मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

राजनीति, राजनेता और मनोरंजन

बदलते वक्त के साथ राजनीति और राजनेता दोनों का ही 'फॉरमेट' बदल गया है। न अब राजनीति पहले जैसी रही, न राजनेता।

सबसे 'दिलचस्प' बात यह हुई है कि राजनीति और राजनेता (अपवादों को छोड़ दिया जाए) में से गंभीरता गायब हास्य और मनोरंजन अधिक आ गया है। यानी, जो नेता जनता का जित्ता मनोरंजन कर पाएगा, वो ही लंबे समय तक टिका-बना रहेगा। हो सकता है, मेरी कही बात खुद नेताओं के गले न उतरे, मगर पियारे सच यही है।

राजनीति और राजनेताओं के बीच सबसे ज्यादा मनोरंजन चुनावों के वक्त ही दिखने को मिलता है। पार्टियां और नेता लोग तरह-तरह के 'करतब' कर जनता को लुभाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। कोई काला धन के नाम पर जुमले बनाता है, तो कोई जंगल राज को खत्म का डायलॉग एकदम फिम्ली अंदाज में बोलता सुनाई पड़ता है। यानी, फूल-टू मनोरंजन।

देखिए न, बिहार चुनाव के मद्देनजर पार्टियों और नेताओं में किस्म-किस्म के मनोरंजन देखने-सुनने को मिल रहे हैं। कुछ नेता लोग तो अपना टिकट कट जाने पर ही 'रो-धो' रहे हैं। रोना भी इत्ता मनोरंजनात्मक कि उन्हें देखकर बच्चा भी खिलखिलाकर हंस पड़े।

वैसे, बात है तो रोने की ही। टिकट कट जाने का मतलब है, चुनाव के साथ-साथ अपनी इज्जत का 'फलूदा' बन जाना। एक तो बिचारा नेता पार्टी के वास्ते इत्ती मेहनत करे और जब चुनाव लड़ने की बात आए तो ऐन वक्त पर उसका टिकट काट दिया जाए। अब भला नेता रोए नहीं तो और क्या करे? आखिर नेता राजनीति में आता किसलिए है, चुनाव लड़ने के लिए ही न!

जो भी हो पर हम जैसे लोगों के लिए नेता का रोना भी किसी मनोरंजन से कम नहीं। नेता रोता है तो कम से कम यह तो पता चल ही जाता है कि उसके भीतर भी रोने-धोने की संभावनाएं हैं। यों भी, नेता कौन-सा अपने लिए रोता है। टिकट कटने के लिए ही तो रोता है। टिकट का क्या है, एक पार्टी नहीं तो दूसरी पार्टी टिकट देकर उसका रोना बंद कर देगी।

चाहे रो कर हो या बयान देकर राजनीति में मनोरंजन होते रहना चाहिए। मनोरंजन नहीं होगा तो राजनीति और नेता 'बोर' लगने लगेंगे। बोरियत अवसाद की जननी है। शायद यही सोचकर हमारे नेता लोग राजनीति में गंभीरता और अवसाद को नहीं आने देना चाहते।

राजनीति और नेता के बीच मनोरंजन यों ही कायम रहे, हमें और क्या चाहिए। पारंपरिक राजनीति से पिंड छुड़ाने का मनोरंजन ही मस्त रास्ता हो सकता है।

कहने वाले चाहे कुछ भी कहते रहें मगर इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि राजनीति का मजा सिर्फ मनोरंजन के दम पर ही बना हुआ है। बिना मनोरंजन के क्या राजनीति और क्या नेता। मनोरंजन चालू आहे, बस यही दुआ है।

1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और प्रेरणादायक कहानी - असली धन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।