रविवार, 15 नवंबर 2015

असहिष्णुता पर बमचक

असहिष्णुता पर 'तगड़ी बमचक' मची है। चारों तरफ से असहिष्णुता का शोर ही सुनाई दे रहा है। गली के नुक्कड़ पर खड़े लोग असहिष्णुता पर बात करते हुए मिल जाते हैं। दफ्तर में भी कोई न कोई बंदा असहिष्णुता पर बहस छेड़ ही देता है। असहिष्णुता का आलम यह हो लिया है कि मुझे अपनी परछाई भी अब असहिष्णु-सी लगने लगी है!

सड़क चलते या घर में रहते किसी से ऊंची आवाज में बोलने से भी अब डर लगता है, कहीं मैं असहिष्णु न करार दिया जाऊं। अब तो पत्नी के बनाए खाने पर भी ज्यादा ना-नुकूर नहीं करता। खाना जैसा बनकर आ जाता है, खा लेता हूं। खाना चाहे दिन में दो बार मिले या एक बार या न मिले तो भी कोई नहीं। किंतु प्रतिवाद नहीं करता। क्या भरोसा पत्नी मुझे असहिष्णु समझ ले। असहिष्णु समझ, मेरे खिलाफ कहीं राष्ट्रपति भवन तक मार्च न निकाल दे। मेरी असहिष्णुता पर अखबारों में लेख न लिख दे। इसीलिए, घर में न बहस करता हूं, न प्रतिक्रिया देता हूं। चुपचाप पत्नी की हां में हां मिलता रहता हूं। ताकि घर में सहिष्णुता कायम रह सके।

मेरे ज्यादा प्रतिवाद न करने पर पत्नी को भी लगने लगा है कि मैं 'सुधर' गया हूं। इसलिए वो अब मुझसे खुश-खुश सी रहती है। लेकिन उसे क्या बताऊं, बाहर का माहौल क्या है? विपरित विचार या असहमति को तुरंत असहिष्णुता की कैटेगिरी में रख, हंगामा काटा जा रहा है। जो सालों-साल से बिलों में दुबके बैठे थे, अब बाहर निकल आएं हैं। और, जनता को असहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे हैं। मानो, इससे पहले न समाज, न देश, न लोगों के बीच असहिष्णुता कभी रही ही न हो।

असहिष्णुता पर इत्ता हंगामा कट जाने के बाद धीरे-धीरे ये शब्द 'मनोरंजन' की पंक्ति में आता जा रहा है। लोग कथित असहिष्णुता पर 'गंभीर' कम, 'मजाकिया' अधिक लगने लगे हैं। असहिष्णुता का आलम ठीक वैसा ही है, जैसा पुरस्कार लौटाने वालों का। उन्होंने भी पुरस्कार लौटा-लौटाकर खुद को 'हंसी का पात्र' बना लिया है। तर्क ये पेश कर रहे हैं कि देश-समाज में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है इसलिए पुरस्कार लौटा रहे हैं। यानी, इससे पहले देश-समाज में सबकुछ ठीक-ठाक व सहिष्णु था। कमाल है प्यारे।

लेखकों के साथ विपक्ष भी खूब है। असहिष्णुता का वास्ता देकर इत्ता लंबा मार्च निकाल देता है। मगर इससे पहले देश में हुईं हिंसक वारदातों पर वे भी चुप्पी साधे रहे। कुछ न बोले। तब शायद, उनकी निगाह में, असहिष्णुता के मायने कुछ और ही हों।

कथित असहिष्णुता की बहती नदी में हाथ धोना बैठे-ठालों का काम है। जिसे वे पूरी शिद्दत के साथ कर रहे हैं। सत्ता और सरकार जब बदलती है, तब कुछ लोग 'हाशिए' पर चले ही जाते हैं। जो हाशिए पर चले जाते हैं, वो चर्चा या लाइम-लाइट में बने रहने के लिए कुछ तो करेंगे ही। फिर ये ही सही...।

मैंने तो खुद को टाइम के हिसाब से एडजस्ट कर लिया है। असहिष्णुता पर चल रही नौटंकियों का मजा घर बैठे ले रहा हूं। जुबान पर ताला लगाकर रखता हूं, कहीं बहक न जाएं। फिर मुझे भी कहीं असहिष्णु घोषित न कर दिया जाए। गर्म माहौल में खुद को 'कूल' रखने का ढंग आता मुझे। तब ही तो न पत्नी से झगड़ता हूं, न दफ्तर में 'इफ एंड बट' करता हूं, न ठेले वाले से मोल-भाव करता हूं; क्या पता कौन मुझे असहिष्णु समझ ले!

बेहतर ये है कि अपनी सहिष्णुता को बचाकर रखिए। असहिष्णुता पर हंमागा काटने वालों को 'टोटल इग्नोर' कीजिए। मस्त रहिए। मनोरंजन में बिजी रहिए। क्योंकि और भी गम हैं दुनिया में असहिष्णुता के सिवा।

1 टिप्पणी:

vishnu kant Sharma ने कहा…

असहिष्णुता के नाम पर अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने वालों पर यह लेख करारा प्रहार है.. साहित्य में रुचि रखने के बावजूद भी मुझे कई साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाए जाने के बाद पता चला कि अच्छा! इन्हें भी पुरस्कार मिला है.. यह एक श्रेष्ठ व्यंग्य है|