बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

किस्म-किस्म की समस्याओं के आकार-प्रकार

यों तो देश में समस्याओं की कमी नहीं। जहां नजर डालो, वहां समस्या। कुछ समस्याएं तो ऐसी, जिनका कोई भी, कैसा भी समाधान खोज लीजिए फिर भी समस्या का दंश बना ही रहता है। हमारी राजनीति में तो इत्ती प्रकार की समस्याएं हैं, अगर हर एक का निदान करने बैठे तो सालों लग जाएंगे। तिस पर भी कोई गारंटी नहीं कि समस्या सुलझ ही जाए।

तमाम ऐरी-गैरी समस्याओं के बीच इधर दो-तीन प्रकार की समस्याओं को मैं बहुत शिद्दत से महसूस कर रहा है। ऐसी लगता है, उन समस्याओं के समाधान के बगैर हमारी जिंदगी बेगानी-सी है। मतलब, हम अब पारिवारिक रिश्तों से कहीं ज्यादा उन समस्याओं के विषय में सोचने लगे हैं।
ये समस्याएं तीन प्रकार की हैं- सेक्स समस्या, बालों के झड़ने की समस्या और चेहरे पर झुर्रियां पड़ने की समस्या।

सेक्स समस्या के बारे में तो कुछ पूछिए ही मत- सारा का सारा अखबार तरह-तरह के तेलों और कैप्सूलों के विज्ञापनों से भरा पड़ा रहता है। विज्ञापनों में छपने वाले फोटू बंदे को इत्ता 'उत्साहित' कर देते हैं कि वो फलां तेल या कैप्सूल लेने से पीछे नहीं हटता। ऐसा लगता है, इंसान की समस्त शारीरिक कमजोरी का समाधान तेल और कैप्सूल में छिपा पड़ा है। इधर कुछ सालों में सेक्स-युक्त विज्ञापनों की ऐसी बाढ़-सी आई है, मानो ये समस्या अगर न सुलझी तो भारतीय पुरुष अन्य देशों के पुरुषों से 'पिछड़' जाएंगे।

बालों के झड़ने की समस्या भी कुछ ऐसी ही है प्यारे। टीवी पर फलां-फलां शैम्पूओं के इत्ते-इत्ते विज्ञापन आते हैं, अक्सर ये 'कनफ्यूजन' हो जाता है कि कौन-सा खरीदें और कौन-सा छोड़ दें। हर शैम्पू की दूसरे शैम्पू से बात निराली। कुछ शैम्पूओं के विज्ञापन तो इत्ते 'क्रांतिकारी' टाइप के होते हैं कि लगाते ही बाल 'फेविकोल' की तरह चिपक जाएं।

कभी-कभी तो महसूस होता है कि अगर बंदे-बंदी के बाल झड़ने से न रुके तो चीन कहीं हम पर हमला न कर दे!

और हां, चेहरे पर झुर्रियों की समस्या तो हमारे तईं इत्ती बड़ी है कि देश-समाज की हर बड़ी से बड़ी समस्या उसके आगे फेल है। मजा देखिए, विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली हर क्रीम आपको झट्ट से गोरा-चिट्टा बनाने का दम भरती है। बस एक दफा फलां कंपनी की क्रीम चेहरे पर लगा लीजिए फिर झुर्रियां तो क्या झुर्रियों के बाप तक का साया आपके चेहरे पर पड़ने से रहा। गोरे लगने-दिखने की चाहत ने हमें इत्ता बेताब कर दिया है कि दिन के चौबीस में से बीस घंटे तो हम अपने रूप-सौंदर्य के विषय में सोचते-सोचते ही गंवा देते हैं।

आप भले न स्वीकारें लेकिन मुझे इंसान के चेहरे पर पड़ी झुर्रियां 'राष्ट्रीय समस्या' से भी कहीं बड़ी समस्या नजर आती है। चेहरे की झुर्रियां हटाने को हम इत्ती 'मशक्त' करते रहते हैं, इत्ती तो शायद डेंगू के खात्मे के लिए भी न की होगी।

मार्केट भी यही चाहता है कि ये समस्याएं बनी रहें ताकि उनकी दुकानदारी मस्त चलती रहे। बाकी जरूरी समस्याओं पर खाक डालिए। क्योंकि उनका मार्केट नहीं है।

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