मंगलवार, 3 नवंबर 2015

दाल न गल पाने का अफसोस

बहुत दिनों से मैं दाल गलाने की कोशिश में हूं। लेकिन दाल है कि गलके ही नहीं दे रही। जित्ता गलाने का प्रयास करता हूं, दाल उत्ती ही सख्त होती जाती है। जबकि मेरे मोहल्ले में मेरे अलावा सबकी दाल अच्छे से गल रही है। बाकायदा मोहल्ले वालों के घरों से दाल गलने की जोर-जोर से आवाजें आती हैं। दाल गलने पर इत्ता खुश पहले कभी मैंने उन्हें नहीं देखा।

दो रोज पहले पड़ोसी प्यारेलाल मिले। मैंने उनसे उनकी दाल गलने का राज पूछा तो बोले- 'बेशक महंगी दाल को गलाने में 'मेहनत' लगती है पर मेरी घरवाली कैसे न कैसे करके गला ही लेती है। दाल का पीछा वो तब तलक नहीं छोड़ती, जब तलक दाल पूरी तरह से गल नहीं जाती। एक दाल ही नहीं, वो तो हम सबको भी बहुत अच्छे से गलाना जानती है। प्रत्यक्ष उदाहरण आपके सामने है।'

बहुत देर तक प्यारेलाल की घरवाली के दाल गलाने के बारे में सोचता रहा। फिर घर पहुंचकर पत्नी को बोला- 'प्रिय, अभी प्यारेलाल मिले थे। बता रहे थे कि उनकी घरवाली इत्ती महंगी दाल को भी जमकर गला लेती है। पर तुमसे क्यों नहीं गलती? आखिर कहां कमी रह जाती है?'

मेरी बात सुन लेने के बाद पत्नी ने उत्तर दिया- 'तुममें और उनमें 'नाम' का नहीं, 'स्टेटस' का भी बड़ा 'फर्क' है।' 'नाम का तो समझ में आता है मगर स्टेटस का दाल के गलने न गलने से क्या मतलब।' मैंने तुरंत पूछा।

वो बोली- 'फर्क बहुत बड़ा फर्क पड़ता है। ये 200 रुपए किलो वाली दाल केवल स्टेटस वालों की ही गल रही है। तुम्हारे जैसे मामूली लेखकों की नहीं। पुरस्कार की तरह दाल भी अब तुम लेखकों के पास आने से डरने लगी है, क्या भरोसा कब लौटा दो! तुम दाल खरीद जरूर रहे हो, गल वो फिर भी नहीं पा रही क्योंकि तुम लेखक हो और मैं लेखक की पत्नी। दाल को सब मालूम रहता है कि उसे किस स्टेटस की बंदी गला रही है, किस स्टेटस की नहीं।'

पत्नी का जवाब सुनकर मैं 'हैरत' में पड़ गया। मैंने तो दाल के न गल पाने का कारण कुछ और ही समझ रखा था, लेकिन पत्नी ने तो कुछ और ही समझाया। क्या लेखक होना इत्ता बुरा है? फिर दो मिनट बाद मैंने अपने लेखक होने पर लानत भेजते हुए खुद से ही कहा- भला ऐसा लेखक होने से भी क्या फायदा जिसकी दाल ही न गल पाए।

कुछ देर सोचने के बाद मैंने तय किया, अब मैं अपना स्टेटस ही बदल डालूंगा। अपना स्टेटस वो वाला कर लूंगा, जिसमें रहकर महंगी से महंगी दाल घरवाली खूब अच्छे से गला पाए। फिर न दाल को शिकायत रहेगी, न घरवाली को।

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