गुरुवार, 26 नवंबर 2015

बे-पढ़े-लिखे होने के फायदे ही फायदे

मुझे पढ़े-लिखे लोगों के बीच बैठने में असहज-सा महसूस होता है। उनकी बड़ी-बड़ी ज्ञानपूर्ण बातें मेरे पल्ले नहीं पड़तीं। पढ़े-लिखे लोग हर बात, हर मुद्दे में दिमाग को बीच में ले आते हैं। वे दिमाग से ज्यादा सोचते हैं। जबकि मैं अपने दिमाग को रत्तीभर कष्ट नहीं देना चाहता। मेरी कोशिश यही रहती है कि दिमाग को जित्ता ज्यादा 'आराम' मिले, उत्ता सही। एंवई दिमाग पर 'प्रेशर' डालके क्या फायदा!

आजकल जैसा जमाना चल रहा है, उसमें दिमागवालों की जरा भी 'कद्र' नहीं। जो जित्ता बड़ा दिमागवाला, वो उत्ता बड़ा बेवकूफ। बेवकूफी के साथ जी गई जिंदगी ज्यादा 'खुशनुमा' होती है। टेंशनरहित रहती है। वो कहते भी हैं न कि बने रहोगे लुल्ल तनखाह पाओगे फुल। इसीलिए मेरी कोशिश ज्यादा से ज्यादा बेवकूफ या लुल्ल ही बने रहने की रहती है। मैं मेरे लेखन से लेकर दफ्तर तक में अक्सर अपनी लुल्लता का प्रदर्शन करता रहता हूं। बड़ा सुकून मिलता है।

ज्यादा पढ़े-लिखे होने में दिक्कतें भी ज्यादा रहती हैं। कम पढ़ा-लिखा कैसे भी, कहीं से भी अपना काम चला ही लेता है। ज्यादा कुछ नहीं तो नेता-विधायक-सभासद ही बन जाता है। राजनीति का क्षेत्र बे-पढ़े-लिखों के वास्ते सबसे मुफीद जगह है।

देखिए न, नौंवी क्लास फेल होने के बाद भी लालूजी के सुपुत्रजी डिप्टी-सीएम बन बैठे। भले ही उनकी अपेक्षित-उपेक्षित पर जुबान फिसल गई। तो क्या... ठीक-ठाक कुर्सी तो हासिल हो ही गई न। राजनीतिक जीवन में एक नेता को कुर्सी-पद-नाम के अतिरिक्त और क्या चाहिए होता है भला।

साथ ही, उन्होंने मुझ जैसे परम-फेलवीरों को यह आस भी बंधा दी कि हमारे कैरियर की सबसे अधिक संभावनाएं राजनीति में ही हैं। अब मैं खुद पर हाईस्कूल में तीन दफा फेल होने पर ज्यादा शर्म महसूस नहीं करता। फेल होना निश्चित ही सम्मान की बात है।

उनकी देखा-दाखी मैं भी अपनी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी को छोड़कर राजनीति में आने का मन बना रहा हूं। राजनीति में नाम कमाना कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं। दो-चार तगड़े-तगड़े बयान दे दो, लो गए ऑल-टाइम फेमस। बदनामी से नाम कमाना अब कोई शर्म की बात नहीं रही प्यारे।

पढ़े-लिखों की सोहबत से कहीं ज्यादा भली है बे-पढ़े-लिखों की सोहबत। कम से कम इसमें आगे बढ़ने के चांस तो हैं। डिप्टी-सीएम या नेता-मंत्री बनने का रास्ता तो खुल जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने 'अपेक्षित' को 'उपेक्षित' पढ़ा है। फर्क पड़ता है, आपके ऊंचे औहदे से। राजनीति में रहने का सबसे बड़ा सुख तो यही है। है कि नहीं...।

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