मंगलवार, 10 नवंबर 2015

बाजार, विज्ञापन और दीवाली

पहले जरूर दिवाली पर- विज्ञापनों से भरे हुए मोटे-मोटे अखबार- देखकर सिर चकराता था। भिन्न-भिन्न टाइप की गालियां अखबार और विज्ञापनों पर निकालती थीं। अखबार में खबर के दर्शन न हो पाने का बड़ा मलाल रहता था। हर पेज पर किस्म-किस्म के 'डिस्काउंट ऑफर्स' देखकर खून खौलता था। लेकिन धीरे-धीरे खुद को मैंने वक्त के साथ ढाला और अखबारों में आने वाले त्यौहारी विज्ञापनों को सहजता के साथ लेना शुरू किया। गरियाने का कोई फायदा न था। सिर्फ एक अकेले मेरे गरिया देने भर से न अखबार विज्ञापनों को छापना बंद कर देंगे, न विज्ञापन एजेंसियां अखबारों में विज्ञापन देना। बेहतर रास्ता यही है कि खुद को इनके बीच 'एडजस्ट' किया जाए। एडजस्ट करने में ही 'परम सुख' है।

त्यौहार का मतलब अब वो नहीं रहा, जो पहले कभी किसी जमाने में हुआ करता था। पहले लोगों कने खूब टाइम था, एक-दूसरे से मिलने का, एक-दूसरे के घर जाने का, अपनी छोटी से छोटी खुशी एक-दूसरे के साथ बांटने का। अब किसी के पास इत्ता समय भी नहीं कि वो त्यौहार के असली महत्त्व को अपने बच्चों को समझा सके। सब अपनी-अपनी धुन में मस्त और व्यस्त हैं। ऐसे लोगों के लिए बाजार ने बीच का 'इजी' रास्ता ढूंढ़ निकाला, डील के साथ त्यौहार मनाने का।

प्रत्येक रिश्ते के साथ-साथ अब हर त्यौहार भी ऑन-लाइन है। किसी को कहीं जाने की जरूरत नहीं। घर बैठे ही खरीददारी करें। घर बैठे ही अपनों को विश करें। रिश्तों को मजबूत करने के लिए ऑन-लाइन गिफ्ट बुक करवाकर उन्हें खुश करें। बाजार के पास आपकी हर इच्छा का समाधान है। त्यौहार को कैसे किस प्रकार के डिस्काउंटों के साथ मना सकते हैं, बाजार सब जानता-बताता है।

सुनने में आया है कि इस दीवाली मिठाई से कहीं ज्यादा मोबाइल फोन और कारें बिकी हैं। सेहत को ध्यान में रखते हुए 'पारंपरिक मिठाई' से इतर तमाम ऑप्शन बाजार ने उपलब्ध करवा दिए हैं। कुछ मीठा हो जाए के लिए अब मिठाई का होना ही जरूरी नहीं, ये काम चॉकलेट भी बखूबी कर सकती है। दीवाली की खुशियां चॉकलेट के संग।

गजब तो ये है कि बाजार में चाहे कित्ता भी महंगा मोबाइल फोन आ जाए, उसके खरीददार आपको हर वर्ग के मिलेंगे। वो त्यौहार की क्या जो नए मोबाइल फोन के साथ सेलिब्रेट न किया जाए। यों भी, दीवाली पर नया फोन लेना अब 'शगुन' का हिस्सा-सा बनता जा रहा है। लगभग यही स्थिति कारों में भी है। अब तो लगभग हर घर में कार है। बाजार के असर ने लोगों को कार की आदत-सी डाल दी है। त्यौहार पर कार पर मिले ऑफर्स सोने पे सुहागा।

आजकल के जमाने में समझदारी बाजार के साथ चलने में ही है। बाजार से इतर चलेंगे तो न रिश्तों का मजा ले पाएंगे, न त्यौहार का। त्यौहार के बहाने अब कमाई ही महत्त्वपूर्ण है, चाहे वो अखबार हो या विज्ञापन एजेंसियां। बाजार को कोसने से बेहतर है, उसके संग-साथ चलें। बाजार जो दे रहा है, पूरी खुशी और विश के साथ लें। क्योंकि आना वाला समय केवल बाजार और ऑफर्स का ही है।

इसीलिए तो मैंने खुद को अखबार और विज्ञापन के साथ एडजस्ट कर लिया। मनोरंजन के लिए खबरों से इतर भी तो कुछ होना चाहिए न अखबारों में। फिर किस्म-किस्म के विज्ञापन क्या बुरे हैं। विज्ञापन भी मनोरंजन का दूसरा नाम ही तो है।

दीवाली की खुशियां-मस्तियां अपनों के साथ बाजार और ऑफर्स के साथ मनाएं, सुकून मिलेगा। तब ही तो बाजार ने इसे 'डील वाली दिवाली' नाम दिया है।

2 टिप्‍पणियां:

JAY BARUA ने कहा…

बहुत बढ़िया |

Kavita Rawat ने कहा…

बढ़िया सामयिक प्रस्तुति....
आपको दीप पर्व की सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें!