रविवार, 29 नवंबर 2015

कहां है महंगाई...?

कैसे-कैसे लोग हैं समाज में। बताइए, महंगाई की चिंता में घुले जा रहे हैं। चौबीस घंटे बस महंगाई-महंगाई-महंगाई के बारे में ही सोचते रहते हैं। महंगाई बढ़ती है तो सवाल करते हैं कि महंगाई क्यों बढ़ी? महंगाई घटती है तो सवाल करते हैं कि महंगाई क्यों घटी? यानी, न नाक को दाएं से पकड़ चैन पाते हैं, न बाएं से।

महंगाई की मार को झेलते-झेलते इत्ता समय हो चुका है मगर फिर भी उसके प्रति चिंतित रहना, भला कहां की अकलमंदी है? अब तलक तो महंगाई हमारी आदत बन जानी चाहिए थी। चाहे कित्ता भी बढ़े-घटे हमारी सेहत पर कोई फरक नहीं पड़ना है। यों, दुनिया-समाज में दूसरी चिंताएं क्या कम हैं, जो महंगाई को भी चिंता का सबब बना लिया जाए।

मैं तो कतई इस 'फेवर' नहीं हूं कि महंगाई पर किसी प्रकार की चिंता-विंता करनी चाहिए। या महंगाई के लिए सरकारों या नेताओं को 'गरियाना' चाहिए। इत्ती-सी बात हम नहीं समझ पाते कि उम्र की तरह महंगाई का काम भी बढ़ना है। जैसे बढ़ती उम्र को घटाया नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह बढ़ती महंगाई को भी नहीं घटाया जा सकता। हां, कुछ उत्पादों पर फौरी तौर पर रिलेक्सेशन जरूर दिया जा सकता है किंतु एकदम से महंगाई को खत्म नहीं किया जा सकता। महंगाई का बढ़ना समय का शाश्वत सत्य है।

बाजारों में बढ़ती भीड़ को देखकर कभी मुझे लगा ही नहीं कि महंगाई है! लोग खरीददारी पर खरीददारी किए चले जा रहे हैं। एक-एक दुकान पर इत्ती-इत्ती भीड़ है कि पैर रखना तक मुश्किल। सड़कों पर पैदल चलना तक मुहाल है। लोग जित्ता दुकान के अंदर से खरीद रहे हैं, उत्ता ही बाहर (फड़-ठेलों) से भी। हां, खरीददारों की हैसियत जरूर अलग-अलग हो सकती है लेकिन बाजारों में भयंकर खरीददारी जारी है।

जमाना बदला है। अब आदमी की जरूरत केवल रोटी-कपड़ा-मकान नहीं रह गई है। आदमी जरूरत में अब कार, मोबाइल और मनोरंजन भी शामिल हो गया है। दाल-रोटी खरीदने वाला आम आदमी कपड़े और मोबाइल भी उसी चाव से खरीदता है। मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के बीच 'परचेसिंग सेंस' बेइंतहा बढ़ा है। पहले घरों में साईकिल रेयर मानी जाती थी, अब तो महंगी से महंगी कार तक रेयर न रही। हर दूसरे घर में फर्स्ट या सेकेंड कार मिल ही जाएगी। फिर भी रोने वाले रोते हैं कि हाय! महंगाई बहुत है। अगर महंगाई है तो बाजारों में इत्ती भीड़ क्यों हैं प्यारे?

गजब यह है कि महंगाई पर सियापा करते वक्त हम लोगों की बढ़ती सैलरी का रेशो नहीं देखते। महंगाई अगर बढ़ी है तो सैलरियों में भी तो इजाफा हुआ है। समाज में 100 रुपए किलो दाल खरीदने वाले भी हैं और 10 हजार का स्मार्टफोन खरीदने वाले भी। बाजारों में सबकुछ बिक रहा है। चाहे महंगाई हो या न हो। यहां तो ऐसे लोग भी हैं, जो 60 हजार का आईफोन एक झटके में खरीद लेते हैं। फिर बताओ प्यारे, कहां है महंगाई?

महंगाई के बढ़ने को जिसने दिल पर लिया, वो 'अवसाद' में डूबता चला गया। अमां, अवसाद में जाने की यहां और भी वजहें मौजूद हैं, केवल महंगाई को लेकर अवसाद में जाना 'स्मार्टनेस' नहीं। महंगाई है तो कम खाइए या कम में गुजारा कीजिए। क्या जरूरी है, महंगाई के लिए हर वक्त रोना ही रोया जाए?

देखो जी, महंगाई न किसी के रोने से रुकने वाली है, न किसी के सड़कों पर चीखने-चिल्लाने से। उसका काम है बढ़ना है, वो बढ़ेगी ही। सरकारें आएंगी जाएंगी किंतु महंगाई को अपनी चाल चलना है वो अनवरत चलती ही रहेगी। खामखा, सरकारों और नेताओं को महंगाई के वास्ते गरियाकर अपनी जुबान को मैला करना। जस्ट चिल्ल डूड।

मेरी मानिए, महंगाई को अपना दोस्त बना लीजिए। उसके साथ गलबहियां कीजिए। महंगाई के घटने-बढ़ने को मनोरंजन का साधन बनाइए। फिर देखिएगा महंगाई कभी चिंता का कारण नहीं बनेगी। चिंता का रास्ता चिता तक लेकर जाता है, इत्ता ध्यान रखें। महंगाई पर खाक डालिए। क्योंकि और भी गम हैं दुनिया में महंगाई के सिवा।

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