ही होगा। चाहे हंसकर करें या रोकर।
इससे तो अपनी बरेली ही भली। यहां न सम का झंझट, न विषम का चक्कर। लाइफ एकदम चकाचक।

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

रजाई में लेखन

अगर रजाई न होती तो मैं लेखक भी न होता! न न हंसिए नहीं, ये सच है। देश-दुनिया में तमाम तरह के लेखक-साहित्यकार हुए हैं। लेखन का सबका अपना-अपना मिजाज रहा है। कुछ ने अपना लेखन नहा-धोकर, पैंट-शर्ट, सूट-बूट पहनकर किया तो कुछ ने रेल या हवाई यात्रा के दौरान। सभी ने अपने-अपने क्षेत्र में लेखन से पाई सफलता के झंडे गाड़े हैं।

लेखन में सफलता के झंडे तो मैंने भी गाड़े हैं पर रजाई में रहकर। जी हां मैंने अपना ज्यादातर लेखन रजाई में ही किया है। रजाई में लेखन का जो 'मजा' है, वो अन्यत्र नहीं। खासकर जाड़ों में रजाई के भीतर बैठकर लिखने में जो आनंद मिलता है, उसका जवाब नहीं। हालांकि लोग कहते हैं कि जाड़ों में चिंतन व लेखन की वाट लग जाती है मगर मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। मेरी 'क्रिएटिविटी' की बत्ती सबसे अधिक जाड़ों में ही जला करती है, रजाई के साथ।

मुझे जाड़े पसंद हैं। जाड़ों से मुझे जरा भी डर नहीं लगता। जाड़ा जित्ता अधिक पड़ता है, मेरे लेखन व चिंतन का ग्राफ उत्ता ही बढ़ता चला जाता है। रजाई में रहकर गर्मा-गर्म कॉफी पीते हुए लेखन करना स्वर्ग जित्ता सुखद है मेरे लिए। अपने लेखन का 'सर्वश्रेष्ठ' मैंने रजाई में बैठकर ही लिखा है।

पिछले पंद्रहा सालों से मेरे कने एक अदद रजाई है। इत्ते सालों में घर की जाने कित्ती ही चीजें चेंज हो गईं लेकिन रजाई नहीं बदली। रजाई बदलने के पीछे पत्नी से कित्ती ही दफा ठन भी चुकी है। बात मैयके जाने तक आ गई है। मगर मैंने साफ कह दिया- मैं एक बार को तुम्हें बदलने की सोच सकता हूं किंतु अपनी प्रिय रजाई को नहीं। रजाई में मेरा लेखन ही नहीं, मेरी जान बसती है। इसका साथ कभी नहीं छोड़ना मुझे।

अब तो मोहल्ले वाले भी रजाई को लेकर मेरी 'मजाक' बनाने लगे हैं किंतु मैं किसी की परवाह नहीं करता। केवल अपने मन की करता हूं। जिस रजाई ने मुझे लेखन में इत्ती ऊंचाईयों तक पहुंचाया, भला उसे ही बदल डालूं। क्यों...? अरे, ये तो जाड़े रहे मैं तो गर्मियों में भी अपना लेखन रजाई में रहकर ही करता हूं। गर्मियों में मेरी रजाई मुझे 'ठंडक' का एहसास कराती है।

अपनी रजाई मुझे इत्ती प्रिय है कि मैं इसे बाहर शादी-ब्याह में भी ले जाता हूं। वो क्या है कि मुझे अपनी रजाई के अलावा किसी दूसरे की रजाई में नींद ही नहीं आती। नींद का असली सुख मुझे मेरी रजाई में ही मिलता है। कभी-कभार तो रात के सफर में भी अपनी रजाई को साथ ले लेता हूं।

भला कंबल ओढ़ने वाले रजाई के सुख को क्या समझेंगे। जब भी मैंने कंबल में बैठकर चिंतन या लेखन किया, फेल ही रहा हूं। ससुरी दिमाग की बत्ती ही गोल कर देता है कंबल का बोझ। आलम ये है, जिस घर या कमरे में कंबल होते हैं, मैं वहां जाना ही पसंद नहीं करता। कंबल से मुझे उत्ती ही ऐलर्जी है, जित्ती बुद्धिजीवियों को आजकल मोदी सरकार से।

मैं तो हरदम अपनी रजाई का शुक्रिया अदा करता रहता हूं। अगर ये मेरी जिंदगी में न आई होती तो शायद मैं लेखक भी न बन पाता। लेखन के क्षेत्र में रजाई ने मुझे कभी 'घमंडी' नहीं होने दिया। हमेशा 'डाउन टू अर्थ' ही बनाए रखा। न कभी बुद्धिजीवि बनने का आईडिया दिया, न बुद्धिजीवियों के बीच बैठने को प्रेरित किया। लेखक पर जब बुद्धिजीवि होने का बुखार चढ़ जाता है फिर न वो घर का रह पाता है न घाट का। किंतु मेरे साथ ऐसा नहीं है, मैं कल भी रजाई में था, आज भी रजाई में हूं, भविष्य में भी रजाई में ही रहूंगा।

आज मैं फख्र के साथ कह सकता हूं कि हां मैं रजाई में रहकर लेखन करता हूं। रजाई मेरी दिलरूबा सरीखी है।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

भई मैं तो डरता हूं

पक्का फेंकते हैं वो लोग जो यह कहते हैं कि 'हम किसी से नहीं डरते'। कुछ ज्यादा या कम 'डरते' तो सभी हैं मगर खुलकर कहने में कतराते हैं। 'हम डरते हैं' कहने में नाक कटने का खतरा रहता है न। इंसान अपनी नाक बचाने की खातिर क्या-क्या जुगत नहीं लड़ता किसी से छिपा नहीं। इसीलिए डर के ऊपर 'हम किसी से नहीं डरते' का मुल्लमा चढ़ा दिया जाता है। ताकि दुनिया की निगाह में छवि जंग-बहादुर टाइप बनी रहे।

पहले मुझे भी इस बात का घणा गुमान था कि 'मैं किसी से नहीं डरता'। चाहे खुदा ही क्यों न सामने आ जाए, खुल्ला कह दूंगा- मैं तुमने नहीं डरता। लेकिन जब शादी हुई। घर में पत्नी(जी) आईं। उनके साथ समय बिताने का मौका मिला। तब से मेरे दिमाग से 'मैं किसी से नहीं डरता' का भूत बहुत तेजी से उतर गया। उतरते-उतरते आज इस स्तर तक पहुंच गया है कि अगर मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े होकर कोई किसी को आवाज भी देता है तो भी मैं 'डर' जाता हूं। ऐसा महसूस होता कि पत्नी(जी) पुकार रही हैं।

जानता हूं, हंस रहे होंगे आप मुझ पर कि ये कैसा पति है जो पत्नी से डरता है। ये हाल- अपवाद को छोड़ दें- एक मेरा ही नहीं दुनिया भर के सारे पतियों का है। बाहर चाहे वो कित्ते ही बड़े 'हिटलर' बने घूमते हों पर घर में 'भीगी बिल्ली' ही बने रहते हैं। पत्नी के आगे उनकी 'हिटलरशाही' कतई नहीं चल पाती। लेकिन कहने से कतराते हैं कि वो अपनी पत्नी से डरते हैं।

आमिर खान ने भी पिछले दिनों 'डर लगता है' वाली बात अपनी मर्जी से थोड़े न पत्नी के डर की वजह से बोली थी। मगर उसे क्या मालूम था, डर का रायता इत्ती फैलेगा कि संभालना मुश्किल पड़ेगा। वैसे, पत्नी की भावनाओं में आकर जो पति बह गया, फिर बचना कठिन हो जाता है। व्यक्तिगत अनुभव है इसलिए बता रहा हूं। फिर न कहिएगा कि बताया नहीं।

आजकल डर बहुत जोर मारे हुए है। जिस सेलिब्रिटी को देखो, बड़े ही बोल्ड अंदाज में कहता मिल जाता है कि 'मैं किसी से नहीं डरता'। मानो, सेलिब्रिटियों ने डर पर अपना कॉपीराइट ठोक दिया हो। अभी हाल केजरीवालजी भी यही बोले थे कि 'वो किसी से नहीं डरते'। हालांकि शाम होते-होते उनका डर छुमंतर-सा हो गया। मगर 'नहीं डरता हूं' कहकर मीडिया के बीच अपना चेहरा तो चकमा ही लिया न।

'डर के आगे जीत' के जमाने अब निपट लिए। सुखी वही है, जो डर कर रहता है। डर ही डर में पर्दे से पीछे से अपना उल्लू सीधा करता रहता है। दुनिया को ऐसा दिखाओ कि तुम बहुत डरते हो पर भीतर से निडर बने रहो। अगर सीधे रास्ते पर चलोगे तो दुनिया बेवकूफ कहेगी। समझदारी इसी में है कि टेढ़े रास्ते पर चलो। सलमान का रास्ता टेढ़ा जरूर था पर अंत में जीता वही। उसने कभी ये नहीं कहा कि 'मैं किसी से नहीं डरता'।

डर चाहे पत्नी का हो या बॉस का मन में बनाएं रखें। डर को डर से मत देने में ही तो मजा है। अगर डर न होता तो सेलिब्रिटियों को 'हम किसी से नहीं डरते' जैसा जुमला छेड़ने का मौका कहां मिलता?

जो डर गया, वो हिट हो गया। क्या समझे...।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

मुझे भी कुछ दान करना है

जब से मार्क जकरबर्ग के पिता बनने पर अपने 99 फीसद शेयर दान करने की खबर पढ़ी है, मेरा दिल भी 'कुछ' दान करने को मचल उठा है। लेकिन 'कुछ' क्या दान करूं, यह तय नहीं कर पा रहा। ऐसा नहीं है कि मेरे कने दान करने को कुछ नहीं। है बहुत कुछ पर समझ में नहीं आ पा रहा, क्या करूं?

दिमाग पर काफी देर तलक जोर डालने के बाद एक चीज ध्यान में आई है, जिसे मैं दान कर सकता हूं। मगर थोड़ी अड़चन है। वो क्या है, उस चीज को बहुत लंबे समय से मैंने इस्तेमाल नहीं किया है इसलिए मिलने में कठिनाई हो रही है। वैसे खोजने से तो सुई भी आराम से मिल सकती है। पर सबसे बड़ी बात तो खोजना है न।

मुझ जैसा आलसी व्यक्ति भीड़ में पत्नी के गुम हो जाने को जब नहीं खोज पाता फिर उस चीज को क्या खोज पाऊंगा, जिसे मेरा दिल दान करने की सोच रहा है। क्यों न उस चीज को खोजने के लिए मैं अमेरिकी खोजी एजेंसी की सहायता ही ले लूं! अपनी खोज को अमेरिकी खोजी एजेंसी के सुपुर्द कर, देश-समाज-बिरादरी में मेरा रूतबा बढ़ेगा सो अलग। अरे, जब अमेरिकी लोग पाकिस्तान में छिपे ओसामा बिन लादेन को खोजकर टपका सकते हैं, फिर मेरी चीज को खोजना तो उनके बाएं हाथ का गेम होगा।

खैर, आप लोगों की तसल्ली के लिए बता देता हूं कि मैं दान क्या करना चाहता हूं। दरअसल, मैं मेरी 'कलम' दान करना चाहता हूं। मुझ जैसा लेखक कलम के सिवाय और दान भी क्या कर सकता है। चूंकि बहुत लंबे समय से मैंने कलम का इस्तेमाल बंद कर दिया है, इसलिए उसे कहां रखकर भूल गया हूं, यह अब मुझे भी याद नहीं। जब से कलम की जगह की-बोर्ड ने ली है, तब से हाथ से लिखना न के बराबर हो गया है। आलम ये है कि अब तो कलम से अपना नाम लिखने के लिए भी जोर-आजमाइश करनी पड़ती है। आदत छूट गई है न।

पहले लेखक लोग कलम से 'क्रांति' किया करते थे, अब की-बोर्ड से कर लेते हैं। अंतर केवल इत्ता ही आया है। स्कूल जाने वाला बच्चा भी अब कलम की जगह पहले की-पैड मांगता है। ऐसे में लाजिमी है, कलम का खो जाना।

फिलहाल, खोज-बीन में- अमेरिकी खोजी ऐजेंसी के साथ- मैं भी लगा हुआ हूं। जैसे ही मिल जाती है, उसे दान कर दूंगा। फिर मेरा रूतबा भी मार्क जकरबर्ग जित्ता हो जाएगा।

दुनिया की निगाह में 'महान' बनने के लिए अगर कुछ दान करना पड़े तो कोई हर्ज नहीं। क्यों ठीक है न...।

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

ईमानदारी के प्रति नतमस्तक

तब शायद मैं 'बेवकूफ' था। मुझमें चीजों को आईने के आर-पार देखने की अक्ल ही नहीं थी। बताइए, मैं केजरीवालजी की ईमानदारी पर शक किया करता था। रात-दिन उन्हें गरियाता था। उनके साथ उनकी पार्टी का 'मजाक' उड़ता था। न जाने कित्ते ही लेख मैंने उनकी 'बुराई' में अखबारों में लिख डाले। मगर आज मुझे उन सब लिखे गए लेखों पर 'घणा अफसोस' हो रहा है। खुद को गलिया रहा हूं कि हाय! ये मैंने क्या किया।

जबकि समूचे राजनीतिक परिदृश्य में केजरीवालजी से बड़ा ईमानदार कोई है ही नहीं! चाहे तो एलईडी लाइट लेके ढूंढ सकते हैं। सिर्फ ईमानदारी के बल पर उन्होंने न केवल दिल्ली में अपनी सरकार बनाई बल्कि अपने गरीब विधायकों की सैलरी भी चौगुना करवा दी। इसे कहते हैं, पार्टी एवं अपने गरीब विधायकों के प्रति समर्पित एक कर्मठ (ईमानदार) मुख्यमंत्री।

जब से 'आप' के गरीब विधयाकों की सैलरी में चौगुना वेतन वृद्धि की खबर पढ़ी है- सच बताऊं- मेरा दिल केजरीवालजी की दया-प्रधान ईमानदारी के प्रति 'नतमस्तक' हो गया है। मुख्यमंत्री होकर अपने विधायकों के जेब खर्च एवं पापी पेट के बारे में इत्ता सिर्फ केजरीवालजी ही सोच सकते हैं। असल मायने में, अपनी पार्टी के विधायकों के 'अच्छे दिन' तो वे ही लेकर आए हैं। मोदीजी का अच्छे दिन का जुमला आखिरकार केजरीवालजी ने उनसे झटक ही लिया। बहुत-बहुत बधाई उन्हें।

कहने वाले कह रहे हैं कि केजरीवाल ने विधायकों की सैलरी चौगुना कर जनता से धोखा किया। ईमानदारी की आड़ में उन्हें ठग है। न स्वराज ला पाए, न जनलोकपाल बिल दे पाए। अरे, कुछ नहीं। लोग नादान हैं। राजनीति और ईमानदारी की समझ नहीं रखते। उन्हें पता ही नहीं हाथी के दांत की तरह ईमानदारी भी दो प्रकार की होती है। दिखाने वाली अलग, खाने वाली अलग। केजरीवालजी ने दोनों ही तरह की ईमानदारी दिखाकर अपना टेढ़ा उल्लू सीधा कर लिया। पहले ईमानदारी को दिखाया बाद में उसे ही खा लिया। क्या गलत किया? राजनीति ये सब चलता है। अगर नेता ये सब न करे तो बेचारे की भूखों मरने की नौबत आ जाए।

भला कौन मुख्यमंत्री चाहेगा कि उसके विधायक तंगहाली में जीवन बिताएं। मेट्रो-बस-ऑटो के धक्के खाएं। आखिर उनका भी परिवार है। उनकी भी भौतिक इच्छाएं हैं। ये सब ईमानदारी से नहीं केवल पैसे से ही पूरी हो सकती हैं। फिर क्या गलत किया उन्होंने- अपने विधायकों की सैलरी चौगुना कर। ध्यान रखें, राजनीति में कुर्सी मिलने के बाद जनता के हित बाद में, पहले अपने-अपनों के हित देखे जाते हैं।

देने के लिए ईमानदारी से बढ़िया दूसरी कोई गोली नहीं होती। बहलाने के लिए ईमानदारी से उम्दा कोई खिलौना नहीं होता। केजरीवालजी ने दोनों ही तरीके से इसका सद्पयोग किया। ईमानदारी के दम पर दिल्ली में सरकार बनाई। खुद मुख्यमंत्री बन बैठे। अब विधायकों की सैलरी को सीधा चौगुना कर दिया। इसे कहते हैं, हर हाथ में लड्डू देना।

आदर्श या आदर्शवाद एक सीमा तक ही भला लगता है। राजनीति, साहित्य, समाज में अगर आप सिर्फ आदर्शवाद या ईमानदारी के साथ ही जिंदगी बिताना चाहते हैं तो आप कोरे मूर्ख हैं। जमाना अब पहले जैसा नहीं रहा। आज की तारीख में सुखी वही है, जो तिकड़मबाज है। बिना तिकड़मबाजी के न रोटी मिल सकती है, न नौकरी। इस मामले में नेता बहुत समझदार होता है। वो आदर्शवाद और ईमानदारी को जनता के समक्ष अच्छे से भूनाना जानता है। जनता भी सबकुछ जानते हुए हर दफा उसके झांसे में आ जाती है। झांसे में आने के अतिरिक्त उसके कने कोई 'विकल्प' नहीं होता न।

केजरीवालजी की बुराई चाहे कित्ती भी कर लीजिए। सैलरी बढ़नी थी, बढ़ गई। दिल्ली में 'ऑड' और 'इवन' का फरमान जारी होना था, सो हो गया। करते रहिए काएं-काएं। दिल्ली सरकार मस्त है। जनता के पस्त होने की फिकर किसे है।

जब ईमानदार सरकार बनवाई है, तो उसकी ईमानदार नीतियों को झेलना तो होगा ही। हंसकर झेलें या रोकर। यह आप पर है।