गुरुवार, 19 नवंबर 2015

आम आदमी त्रस्त, महंगाई मस्त

महंगाई के मसले पर एक दफा फिर से चोचें लड़ना शुरू हो गई हैं। नेता लोग चुनाव की खुमारी से बाहर निकलकर महंगाई पर बोलने-चिल्लाने लगे हैं। गाय-बीफ-असहिष्णुता-अवार्ड वासपी की नौटंकियों को परे रख मीडिया भी महंगाई पर 'फोसक' कर रहा है। रही बात आम आदमी की वो कल भी महंगाई से त्रस्त था, आज भी त्रस्त ही है। नेता, राजनीति और समाज के बीच उसकी भूमिका महंगाई को सिर्फ सहते रहने की है, बोलने की नहीं। अगर बोलेगा भी तो यहां कौन है उसकी सुनने वाला!

इसीलिए आम आदमी अपनी त्रस्त कंडिशन में भी हर दम मस्त रहता है। मस्त न रहे तो और क्या करे? न महंगाई को काबू करना उसके अधिकार क्षेत्र में है, न महंगाई को बढ़ना उसके बस की बात है। हां, महंगाई को लेकर दो-चार-पांच दिन आंसू बहना उसे जरूर आता है। बहाता भी है। लेकिन यहां फुर्सत किसे है, आम आदमी के आंसूओं को देखने की। नेता लोग अपनी में तो मीडिया अपनी में मस्त है। ऐसे में आम आदमी की तो रहने ही दीजिए।

सच बोलूं, अब तो महंगाई का मसला मुझे 'भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी बौराए' टाइप लगने लगा है। महंगाई को लेकर चाहे जित्ता नेताओं को गरिया लो, चाहे जित्ता व्यवस्था को कोस लो, चाहे जित्ता जमाखारों को लतिया लो पर महंगाई की सेहत पर कहीं कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वो अपनी ही गति से मस्त घटती-बढ़ती रहती है। सरकारें आती हैं, जाती हैं किंतु महंगाई का मसला जस का तस बना रहता है।

दरअसल, पिछली सरकार ने आम आदमी को महंगाई की खूब प्रैक्टिस करवाई थी। महंगाई के चलते आम आदमी को हर हाल में जीना-रहना बताया था। उसे इत्ता मजबूर कर दिया था कि वो अपनी जरूरत का सामान बिन खरीदे रह ही न सके। सो, तब से लेकर अब तक आम आदमी महंगाई के भिन्न-भिन्न रूपों को अलग-अलग तरीके से झेल रहा है। महंगाई अब उसकी आदत बन चुकी है। 100 रुपए किलो दाल या 80 रुपए किलो प्याज के बिकने से उसकी सेहत पर ज्यादा कुछ असर नहीं पड़ता। पेट की आग को शांत करने के लिए, ठंडा पानी तो पीना ही पड़ेगा न। है कि नहीं...।

लोग गलत कहते हैं कि महंगाई डायन है। डायन महंगाई नहीं, डायन तो व्यवस्था है, जो इत्ता खाकर भी हर वक्त और खाने की इच्छा रखती है। बेचारी महंगाई को दोष देने से क्या हासिल? न अपने चाहे से वो बढ़ती है, न अपने चाहे से वो घटती। जैसा नेता-सत्ता-व्यवस्था उसे चलाते हैं, वो चलती है। इसीलिए तो महंगाई की चाल को मस्ती की चाल कहा जाता है।

आम आदमी की मानिंद पहले मैं भी महंगाई के मसले को लेकर खासा परेशान रहता था। हर समय सरकार और नेताओं को कोसता रहता था। मगर फर्क फिर भी किसी की सेहत पर कोई नहीं पड़ता था। सब अपनी-अपनी में मस्त रहकर जिंदगी का मजा लेते रहते थे। फिर धीरे-धीरे कर मैंने भी नेताओं और सरकारों को कोसना बंद कर दिया। अपने तरीके से बढ़ती महंगाई को एंजॉय करने लगा। यों, कुढ़ते रहने से तो बेहतर है कि महंगाई को एंजॉय ही किया जाए। खामखा अपना दिमाग और जुबान खराब करने से क्या हासिल प्यारे।

अब तो अगर महंगाई बढ़ती भी तो भी मैं किसी को नहीं गरियाता। महंगाई को मस्ती के साथ एंजॉय करता हूं। 100 रुपए किलो की दाल और 80 रुपए किलो का प्याज खरीदकर लंबी तानकर सोता हूं। जब नेताओं-सरकारों को मेरी फिकर नहीं तो भला मैं क्यों करूं? मस्त रहो। एंजॉय करो। महंगाई को अपनी चाल चलने दो, जैसे अक्सर सेंसेक्स चला करता है।

मेरी बात मानिए, महंगाई की चिंता करना छोड़ ही दीजिए। महंगाई को अपने हाल पर खुश रहने दें और हम-आप अपने हाल पर खुश रहें। इसी में समझदारी है। बाकी आपकी मर्जी।

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