सोमवार, 30 नवंबर 2015

गले मिलने के बहाने

आज के जमाने में बिना मतलब- वो भी जबरन खींचके- कोई किसी को गले नहीं लगाता। सियासत में गले लगने या लगाने के मायने कुछ और ही होते हैं। जब तलक एक नेता की दूसरे नेता के साथ 'गोटी' फिट नहीं बैठेती, कोई किसी को गले नहीं लगाता। गले वो तभी लगाएगा, जब उसके सियासी हित सामने वाले से मेल खाएंगे। आजकल तो बिना मतलब बेटा बाप को गले नहीं लगाता ये तो फिर भी सियासत ठहरी।

मगर अरविंद केजरीवाल कह रहे थे कि लालूजी ने उन्हें जबरन खींचके गले लगा लिया, जबकि उनकी गले पड़ने की कोई मंशा न थी। कोशिश तो मैंने बहुत की केजरीवालजी की बात को गले से नीचे उतारने की पर नहीं उतार पाया। भला एंवई कौन नेता पराई पार्टी के नेता के गले पड़ेगा? दुनिया जानती है, सियासत में गले पड़ना कोई हंसी-खेल नहीं होता। कभी-कभी जनता को दिखाने तो कभी अपना उल्लू सीधा करने के लिए नेता लोग एक-दूसरे को गले लगाया करते हैं। गले लगने या लगाने में से शिष्टाचार को- सियासत के मामले में- फिलहाल निकाल ही दें।

अच्छा अगर उन्होंने उनको जबरन गले लगाया ही था, तो वे तुरंत पीछा भी तो छुड़ा सकते थे। किंतु तस्वीरों में तो वे ऐसा कुछ करते नजर नहीं आते। जबकि गले लगते वक्त उनके चेहरे पर असीम खुशी दिखलाई पड़ती है। जैसे कह रहे हों- आपका हमारा ये गला-मिलन सियासत में आगे बड़े गुल खिलाएगा। बहुत संभव है, दिल्ली में बड़ा गुल खिलाके, वे अन्य जगह भी ऐसी मंशा रखते हों। सियासत में जित्ता गले मिला जाए, उत्ता कम है।

वो तो चलो नेता रहे एक-दूसरे से गले मिलकर अपना-अपना सियासी हित साध लिया। यहां तो आज तलक मुझे कभी किसी ने गले नहीं लगाया। गले लगाना तो दूर की बात ठहरी, बिना मतलब किसी ने मुझसे हाथ तक नहीं मिलाया। गले लगाने के साथ-साथ अब हाथ मिलाने के मायने भी बदल गए हैं। बंदा अब सामने वाले से हाथ तब ही मिलाता है, जब उसे दूसरे हाथ से कुछ लेना होता है। कभी रहा होगा हाथ मिलाना 'शिष्टाचार' अब तो मतलब पर निर्भर करता है। यों भी, आजकल सारे संबंध और संबंधी मतलब के ही यार हैं। बिना बात कौन किसे पूछता है।

समाज और परिवार की जाने दीजिए किंतु सियासत में बिना गले लगे या मिले आपकी गाड़ी दो कदम नहीं चल सकती। सियासत में रिश्ते-नाते मतलब के तहत ही बनते-बिगड़ते हैं। मतलब होगा तो नेता गधे को भी बाप बनाने से नहीं चूकेगा। और आप कह रहे हैं कि उन्होंने जबरन ही गले लगा लिया। अमां, छोड़िए इत्ती सियासत तो हम भी समझते हैं। वो बात अलग रही कि हम कभी किसी नेता से गले नहीं मिले पर गले मिलने का अर्थ-मतलब तो जानते-समझते ही हैं न।

बिहार में नीतीश बाबू ने लालूजी को कोई यों ही गले थोड़े न लगाया था। गले लगाने का फल उन्हें पुनः मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर हासिल हो गया। सियासत में हर गला अपनी 'महत्ता' रखता है। भले ही नाप अलग-अलग हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मतलब पड़ने पर हर नाप के गले को अपने मुताबिक ढाला जा सकता है। अपने गले को जित्ता लचीला रखेंगे, उत्ता ही मजा पाएंगे। स्पष्ट बोलूं तो सियासत की दुकानदारी चल ही गला-मिलन के दम पर रही है। जित्ते गले, उत्ती गलबहियां।

काम निकालने के लिए किसी को गले लगाना या लगना कोई खराब परंपरा नहीं। समाज और सियासत में बरसों से ये होता आया है। कुछ लोग गले अपना उल्लू सीधा करने के लिए मिलते हैं, तो कुछ पीठ में छुरा घुसेड़ने के लिए। गले न मिलें तो सारा खेल ही फेल हो जाए यहां।

खुद को इत्ता भोला बनाने की कोशिश न कीजिए। गले मिले हैं तो खुल्ला स्वीकार करें। किसी खास मकसद के तहत किसी से गले मिलने में कैसी शर्म हुजूर! 

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