सोमवार, 23 नवंबर 2015

अपेक्षित जुबान की उपेक्षित फिसलाहट

ऐसा नहीं है कि जुबान सिर्फ नेता की ही 'फिसलती' है, कभी-कभार आम आदमी की भी फिसल जाती है। किंतु आम आदमी की फिसली जुबान के चर्चे मीडिया या सोशल साइसट्स पर नहीं होते। हां, नेता की जुबान के फिसलने का नोटिस हर जगह से लिया जाता है। नेता की गलती न होने के बावजूद उसे 'बलि का बकरा' बना दिया जाता है। घोर अपमान।

जुबान के फिसलने में दोष जुबान का होता है लेकिन गर्दन बेचारे नेता की ही पकड़ी जाती है। यह सरासर नाइंसाफी है। नेता के बयान को इत्ती-इत्ती बार चैनलों पर चलाया जाता है कि बेचारे नेता भी शर्म के मारे पानी-पानी हो जाता होगा! मगर अपना 'दर्द' कहे किससे। यहां तो हर कोई उसकी फिसली जुबान की चोक लेने को तैयार बैठा है।

देखिए न, लालूजी के सुपुत्र के मुंह से 'अपेक्षित' की जगह 'उपेक्षित' क्या निकल गया, मीडिया से लेकर सोशल प्लेटफार्म तक 'हल्ला' मच गया। हर कोई अपने-अपने तरीके से उनकी मजाक बनाने में लग गया। ठीक है, जुबान अपेक्षित की जगह उपेक्षित पर फिसल गई। होता है, होता है। पहली बार है। शपथ लेते वक्त अक्सर जुबान यों ही फिसल जाया करती है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि बंदे में खोट है। बंदा जनता के इरादों पर एकदम 'अपेक्षित' (!) ही उतरेगा। अपेक्षित या उपेक्षित का किसी के नंवी या दसवीं पास-फेल होने से कोई फरक नहीं पड़ता। राजनीति में केवल कद का पऊआ चलता है। आखिर मियां इलेक्सन जीतकर आए हैं। कोई हंसी-मजाक थोड़े है।

फिर यह क्यों नहीं समझते, इत्ती भीड़ के बीच शपथ-पत्र पढ़ना कोई आसान बात थोड़े न होती है। पहली बार में तो सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। मुझे ही देख लीजिए, जब कक्षा दस में मैं पहली दफा फेल हुआ था, तब मन में बड़ी झिझक टाइप होती थी, कि लोग क्या कहेंगे? मोहल्ले वालों के बीच कैसे छवि बन जाएगी। लेकिन बाद में जब दो-तीन बार लगातार फेल होता चला गया फिर न मन में झिझक रही न लोगों के कहने का डर। मुझे तो आज भी कक्षा दस में तीन दफा फेल होने पर 'गर्व' टाइप फील होता है।

मैं पुनः कह रहा हूं, उनकी अपेक्षित की जगह उपेक्षित पर बस जुबान ही फिसली थी। बाकी सब ठीक-ठाक है। उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी वो उपेक्षित (आईमीन- अपेक्षित) तरीके से संभाल पाएंगे। देखते रहिएगा...। लालूजी के सुपुत्र हैं आखिर।

वैज्ञानिक लोग इत्ती-इत्ती खोजें करते रहते हैं परंतु जुबान के 'न' फिसलने की दवाई अभी तलक न खोज पाए हैं। कि, बंदा कुछ कहने-बोलने से पहले एक दफा जुबान न फिसलने की गोली खा ले और फिर शालीनता के साथ बोलता रहे। ये ससुरी जुबान की फिसलाहट बहुत बड़े-बड़े टंटे करवा देती है कभी-कभी तो। झेलना बेचारे नेताओं को पड़ता है।

जुबान की फिसलाहट पर 'मेडिकली लगाम' का कसा जाना आज के समय की बड़ी मांग है।

1 टिप्पणी:

Rushabh Shukla ने कहा…

​​​​​​सुन्दर रचना ..........बधाई |
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