सोमवार, 30 नवंबर 2015

गले मिलने के बहाने

आज के जमाने में बिना मतलब- वो भी जबरन खींचके- कोई किसी को गले नहीं लगाता। सियासत में गले लगने या लगाने के मायने कुछ और ही होते हैं। जब तलक एक नेता की दूसरे नेता के साथ 'गोटी' फिट नहीं बैठेती, कोई किसी को गले नहीं लगाता। गले वो तभी लगाएगा, जब उसके सियासी हित सामने वाले से मेल खाएंगे। आजकल तो बिना मतलब बेटा बाप को गले नहीं लगाता ये तो फिर भी सियासत ठहरी।

मगर अरविंद केजरीवाल कह रहे थे कि लालूजी ने उन्हें जबरन खींचके गले लगा लिया, जबकि उनकी गले पड़ने की कोई मंशा न थी। कोशिश तो मैंने बहुत की केजरीवालजी की बात को गले से नीचे उतारने की पर नहीं उतार पाया। भला एंवई कौन नेता पराई पार्टी के नेता के गले पड़ेगा? दुनिया जानती है, सियासत में गले पड़ना कोई हंसी-खेल नहीं होता। कभी-कभी जनता को दिखाने तो कभी अपना उल्लू सीधा करने के लिए नेता लोग एक-दूसरे को गले लगाया करते हैं। गले लगने या लगाने में से शिष्टाचार को- सियासत के मामले में- फिलहाल निकाल ही दें।

अच्छा अगर उन्होंने उनको जबरन गले लगाया ही था, तो वे तुरंत पीछा भी तो छुड़ा सकते थे। किंतु तस्वीरों में तो वे ऐसा कुछ करते नजर नहीं आते। जबकि गले लगते वक्त उनके चेहरे पर असीम खुशी दिखलाई पड़ती है। जैसे कह रहे हों- आपका हमारा ये गला-मिलन सियासत में आगे बड़े गुल खिलाएगा। बहुत संभव है, दिल्ली में बड़ा गुल खिलाके, वे अन्य जगह भी ऐसी मंशा रखते हों। सियासत में जित्ता गले मिला जाए, उत्ता कम है।

वो तो चलो नेता रहे एक-दूसरे से गले मिलकर अपना-अपना सियासी हित साध लिया। यहां तो आज तलक मुझे कभी किसी ने गले नहीं लगाया। गले लगाना तो दूर की बात ठहरी, बिना मतलब किसी ने मुझसे हाथ तक नहीं मिलाया। गले लगाने के साथ-साथ अब हाथ मिलाने के मायने भी बदल गए हैं। बंदा अब सामने वाले से हाथ तब ही मिलाता है, जब उसे दूसरे हाथ से कुछ लेना होता है। कभी रहा होगा हाथ मिलाना 'शिष्टाचार' अब तो मतलब पर निर्भर करता है। यों भी, आजकल सारे संबंध और संबंधी मतलब के ही यार हैं। बिना बात कौन किसे पूछता है।

समाज और परिवार की जाने दीजिए किंतु सियासत में बिना गले लगे या मिले आपकी गाड़ी दो कदम नहीं चल सकती। सियासत में रिश्ते-नाते मतलब के तहत ही बनते-बिगड़ते हैं। मतलब होगा तो नेता गधे को भी बाप बनाने से नहीं चूकेगा। और आप कह रहे हैं कि उन्होंने जबरन ही गले लगा लिया। अमां, छोड़िए इत्ती सियासत तो हम भी समझते हैं। वो बात अलग रही कि हम कभी किसी नेता से गले नहीं मिले पर गले मिलने का अर्थ-मतलब तो जानते-समझते ही हैं न।

बिहार में नीतीश बाबू ने लालूजी को कोई यों ही गले थोड़े न लगाया था। गले लगाने का फल उन्हें पुनः मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर हासिल हो गया। सियासत में हर गला अपनी 'महत्ता' रखता है। भले ही नाप अलग-अलग हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मतलब पड़ने पर हर नाप के गले को अपने मुताबिक ढाला जा सकता है। अपने गले को जित्ता लचीला रखेंगे, उत्ता ही मजा पाएंगे। स्पष्ट बोलूं तो सियासत की दुकानदारी चल ही गला-मिलन के दम पर रही है। जित्ते गले, उत्ती गलबहियां।

काम निकालने के लिए किसी को गले लगाना या लगना कोई खराब परंपरा नहीं। समाज और सियासत में बरसों से ये होता आया है। कुछ लोग गले अपना उल्लू सीधा करने के लिए मिलते हैं, तो कुछ पीठ में छुरा घुसेड़ने के लिए। गले न मिलें तो सारा खेल ही फेल हो जाए यहां।

खुद को इत्ता भोला बनाने की कोशिश न कीजिए। गले मिले हैं तो खुल्ला स्वीकार करें। किसी खास मकसद के तहत किसी से गले मिलने में कैसी शर्म हुजूर! 

रविवार, 29 नवंबर 2015

कहां है महंगाई...?

कैसे-कैसे लोग हैं समाज में। बताइए, महंगाई की चिंता में घुले जा रहे हैं। चौबीस घंटे बस महंगाई-महंगाई-महंगाई के बारे में ही सोचते रहते हैं। महंगाई बढ़ती है तो सवाल करते हैं कि महंगाई क्यों बढ़ी? महंगाई घटती है तो सवाल करते हैं कि महंगाई क्यों घटी? यानी, न नाक को दाएं से पकड़ चैन पाते हैं, न बाएं से।

महंगाई की मार को झेलते-झेलते इत्ता समय हो चुका है मगर फिर भी उसके प्रति चिंतित रहना, भला कहां की अकलमंदी है? अब तलक तो महंगाई हमारी आदत बन जानी चाहिए थी। चाहे कित्ता भी बढ़े-घटे हमारी सेहत पर कोई फरक नहीं पड़ना है। यों, दुनिया-समाज में दूसरी चिंताएं क्या कम हैं, जो महंगाई को भी चिंता का सबब बना लिया जाए।

मैं तो कतई इस 'फेवर' नहीं हूं कि महंगाई पर किसी प्रकार की चिंता-विंता करनी चाहिए। या महंगाई के लिए सरकारों या नेताओं को 'गरियाना' चाहिए। इत्ती-सी बात हम नहीं समझ पाते कि उम्र की तरह महंगाई का काम भी बढ़ना है। जैसे बढ़ती उम्र को घटाया नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह बढ़ती महंगाई को भी नहीं घटाया जा सकता। हां, कुछ उत्पादों पर फौरी तौर पर रिलेक्सेशन जरूर दिया जा सकता है किंतु एकदम से महंगाई को खत्म नहीं किया जा सकता। महंगाई का बढ़ना समय का शाश्वत सत्य है।

बाजारों में बढ़ती भीड़ को देखकर कभी मुझे लगा ही नहीं कि महंगाई है! लोग खरीददारी पर खरीददारी किए चले जा रहे हैं। एक-एक दुकान पर इत्ती-इत्ती भीड़ है कि पैर रखना तक मुश्किल। सड़कों पर पैदल चलना तक मुहाल है। लोग जित्ता दुकान के अंदर से खरीद रहे हैं, उत्ता ही बाहर (फड़-ठेलों) से भी। हां, खरीददारों की हैसियत जरूर अलग-अलग हो सकती है लेकिन बाजारों में भयंकर खरीददारी जारी है।

जमाना बदला है। अब आदमी की जरूरत केवल रोटी-कपड़ा-मकान नहीं रह गई है। आदमी जरूरत में अब कार, मोबाइल और मनोरंजन भी शामिल हो गया है। दाल-रोटी खरीदने वाला आम आदमी कपड़े और मोबाइल भी उसी चाव से खरीदता है। मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के बीच 'परचेसिंग सेंस' बेइंतहा बढ़ा है। पहले घरों में साईकिल रेयर मानी जाती थी, अब तो महंगी से महंगी कार तक रेयर न रही। हर दूसरे घर में फर्स्ट या सेकेंड कार मिल ही जाएगी। फिर भी रोने वाले रोते हैं कि हाय! महंगाई बहुत है। अगर महंगाई है तो बाजारों में इत्ती भीड़ क्यों हैं प्यारे?

गजब यह है कि महंगाई पर सियापा करते वक्त हम लोगों की बढ़ती सैलरी का रेशो नहीं देखते। महंगाई अगर बढ़ी है तो सैलरियों में भी तो इजाफा हुआ है। समाज में 100 रुपए किलो दाल खरीदने वाले भी हैं और 10 हजार का स्मार्टफोन खरीदने वाले भी। बाजारों में सबकुछ बिक रहा है। चाहे महंगाई हो या न हो। यहां तो ऐसे लोग भी हैं, जो 60 हजार का आईफोन एक झटके में खरीद लेते हैं। फिर बताओ प्यारे, कहां है महंगाई?

महंगाई के बढ़ने को जिसने दिल पर लिया, वो 'अवसाद' में डूबता चला गया। अमां, अवसाद में जाने की यहां और भी वजहें मौजूद हैं, केवल महंगाई को लेकर अवसाद में जाना 'स्मार्टनेस' नहीं। महंगाई है तो कम खाइए या कम में गुजारा कीजिए। क्या जरूरी है, महंगाई के लिए हर वक्त रोना ही रोया जाए?

देखो जी, महंगाई न किसी के रोने से रुकने वाली है, न किसी के सड़कों पर चीखने-चिल्लाने से। उसका काम है बढ़ना है, वो बढ़ेगी ही। सरकारें आएंगी जाएंगी किंतु महंगाई को अपनी चाल चलना है वो अनवरत चलती ही रहेगी। खामखा, सरकारों और नेताओं को महंगाई के वास्ते गरियाकर अपनी जुबान को मैला करना। जस्ट चिल्ल डूड।

मेरी मानिए, महंगाई को अपना दोस्त बना लीजिए। उसके साथ गलबहियां कीजिए। महंगाई के घटने-बढ़ने को मनोरंजन का साधन बनाइए। फिर देखिएगा महंगाई कभी चिंता का कारण नहीं बनेगी। चिंता का रास्ता चिता तक लेकर जाता है, इत्ता ध्यान रखें। महंगाई पर खाक डालिए। क्योंकि और भी गम हैं दुनिया में महंगाई के सिवा।

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

बे-पढ़े-लिखे होने के फायदे ही फायदे

मुझे पढ़े-लिखे लोगों के बीच बैठने में असहज-सा महसूस होता है। उनकी बड़ी-बड़ी ज्ञानपूर्ण बातें मेरे पल्ले नहीं पड़तीं। पढ़े-लिखे लोग हर बात, हर मुद्दे में दिमाग को बीच में ले आते हैं। वे दिमाग से ज्यादा सोचते हैं। जबकि मैं अपने दिमाग को रत्तीभर कष्ट नहीं देना चाहता। मेरी कोशिश यही रहती है कि दिमाग को जित्ता ज्यादा 'आराम' मिले, उत्ता सही। एंवई दिमाग पर 'प्रेशर' डालके क्या फायदा!

आजकल जैसा जमाना चल रहा है, उसमें दिमागवालों की जरा भी 'कद्र' नहीं। जो जित्ता बड़ा दिमागवाला, वो उत्ता बड़ा बेवकूफ। बेवकूफी के साथ जी गई जिंदगी ज्यादा 'खुशनुमा' होती है। टेंशनरहित रहती है। वो कहते भी हैं न कि बने रहोगे लुल्ल तनखाह पाओगे फुल। इसीलिए मेरी कोशिश ज्यादा से ज्यादा बेवकूफ या लुल्ल ही बने रहने की रहती है। मैं मेरे लेखन से लेकर दफ्तर तक में अक्सर अपनी लुल्लता का प्रदर्शन करता रहता हूं। बड़ा सुकून मिलता है।

ज्यादा पढ़े-लिखे होने में दिक्कतें भी ज्यादा रहती हैं। कम पढ़ा-लिखा कैसे भी, कहीं से भी अपना काम चला ही लेता है। ज्यादा कुछ नहीं तो नेता-विधायक-सभासद ही बन जाता है। राजनीति का क्षेत्र बे-पढ़े-लिखों के वास्ते सबसे मुफीद जगह है।

देखिए न, नौंवी क्लास फेल होने के बाद भी लालूजी के सुपुत्रजी डिप्टी-सीएम बन बैठे। भले ही उनकी अपेक्षित-उपेक्षित पर जुबान फिसल गई। तो क्या... ठीक-ठाक कुर्सी तो हासिल हो ही गई न। राजनीतिक जीवन में एक नेता को कुर्सी-पद-नाम के अतिरिक्त और क्या चाहिए होता है भला।

साथ ही, उन्होंने मुझ जैसे परम-फेलवीरों को यह आस भी बंधा दी कि हमारे कैरियर की सबसे अधिक संभावनाएं राजनीति में ही हैं। अब मैं खुद पर हाईस्कूल में तीन दफा फेल होने पर ज्यादा शर्म महसूस नहीं करता। फेल होना निश्चित ही सम्मान की बात है।

उनकी देखा-दाखी मैं भी अपनी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी को छोड़कर राजनीति में आने का मन बना रहा हूं। राजनीति में नाम कमाना कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं। दो-चार तगड़े-तगड़े बयान दे दो, लो गए ऑल-टाइम फेमस। बदनामी से नाम कमाना अब कोई शर्म की बात नहीं रही प्यारे।

पढ़े-लिखों की सोहबत से कहीं ज्यादा भली है बे-पढ़े-लिखों की सोहबत। कम से कम इसमें आगे बढ़ने के चांस तो हैं। डिप्टी-सीएम या नेता-मंत्री बनने का रास्ता तो खुल जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने 'अपेक्षित' को 'उपेक्षित' पढ़ा है। फर्क पड़ता है, आपके ऊंचे औहदे से। राजनीति में रहने का सबसे बड़ा सुख तो यही है। है कि नहीं...।

सोमवार, 23 नवंबर 2015

अपेक्षित जुबान की उपेक्षित फिसलाहट

ऐसा नहीं है कि जुबान सिर्फ नेता की ही 'फिसलती' है, कभी-कभार आम आदमी की भी फिसल जाती है। किंतु आम आदमी की फिसली जुबान के चर्चे मीडिया या सोशल साइसट्स पर नहीं होते। हां, नेता की जुबान के फिसलने का नोटिस हर जगह से लिया जाता है। नेता की गलती न होने के बावजूद उसे 'बलि का बकरा' बना दिया जाता है। घोर अपमान।

जुबान के फिसलने में दोष जुबान का होता है लेकिन गर्दन बेचारे नेता की ही पकड़ी जाती है। यह सरासर नाइंसाफी है। नेता के बयान को इत्ती-इत्ती बार चैनलों पर चलाया जाता है कि बेचारे नेता भी शर्म के मारे पानी-पानी हो जाता होगा! मगर अपना 'दर्द' कहे किससे। यहां तो हर कोई उसकी फिसली जुबान की चोक लेने को तैयार बैठा है।

देखिए न, लालूजी के सुपुत्र के मुंह से 'अपेक्षित' की जगह 'उपेक्षित' क्या निकल गया, मीडिया से लेकर सोशल प्लेटफार्म तक 'हल्ला' मच गया। हर कोई अपने-अपने तरीके से उनकी मजाक बनाने में लग गया। ठीक है, जुबान अपेक्षित की जगह उपेक्षित पर फिसल गई। होता है, होता है। पहली बार है। शपथ लेते वक्त अक्सर जुबान यों ही फिसल जाया करती है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि बंदे में खोट है। बंदा जनता के इरादों पर एकदम 'अपेक्षित' (!) ही उतरेगा। अपेक्षित या उपेक्षित का किसी के नंवी या दसवीं पास-फेल होने से कोई फरक नहीं पड़ता। राजनीति में केवल कद का पऊआ चलता है। आखिर मियां इलेक्सन जीतकर आए हैं। कोई हंसी-मजाक थोड़े है।

फिर यह क्यों नहीं समझते, इत्ती भीड़ के बीच शपथ-पत्र पढ़ना कोई आसान बात थोड़े न होती है। पहली बार में तो सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। मुझे ही देख लीजिए, जब कक्षा दस में मैं पहली दफा फेल हुआ था, तब मन में बड़ी झिझक टाइप होती थी, कि लोग क्या कहेंगे? मोहल्ले वालों के बीच कैसे छवि बन जाएगी। लेकिन बाद में जब दो-तीन बार लगातार फेल होता चला गया फिर न मन में झिझक रही न लोगों के कहने का डर। मुझे तो आज भी कक्षा दस में तीन दफा फेल होने पर 'गर्व' टाइप फील होता है।

मैं पुनः कह रहा हूं, उनकी अपेक्षित की जगह उपेक्षित पर बस जुबान ही फिसली थी। बाकी सब ठीक-ठाक है। उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी वो उपेक्षित (आईमीन- अपेक्षित) तरीके से संभाल पाएंगे। देखते रहिएगा...। लालूजी के सुपुत्र हैं आखिर।

वैज्ञानिक लोग इत्ती-इत्ती खोजें करते रहते हैं परंतु जुबान के 'न' फिसलने की दवाई अभी तलक न खोज पाए हैं। कि, बंदा कुछ कहने-बोलने से पहले एक दफा जुबान न फिसलने की गोली खा ले और फिर शालीनता के साथ बोलता रहे। ये ससुरी जुबान की फिसलाहट बहुत बड़े-बड़े टंटे करवा देती है कभी-कभी तो। झेलना बेचारे नेताओं को पड़ता है।

जुबान की फिसलाहट पर 'मेडिकली लगाम' का कसा जाना आज के समय की बड़ी मांग है।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

आम आदमी त्रस्त, महंगाई मस्त

महंगाई के मसले पर एक दफा फिर से चोचें लड़ना शुरू हो गई हैं। नेता लोग चुनाव की खुमारी से बाहर निकलकर महंगाई पर बोलने-चिल्लाने लगे हैं। गाय-बीफ-असहिष्णुता-अवार्ड वासपी की नौटंकियों को परे रख मीडिया भी महंगाई पर 'फोसक' कर रहा है। रही बात आम आदमी की वो कल भी महंगाई से त्रस्त था, आज भी त्रस्त ही है। नेता, राजनीति और समाज के बीच उसकी भूमिका महंगाई को सिर्फ सहते रहने की है, बोलने की नहीं। अगर बोलेगा भी तो यहां कौन है उसकी सुनने वाला!

इसीलिए आम आदमी अपनी त्रस्त कंडिशन में भी हर दम मस्त रहता है। मस्त न रहे तो और क्या करे? न महंगाई को काबू करना उसके अधिकार क्षेत्र में है, न महंगाई को बढ़ना उसके बस की बात है। हां, महंगाई को लेकर दो-चार-पांच दिन आंसू बहना उसे जरूर आता है। बहाता भी है। लेकिन यहां फुर्सत किसे है, आम आदमी के आंसूओं को देखने की। नेता लोग अपनी में तो मीडिया अपनी में मस्त है। ऐसे में आम आदमी की तो रहने ही दीजिए।

सच बोलूं, अब तो महंगाई का मसला मुझे 'भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी बौराए' टाइप लगने लगा है। महंगाई को लेकर चाहे जित्ता नेताओं को गरिया लो, चाहे जित्ता व्यवस्था को कोस लो, चाहे जित्ता जमाखारों को लतिया लो पर महंगाई की सेहत पर कहीं कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वो अपनी ही गति से मस्त घटती-बढ़ती रहती है। सरकारें आती हैं, जाती हैं किंतु महंगाई का मसला जस का तस बना रहता है।

दरअसल, पिछली सरकार ने आम आदमी को महंगाई की खूब प्रैक्टिस करवाई थी। महंगाई के चलते आम आदमी को हर हाल में जीना-रहना बताया था। उसे इत्ता मजबूर कर दिया था कि वो अपनी जरूरत का सामान बिन खरीदे रह ही न सके। सो, तब से लेकर अब तक आम आदमी महंगाई के भिन्न-भिन्न रूपों को अलग-अलग तरीके से झेल रहा है। महंगाई अब उसकी आदत बन चुकी है। 100 रुपए किलो दाल या 80 रुपए किलो प्याज के बिकने से उसकी सेहत पर ज्यादा कुछ असर नहीं पड़ता। पेट की आग को शांत करने के लिए, ठंडा पानी तो पीना ही पड़ेगा न। है कि नहीं...।

लोग गलत कहते हैं कि महंगाई डायन है। डायन महंगाई नहीं, डायन तो व्यवस्था है, जो इत्ता खाकर भी हर वक्त और खाने की इच्छा रखती है। बेचारी महंगाई को दोष देने से क्या हासिल? न अपने चाहे से वो बढ़ती है, न अपने चाहे से वो घटती। जैसा नेता-सत्ता-व्यवस्था उसे चलाते हैं, वो चलती है। इसीलिए तो महंगाई की चाल को मस्ती की चाल कहा जाता है।

आम आदमी की मानिंद पहले मैं भी महंगाई के मसले को लेकर खासा परेशान रहता था। हर समय सरकार और नेताओं को कोसता रहता था। मगर फर्क फिर भी किसी की सेहत पर कोई नहीं पड़ता था। सब अपनी-अपनी में मस्त रहकर जिंदगी का मजा लेते रहते थे। फिर धीरे-धीरे कर मैंने भी नेताओं और सरकारों को कोसना बंद कर दिया। अपने तरीके से बढ़ती महंगाई को एंजॉय करने लगा। यों, कुढ़ते रहने से तो बेहतर है कि महंगाई को एंजॉय ही किया जाए। खामखा अपना दिमाग और जुबान खराब करने से क्या हासिल प्यारे।

अब तो अगर महंगाई बढ़ती भी तो भी मैं किसी को नहीं गरियाता। महंगाई को मस्ती के साथ एंजॉय करता हूं। 100 रुपए किलो की दाल और 80 रुपए किलो का प्याज खरीदकर लंबी तानकर सोता हूं। जब नेताओं-सरकारों को मेरी फिकर नहीं तो भला मैं क्यों करूं? मस्त रहो। एंजॉय करो। महंगाई को अपनी चाल चलने दो, जैसे अक्सर सेंसेक्स चला करता है।

मेरी बात मानिए, महंगाई की चिंता करना छोड़ ही दीजिए। महंगाई को अपने हाल पर खुश रहने दें और हम-आप अपने हाल पर खुश रहें। इसी में समझदारी है। बाकी आपकी मर्जी।

रविवार, 15 नवंबर 2015

असहिष्णुता पर बमचक

असहिष्णुता पर 'तगड़ी बमचक' मची है। चारों तरफ से असहिष्णुता का शोर ही सुनाई दे रहा है। गली के नुक्कड़ पर खड़े लोग असहिष्णुता पर बात करते हुए मिल जाते हैं। दफ्तर में भी कोई न कोई बंदा असहिष्णुता पर बहस छेड़ ही देता है। असहिष्णुता का आलम यह हो लिया है कि मुझे अपनी परछाई भी अब असहिष्णु-सी लगने लगी है!

सड़क चलते या घर में रहते किसी से ऊंची आवाज में बोलने से भी अब डर लगता है, कहीं मैं असहिष्णु न करार दिया जाऊं। अब तो पत्नी के बनाए खाने पर भी ज्यादा ना-नुकूर नहीं करता। खाना जैसा बनकर आ जाता है, खा लेता हूं। खाना चाहे दिन में दो बार मिले या एक बार या न मिले तो भी कोई नहीं। किंतु प्रतिवाद नहीं करता। क्या भरोसा पत्नी मुझे असहिष्णु समझ ले। असहिष्णु समझ, मेरे खिलाफ कहीं राष्ट्रपति भवन तक मार्च न निकाल दे। मेरी असहिष्णुता पर अखबारों में लेख न लिख दे। इसीलिए, घर में न बहस करता हूं, न प्रतिक्रिया देता हूं। चुपचाप पत्नी की हां में हां मिलता रहता हूं। ताकि घर में सहिष्णुता कायम रह सके।

मेरे ज्यादा प्रतिवाद न करने पर पत्नी को भी लगने लगा है कि मैं 'सुधर' गया हूं। इसलिए वो अब मुझसे खुश-खुश सी रहती है। लेकिन उसे क्या बताऊं, बाहर का माहौल क्या है? विपरित विचार या असहमति को तुरंत असहिष्णुता की कैटेगिरी में रख, हंगामा काटा जा रहा है। जो सालों-साल से बिलों में दुबके बैठे थे, अब बाहर निकल आएं हैं। और, जनता को असहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे हैं। मानो, इससे पहले न समाज, न देश, न लोगों के बीच असहिष्णुता कभी रही ही न हो।

असहिष्णुता पर इत्ता हंगामा कट जाने के बाद धीरे-धीरे ये शब्द 'मनोरंजन' की पंक्ति में आता जा रहा है। लोग कथित असहिष्णुता पर 'गंभीर' कम, 'मजाकिया' अधिक लगने लगे हैं। असहिष्णुता का आलम ठीक वैसा ही है, जैसा पुरस्कार लौटाने वालों का। उन्होंने भी पुरस्कार लौटा-लौटाकर खुद को 'हंसी का पात्र' बना लिया है। तर्क ये पेश कर रहे हैं कि देश-समाज में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है इसलिए पुरस्कार लौटा रहे हैं। यानी, इससे पहले देश-समाज में सबकुछ ठीक-ठाक व सहिष्णु था। कमाल है प्यारे।

लेखकों के साथ विपक्ष भी खूब है। असहिष्णुता का वास्ता देकर इत्ता लंबा मार्च निकाल देता है। मगर इससे पहले देश में हुईं हिंसक वारदातों पर वे भी चुप्पी साधे रहे। कुछ न बोले। तब शायद, उनकी निगाह में, असहिष्णुता के मायने कुछ और ही हों।

कथित असहिष्णुता की बहती नदी में हाथ धोना बैठे-ठालों का काम है। जिसे वे पूरी शिद्दत के साथ कर रहे हैं। सत्ता और सरकार जब बदलती है, तब कुछ लोग 'हाशिए' पर चले ही जाते हैं। जो हाशिए पर चले जाते हैं, वो चर्चा या लाइम-लाइट में बने रहने के लिए कुछ तो करेंगे ही। फिर ये ही सही...।

मैंने तो खुद को टाइम के हिसाब से एडजस्ट कर लिया है। असहिष्णुता पर चल रही नौटंकियों का मजा घर बैठे ले रहा हूं। जुबान पर ताला लगाकर रखता हूं, कहीं बहक न जाएं। फिर मुझे भी कहीं असहिष्णु घोषित न कर दिया जाए। गर्म माहौल में खुद को 'कूल' रखने का ढंग आता मुझे। तब ही तो न पत्नी से झगड़ता हूं, न दफ्तर में 'इफ एंड बट' करता हूं, न ठेले वाले से मोल-भाव करता हूं; क्या पता कौन मुझे असहिष्णु समझ ले!

बेहतर ये है कि अपनी सहिष्णुता को बचाकर रखिए। असहिष्णुता पर हंमागा काटने वालों को 'टोटल इग्नोर' कीजिए। मस्त रहिए। मनोरंजन में बिजी रहिए। क्योंकि और भी गम हैं दुनिया में असहिष्णुता के सिवा।

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

बिहार में गली दाल

जिस दाल को लेकर दिल्ली समेत पूरे देश में 'हो-हल्ला' कट रहा था, आखिरकार नीतीश बाबू ने उसे बिहार में- महागठबंधन के सहारे- 'गलाकर' दिखला ही दिया। साफ शब्दों में कहूं तो बिहार में दाल गली और दिल्ली में दिवाला निकाला। जी हां, दीवाली से पहले हुआ यह 'महा-धमाका' किसी 'दिवाला निकल जाने' से कम नहीं बीजेपी के लिए।

भक्तों द्वारा बिहार की कथित जीत के वास्ते जमा करके रखे गए पटाखे सुबह तो खूब धूम-धाम से जले लेकिन दोपहर होते-होते पटाखों पर 'सील' जमने लगी और धूम-धाम 'फिकी' पड़ गई। इत्ती बड़ी हार की उम्मीद तो खूब प्रधानमंत्रीजी ने भी न की होगी। इत्ते बड़े-बड़े वायदों के अच्छे दिन दिखाने के बाद भी बदले में हार की सौगात ही मिली। करोड़ों के दिए पैकेज पर पानी फिरा सो अलग। न गाय का उन्माद काम आया, न बीफ पर राजनीति ने रंग दिखाया, न सहिष्णुता-असहिष्णुता का ड्रामा चला, न पोती गई कालिख ने ही कोई सहारा दिया। अंत में, जनता महागठबंधन को जीता कर ही मानी।

यह हकीकत स्वीकार कर ही लीजिए कि राजनीति में 'अच्छे दिन' की बहार बार-बार नहीं आती। अच्छे दिन सुनने में बहुत भाते हैं परंतु अच्छे दिन काम करने, सबको साथ लेकर चलने से ही आ पाते हैं। लेकिन यहां तो अच्छे दिनों के बहाने कुछ अलग टाइप की राजनीति हुई। ऐसे-ऐसे धांसू टाइप बयान सुनने को मिले कि बिचारी जुबान भी शर्मा गई। इन्होंने असहिष्णुता को भुनाने में पूरा आनंद लिया तो उन्होंने जातिवाद की धार को मोथरा नहीं होने दिया। और बिहार में जाति का सिक्का चल ही गया।
 
चुनावों में जो हुआ, जैसा हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ जीत मिलने के बाद इस पर ध्यान भला कौन देता है। प्रमुख तो जीत ही होती है। जीत के आगे हर समीकरण फेल है। थोड़े दिनों के बाद लोग जाति, असहिष्णुता, भद्दी जुबान सबको भूल जाएंगे। भूलना ही नियति है। जो जीता वही सिकंदर है यहां।

बहरहाल, हार का ठिकरा और जीत का सेहरा चाहे किसी के सिर पर फोड़ते या बांधते रहिए। जो होना था, हुआ। बिहार में महागठबंधन की दाल गल चुकी है, अब यही सत्य है। हां, देखना अब यह होगा कि यह दाल कित्ते दिनों तलक गली रह पाती है। कित्ते लोग साथ बैठकर इस गली दाल को खा-पचा पाते हैं। सनद रहे, महागठबंधनों की दालें पहले भी गलकर सूख चुकी हैं।

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

बाजार, विज्ञापन और दीवाली

पहले जरूर दिवाली पर- विज्ञापनों से भरे हुए मोटे-मोटे अखबार- देखकर सिर चकराता था। भिन्न-भिन्न टाइप की गालियां अखबार और विज्ञापनों पर निकालती थीं। अखबार में खबर के दर्शन न हो पाने का बड़ा मलाल रहता था। हर पेज पर किस्म-किस्म के 'डिस्काउंट ऑफर्स' देखकर खून खौलता था। लेकिन धीरे-धीरे खुद को मैंने वक्त के साथ ढाला और अखबारों में आने वाले त्यौहारी विज्ञापनों को सहजता के साथ लेना शुरू किया। गरियाने का कोई फायदा न था। सिर्फ एक अकेले मेरे गरिया देने भर से न अखबार विज्ञापनों को छापना बंद कर देंगे, न विज्ञापन एजेंसियां अखबारों में विज्ञापन देना। बेहतर रास्ता यही है कि खुद को इनके बीच 'एडजस्ट' किया जाए। एडजस्ट करने में ही 'परम सुख' है।

त्यौहार का मतलब अब वो नहीं रहा, जो पहले कभी किसी जमाने में हुआ करता था। पहले लोगों कने खूब टाइम था, एक-दूसरे से मिलने का, एक-दूसरे के घर जाने का, अपनी छोटी से छोटी खुशी एक-दूसरे के साथ बांटने का। अब किसी के पास इत्ता समय भी नहीं कि वो त्यौहार के असली महत्त्व को अपने बच्चों को समझा सके। सब अपनी-अपनी धुन में मस्त और व्यस्त हैं। ऐसे लोगों के लिए बाजार ने बीच का 'इजी' रास्ता ढूंढ़ निकाला, डील के साथ त्यौहार मनाने का।

प्रत्येक रिश्ते के साथ-साथ अब हर त्यौहार भी ऑन-लाइन है। किसी को कहीं जाने की जरूरत नहीं। घर बैठे ही खरीददारी करें। घर बैठे ही अपनों को विश करें। रिश्तों को मजबूत करने के लिए ऑन-लाइन गिफ्ट बुक करवाकर उन्हें खुश करें। बाजार के पास आपकी हर इच्छा का समाधान है। त्यौहार को कैसे किस प्रकार के डिस्काउंटों के साथ मना सकते हैं, बाजार सब जानता-बताता है।

सुनने में आया है कि इस दीवाली मिठाई से कहीं ज्यादा मोबाइल फोन और कारें बिकी हैं। सेहत को ध्यान में रखते हुए 'पारंपरिक मिठाई' से इतर तमाम ऑप्शन बाजार ने उपलब्ध करवा दिए हैं। कुछ मीठा हो जाए के लिए अब मिठाई का होना ही जरूरी नहीं, ये काम चॉकलेट भी बखूबी कर सकती है। दीवाली की खुशियां चॉकलेट के संग।

गजब तो ये है कि बाजार में चाहे कित्ता भी महंगा मोबाइल फोन आ जाए, उसके खरीददार आपको हर वर्ग के मिलेंगे। वो त्यौहार की क्या जो नए मोबाइल फोन के साथ सेलिब्रेट न किया जाए। यों भी, दीवाली पर नया फोन लेना अब 'शगुन' का हिस्सा-सा बनता जा रहा है। लगभग यही स्थिति कारों में भी है। अब तो लगभग हर घर में कार है। बाजार के असर ने लोगों को कार की आदत-सी डाल दी है। त्यौहार पर कार पर मिले ऑफर्स सोने पे सुहागा।

आजकल के जमाने में समझदारी बाजार के साथ चलने में ही है। बाजार से इतर चलेंगे तो न रिश्तों का मजा ले पाएंगे, न त्यौहार का। त्यौहार के बहाने अब कमाई ही महत्त्वपूर्ण है, चाहे वो अखबार हो या विज्ञापन एजेंसियां। बाजार को कोसने से बेहतर है, उसके संग-साथ चलें। बाजार जो दे रहा है, पूरी खुशी और विश के साथ लें। क्योंकि आना वाला समय केवल बाजार और ऑफर्स का ही है।

इसीलिए तो मैंने खुद को अखबार और विज्ञापन के साथ एडजस्ट कर लिया। मनोरंजन के लिए खबरों से इतर भी तो कुछ होना चाहिए न अखबारों में। फिर किस्म-किस्म के विज्ञापन क्या बुरे हैं। विज्ञापन भी मनोरंजन का दूसरा नाम ही तो है।

दीवाली की खुशियां-मस्तियां अपनों के साथ बाजार और ऑफर्स के साथ मनाएं, सुकून मिलेगा। तब ही तो बाजार ने इसे 'डील वाली दिवाली' नाम दिया है।

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

दाल न गल पाने का अफसोस

बहुत दिनों से मैं दाल गलाने की कोशिश में हूं। लेकिन दाल है कि गलके ही नहीं दे रही। जित्ता गलाने का प्रयास करता हूं, दाल उत्ती ही सख्त होती जाती है। जबकि मेरे मोहल्ले में मेरे अलावा सबकी दाल अच्छे से गल रही है। बाकायदा मोहल्ले वालों के घरों से दाल गलने की जोर-जोर से आवाजें आती हैं। दाल गलने पर इत्ता खुश पहले कभी मैंने उन्हें नहीं देखा।

दो रोज पहले पड़ोसी प्यारेलाल मिले। मैंने उनसे उनकी दाल गलने का राज पूछा तो बोले- 'बेशक महंगी दाल को गलाने में 'मेहनत' लगती है पर मेरी घरवाली कैसे न कैसे करके गला ही लेती है। दाल का पीछा वो तब तलक नहीं छोड़ती, जब तलक दाल पूरी तरह से गल नहीं जाती। एक दाल ही नहीं, वो तो हम सबको भी बहुत अच्छे से गलाना जानती है। प्रत्यक्ष उदाहरण आपके सामने है।'

बहुत देर तक प्यारेलाल की घरवाली के दाल गलाने के बारे में सोचता रहा। फिर घर पहुंचकर पत्नी को बोला- 'प्रिय, अभी प्यारेलाल मिले थे। बता रहे थे कि उनकी घरवाली इत्ती महंगी दाल को भी जमकर गला लेती है। पर तुमसे क्यों नहीं गलती? आखिर कहां कमी रह जाती है?'

मेरी बात सुन लेने के बाद पत्नी ने उत्तर दिया- 'तुममें और उनमें 'नाम' का नहीं, 'स्टेटस' का भी बड़ा 'फर्क' है।' 'नाम का तो समझ में आता है मगर स्टेटस का दाल के गलने न गलने से क्या मतलब।' मैंने तुरंत पूछा।

वो बोली- 'फर्क बहुत बड़ा फर्क पड़ता है। ये 200 रुपए किलो वाली दाल केवल स्टेटस वालों की ही गल रही है। तुम्हारे जैसे मामूली लेखकों की नहीं। पुरस्कार की तरह दाल भी अब तुम लेखकों के पास आने से डरने लगी है, क्या भरोसा कब लौटा दो! तुम दाल खरीद जरूर रहे हो, गल वो फिर भी नहीं पा रही क्योंकि तुम लेखक हो और मैं लेखक की पत्नी। दाल को सब मालूम रहता है कि उसे किस स्टेटस की बंदी गला रही है, किस स्टेटस की नहीं।'

पत्नी का जवाब सुनकर मैं 'हैरत' में पड़ गया। मैंने तो दाल के न गल पाने का कारण कुछ और ही समझ रखा था, लेकिन पत्नी ने तो कुछ और ही समझाया। क्या लेखक होना इत्ता बुरा है? फिर दो मिनट बाद मैंने अपने लेखक होने पर लानत भेजते हुए खुद से ही कहा- भला ऐसा लेखक होने से भी क्या फायदा जिसकी दाल ही न गल पाए।

कुछ देर सोचने के बाद मैंने तय किया, अब मैं अपना स्टेटस ही बदल डालूंगा। अपना स्टेटस वो वाला कर लूंगा, जिसमें रहकर महंगी से महंगी दाल घरवाली खूब अच्छे से गला पाए। फिर न दाल को शिकायत रहेगी, न घरवाली को।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

बीवी और पुरस्कार

बीवी मुझसे नाराज होने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देती। कभी-कभी तो बेमतलब और बेमकसद ही मुझ पर नाराज होकर अपनी 'अंदरूनी भड़ास' निकाल लेती है। अच्छा, मैं भी उसकी नाराजगी पर ज्यादा कुछ नहीं बोलता। सिवाय, हां-हूं करके रह जाता हूं। अपनी बचाए रखने का एक ये ही मेरे तईं बीच का रास्ता है। समंदर में रहकर भला मगर से बैर!

फिलहाल, बीवी को मुझसे नाराज होने का एक और ताजा बहाना मिल गया है। वो मुझ पर इस बात को लेकर कुपित है कि मैंने लेखन के मैदान में रहते हुए अभी तलक कोई पुरस्कार-सम्मान क्यों हासिल नहीं किया? अभी परसों ही कहने लगी- 'देखा तुमने, हर लेखक अपना-अपना पुरस्कार लौटाने की भेड़चाल में लगा हुआ है। जमकर मीडिया के बीच फुटेज पा रहा है। हर अखबार के पहले पेज पर लेखक और पुरस्कार के ही चर्चे हैं। और एक तुम हो, जो बंद कमरे में बैठे-बैठे कागज पर कागज 'बर्बाद' किए जा रहे हो। लेखक जरूर हो पर तुम्हें न घर में कोई जाने है, न बाहर।'

बीवी के कहे का ज्यादा 'प्रतिवाद' न करके मैं केवल इत्ता ही कहा- 'रूपमती, वो सब बड़े लेखक हैं। बड़े-बड़े पुरस्कार उन्हें मिले हैं। और, सबसे बड़ी बात वे सब एकजुट होकर अन्याय व हिंसा के खिलाफ अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। मैंने भी इसके संबंध में एक लेख लिखा है। कहो तो सुनाऊं।'

इत्ता सुनते ही बीवी आग की माफिक भड़क ली। 'तुम अपना 'आदर्श' अपने कने रखो। खुद ही लिखो। खुद ही पढ़ो। अरे, ये सब बड़े-बड़े लेखकों की 'स्टंटबाजी' है। मैं सब अच्छे से जानती हूं। देश और समाज में हिंसात्मक घटनाएं कोई नई नहीं हैं। सदियों से होती चली आई हैं। तब तो किसी नामी-गिरामी लेखक ने अपना पुरस्कार नहीं लौटाया? अब ही कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा है?'

मैंने पुनः समझाने की कोशिश की- 'नहीं.. नहीं.. ऐसा कतई नहीं है। अगर वे अपना पुरस्कार लौटा रहे तो कुछ सोच-समझकर ही लौटा रहे होंगे। वो सब 'ज्ञानी' लोग हैं। बरसों से साहित्य की 'सेवा' करते चले आए हैं। नहीं तो आज के समय में इत्ता बड़ा 'रिस्क' भला कौन लेगा? वे सब साहित्य की 'मशाल' हैं।'

'मशाल हैं, ये तुमसे किनने कहा दिया?'- बीवी ने मुझसे लगभग हड़काने के लहजे में पूछा। 'अरे, कहा मुझसे किसी ने नहीं, पर मुझे मालूम है।' मैं उत्तर दिया। 'अच्छा.. अच्छा.. लगता है, तुम्हारा दिमाग घास चरने का बेहद शौकिन है। तुम इन बड़े लेखकों की राजनीति समझ ही नहीं पा रहे। ये पुरस्कार-फुरस्कार ठुकराना तो महज बहाना है, असली मकसद खुद को 'चर्च' में लाना है। सरकार बदलने के बाद उन्हें कोई पूछ नहीं रहा था न इसलिए...।'- बीवी ने एक सांस में जवाब दे डाला।

बहस को थोड़ा खिंचते हुए मैं बोला- 'तुम्हारी सोच वरिष्ठ लेखकों-साहित्यकारों के प्रति ठीक नहीं। इसे बदलो। एक तो वे इत्ता बड़ा सम्मान लौटा रहे हैं और तुम हो कि उन्हें ही कटघरे में खड़ा करे दे रही हो। आज के दौर में मिला हुआ पुरस्कार कौन लौटाता है भला? असर देखो, अब तो नेता लोग भी लेखकों की जिद का नोटिस लेने लगे हैं।'

अब तो बीवी के सब्र का बांध टूट चुका था। तपाक से उबल पड़ी- 'क्यों तुम्हें क्या इन लेखकों से उनकी 'तारीफ' करवाने की 'सुपारी' मिली हुई है? अपनी 'औकात' देख नहीं रहे, चले हो मुझे उनकी औकात समझाने। मैं तुम्हें और इन बड़े लेखकों-साहित्यकारों को खूब अच्छे से जानती हूं। ये बाहर कुछ कहते और मन में कुछ रखते हैं। अगर तुमने इनका ज्यादा 'पक्ष' लिया न तो कल से घर में तुम्हारा दाना-पीना बंद कर दूंगी। समझे। बड़े आए लेखकों की पैरवी करने वाले।'

अब मैंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। क्या पता लेखकों का पक्ष लेते-लेते मैं ही 'बे-पक्ष' हो जाऊं! दाना-पानी बंद हो गया तो कहां जाऊंगा? मुझे तो ढंग से दाल गलानी भी नहीं आती! यों भी, दाल का भाव 200 रु के पार निकल गया है। मैं लेखक जरूर हूं पर बीवी से बड़ा नहीं। इसलिए जो लौटा रहे हैं, उन्हें लौटाने दो। खुद सिर्फ 'मनोरंजन' से मतलब रखो।