सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

पुरस्कार लौटाओ, हिट हो जाओ

ऊपर वाले का रहम है, जो मुझे आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। मिल गया होता तो आज मेरी गर्दन एहसानों तले झुकी और जबान शुक्रिया कहते-कहते घिस गई होती।

हालांकि ऐसा कोई मानेगा नहीं परंतु सत्य ये है कि पुरस्कार लेना या मिलना दोनों की स्थितियों में लेखक के लिए 'खतरे' समान होता है। जी हां, पुरस्कार किसी 'भीषण खतरे' से कम नहीं होते। पुरस्कार पाने के लिए किस-किस प्रकार की 'तिकड़में' भिड़ानी पड़ती हैं, यह सबको मालूम है। गिरी चीज को उठाने में लेखक को जित्ती कमर नहीं झुकानी पड़ती, उससे कहीं ज्यादा पुरस्कार पाने के लिए झुकानी होती है। कुछ लेखक तो इत्ता 'पुरस्कार प्रेमी' होते हैं कि पुरस्कार मिल जाने के बाद नेताओं के कदमों में यों गिर पड़ते हैं मानो उनका 'अभूतपूर्व एहसान' जतला रहे हों।

यह दीगर बात है, पुरस्कार पाने के बाद लौटाने की 'धमकी' देना सबसे 'क्रांतिकारी कदम' है। इस 'क्रांतिकारी कदम' को उठाने में किसी दल या नेता की 'सहमति' नहीं लेनी होती, बस एक लाइन बोलनी भर होती है- 'मैं फलां-फलां पुरस्कार लौटा रहा हूं।' इत्ते में ही लेखक 'हिट' हो लेता है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों-चौराहों तक पर उसके नामों के चर्चे गुंजने लगते हैं। जाने कहां-कहां से मीडिया वाले उसका साक्षात्कार लेने पहुंच जाते हैं।

मगर लेखक भी 'घणा सियाना' होता है, पुरस्कार लौटाने की बात तो कह देता है पर यह न कहता कि पुरस्कार की राशि भी साथ में लौटा रहा हूं। क्योंकि राशि को तो वो खा-पचाकर हजम कर गया होता है। कोई अपनी अंटी से थोड़े न लौटाएगा पुरस्कार की रकम! समाज और मीडिया के बीच 'हीरो' बनने का यह तरीका निराला है प्यारे।

अभी तो दो-तीन नामी लेखकों ने ही अपना पुरस्कार लौटाने की धमकी दी है, हो सकता है, कल को लल्लन चाट वाला और टिल्लन छोले वाला भी अपने-अपने पुरस्कारों को लौटाने की घोषणा कर दें। बहती गंगा में हाथ धोने में भला क्या जाता है? इस बहाने 'फेम' मिल रहा है, यह क्या कम बड़ी बात है।

चलो अच्छा ही हुआ जो मुझे कोई पुरस्कार न मिला। नहीं तो अब तलक मुझ पर भी यहां-वहां अपना पुरस्कार लौटाने का 'प्रेशर' बनाया जा रहा होता। पर हूं मैं भी बहुत 'बेशर्म', अगर पुरस्कार मिल होता तो किसी हालत न लौटाता। अमां, पुरस्कार कोई लौटाने के लिए थोड़े न लिए जाते हैं। बात करते हैं।

उम्मीद है, पुरस्कार लौटाने की यह 'नौटंकी' अभी और खींचेगी। कुछ बड़े-छोटे नाम और सामने आएंगे। यों, घर बैठे 'मुफ्त की प्रसिद्धि' भला किसे बुरी लगती है?

पर मुझे क्या...। जिन्हें लौटाना हो लौटाए, मुझे तो 'मनोरंजन' से मतलब। मुफ्त का मनोरंजन क्या बुरा है। 

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