सोमवार, 2 नवंबर 2015

बीवी और पुरस्कार

बीवी मुझसे नाराज होने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देती। कभी-कभी तो बेमतलब और बेमकसद ही मुझ पर नाराज होकर अपनी 'अंदरूनी भड़ास' निकाल लेती है। अच्छा, मैं भी उसकी नाराजगी पर ज्यादा कुछ नहीं बोलता। सिवाय, हां-हूं करके रह जाता हूं। अपनी बचाए रखने का एक ये ही मेरे तईं बीच का रास्ता है। समंदर में रहकर भला मगर से बैर!

फिलहाल, बीवी को मुझसे नाराज होने का एक और ताजा बहाना मिल गया है। वो मुझ पर इस बात को लेकर कुपित है कि मैंने लेखन के मैदान में रहते हुए अभी तलक कोई पुरस्कार-सम्मान क्यों हासिल नहीं किया? अभी परसों ही कहने लगी- 'देखा तुमने, हर लेखक अपना-अपना पुरस्कार लौटाने की भेड़चाल में लगा हुआ है। जमकर मीडिया के बीच फुटेज पा रहा है। हर अखबार के पहले पेज पर लेखक और पुरस्कार के ही चर्चे हैं। और एक तुम हो, जो बंद कमरे में बैठे-बैठे कागज पर कागज 'बर्बाद' किए जा रहे हो। लेखक जरूर हो पर तुम्हें न घर में कोई जाने है, न बाहर।'

बीवी के कहे का ज्यादा 'प्रतिवाद' न करके मैं केवल इत्ता ही कहा- 'रूपमती, वो सब बड़े लेखक हैं। बड़े-बड़े पुरस्कार उन्हें मिले हैं। और, सबसे बड़ी बात वे सब एकजुट होकर अन्याय व हिंसा के खिलाफ अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। मैंने भी इसके संबंध में एक लेख लिखा है। कहो तो सुनाऊं।'

इत्ता सुनते ही बीवी आग की माफिक भड़क ली। 'तुम अपना 'आदर्श' अपने कने रखो। खुद ही लिखो। खुद ही पढ़ो। अरे, ये सब बड़े-बड़े लेखकों की 'स्टंटबाजी' है। मैं सब अच्छे से जानती हूं। देश और समाज में हिंसात्मक घटनाएं कोई नई नहीं हैं। सदियों से होती चली आई हैं। तब तो किसी नामी-गिरामी लेखक ने अपना पुरस्कार नहीं लौटाया? अब ही कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा है?'

मैंने पुनः समझाने की कोशिश की- 'नहीं.. नहीं.. ऐसा कतई नहीं है। अगर वे अपना पुरस्कार लौटा रहे तो कुछ सोच-समझकर ही लौटा रहे होंगे। वो सब 'ज्ञानी' लोग हैं। बरसों से साहित्य की 'सेवा' करते चले आए हैं। नहीं तो आज के समय में इत्ता बड़ा 'रिस्क' भला कौन लेगा? वे सब साहित्य की 'मशाल' हैं।'

'मशाल हैं, ये तुमसे किनने कहा दिया?'- बीवी ने मुझसे लगभग हड़काने के लहजे में पूछा। 'अरे, कहा मुझसे किसी ने नहीं, पर मुझे मालूम है।' मैं उत्तर दिया। 'अच्छा.. अच्छा.. लगता है, तुम्हारा दिमाग घास चरने का बेहद शौकिन है। तुम इन बड़े लेखकों की राजनीति समझ ही नहीं पा रहे। ये पुरस्कार-फुरस्कार ठुकराना तो महज बहाना है, असली मकसद खुद को 'चर्च' में लाना है। सरकार बदलने के बाद उन्हें कोई पूछ नहीं रहा था न इसलिए...।'- बीवी ने एक सांस में जवाब दे डाला।

बहस को थोड़ा खिंचते हुए मैं बोला- 'तुम्हारी सोच वरिष्ठ लेखकों-साहित्यकारों के प्रति ठीक नहीं। इसे बदलो। एक तो वे इत्ता बड़ा सम्मान लौटा रहे हैं और तुम हो कि उन्हें ही कटघरे में खड़ा करे दे रही हो। आज के दौर में मिला हुआ पुरस्कार कौन लौटाता है भला? असर देखो, अब तो नेता लोग भी लेखकों की जिद का नोटिस लेने लगे हैं।'

अब तो बीवी के सब्र का बांध टूट चुका था। तपाक से उबल पड़ी- 'क्यों तुम्हें क्या इन लेखकों से उनकी 'तारीफ' करवाने की 'सुपारी' मिली हुई है? अपनी 'औकात' देख नहीं रहे, चले हो मुझे उनकी औकात समझाने। मैं तुम्हें और इन बड़े लेखकों-साहित्यकारों को खूब अच्छे से जानती हूं। ये बाहर कुछ कहते और मन में कुछ रखते हैं। अगर तुमने इनका ज्यादा 'पक्ष' लिया न तो कल से घर में तुम्हारा दाना-पीना बंद कर दूंगी। समझे। बड़े आए लेखकों की पैरवी करने वाले।'

अब मैंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। क्या पता लेखकों का पक्ष लेते-लेते मैं ही 'बे-पक्ष' हो जाऊं! दाना-पानी बंद हो गया तो कहां जाऊंगा? मुझे तो ढंग से दाल गलानी भी नहीं आती! यों भी, दाल का भाव 200 रु के पार निकल गया है। मैं लेखक जरूर हूं पर बीवी से बड़ा नहीं। इसलिए जो लौटा रहे हैं, उन्हें लौटाने दो। खुद सिर्फ 'मनोरंजन' से मतलब रखो।

1 टिप्पणी:

Rushabh Shukla ने कहा…

सुन्दर रचना ........... मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन की प्रतीक्षा |

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