गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

डिसलाइक बोले तो 'कलेस'

पियारे मार्क जुकरबर्ग,

चाहे जैसी चल रही है पर फेसबुक पर अपनी लाइफ एकदम मस्त चल रही है। कहीं किसी से कोई झगड़ा-टंटा नहीं। कोई मुंह-जोरी नहीं। लाइक का जवाब लाइक से। कमेंट का जवाब कमेंट से। इन-बॉक्स का जवाब इन-बॉक्स में।

दरअसल, फेसबुक पर रहते इत्ते सालों में मैंने एक यही बात अच्छे से समझी-जानी है कि यहां जित्ता 'कूल' बने रहोगे, उत्ता ही मजे करोगे। बेमतलब की 'हॉटनेस' यहां किसी काम की नहीं। मेरी निगाह में फेसबुक टाइमपास और हल्ले-फुल्के जोक या वन-लाइन को शेयर करने-करवाने का जरिया है, बाकी यहां क्रांति-फ्रांति की बात, खुद को महज दिलासा दिलाने जैसा है।

बहरहाल, इन दिनों यह खबर गर्म है कि तुम फेसबुक पर 'डिसलाइक' का विकल्प भी लाने वाले हो। यानी, अब फेसबुकिया किसी भी पोस्ट या फोटू को अपनी इच्छा से डिसलाइक भी कर सकेगा। डिसलाइक का हथियार उसके हाथ में होगा, चाहे किसी पर भी चला दे।

यार जुकरबर्ग, क्या हम लोगों की शांति या सोशल दोस्ती तुमसे देखी नहीं जा रही? अमां, क्यों खाली-पीली डिसलाइक का उस्तरा हाथ में देकर विरोधियों की गर्देनों को रेतवाना चाह रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं कि फेसबुक पर जरा-सी बात का जरा देर में तिल का ताड़ बन जाता है। बात दीवार को फांदती-फूंदती अखबारों के पन्नों और थाना-कचहरी तक पहुंच जाती है।

यहां लोग बाग जरा-सी असहमति-आलोचना-प्रतिक्रिया तक तो सहन कर नहीं पाते, डिसलाइक को क्या खाकर हजम कर पाएंगे? फेसबुक पर केवल मीठा-मीठा गप्प करने का चल है और कड़वा-कड़वा थू करने का। यहां कमेंट से कहीं ज्यादा तरजीह लाइक को दी जाती है। जो बंदा जित्ते लाइक पा लेता है, खुद को किसी 'फेसबुकिया-बादशाह' से कम नहीं समझता। लाइक के बदले लाइक की रिश्तेदारियां-दोस्तियां निभती हैं यहां केवल।

मेरी बात का बुरा न मानना पियारे पर डिसलाइक का विकल्प आपस में सिर्फ 'कलेस' ही करवाएगा और कुछ नहीं। डिसलाइक करते ही इन-बॉक्स में आनकर तरह-तरह के सवाल पूछे जाएंगे- तूने मेरी पोस्ट या फोटू क्यों डिसलाइक की? क्या मैं इत्ता बुरा लिखता या दिखता हूं? तुम नहीं समझ रहे, यहां फेसबुकियों पर डिसलाइक का जवाब देना का अतिरिक्त भार पड़ जाएगा। जब लोग लाइक पर भी पूर्ण-संतुष्ट नहीं हो पाते फिर भला डिसलाइक पर क्या होंगे?

कहीं बंदा कमजोर दिल का निकला और ले गया डिसलाइक को अपने दिल पर फिर तो राम ही मालिक?

डिसलाइक की आड़ में कित्ते ही अपनी खुन्नस भी निकालेंगे- क्या इसका अंदाजा है तुम्हें।

जो लोग डिसलाइक के विकल्प को लेकर बहुत खुश हो रहे हैं, वो भी सुन लें, यह दांव उन पर भी उल्टा बैठ सकता है। डिसलाइक को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं आपसी कलेस का माध्यम ही मानिए। अभिव्यक्ति की आजादी के दिन हवा हुए। अब तो जमाना लाइक देने और लेने का। सोशल नेटवर्किंग पर संबंधों की गाड़ी लाइक के दम पर ही चली रही है। इसे यों ही चलते रहने दो पियारे जुकरबर्ग।

मेरी मानो तो फेसबुक पर डिसलाइक का विकल्प चढ़ाओ ही मत। लाइक के साथ अपनी लाइफ एकदम बिंदास और मस्त चल रही है। बंदे की पोस्ट या फोटू पर लाइक मार दो तो खुश हो जाता है। सेकेंड भर में कित्ती ही दुआएं दे देता है। डिसलाइक तो केवल कलेस ही करवाएगा और कुछ नहीं।

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