सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

मंगल पर पानी और डिजिटल क्रांति

बधाई हो। मंगल पर पानी खोज लिया गया है। मंगल पर जीवन होने की संभावनाएं पहले ही खोज ली गई थीं। मंगल अब कित्ता 'आसान' हो गया है न हमारे लिए।

अभी मंगल पर पानी मिला है, उम्मीद है, जल्द ही डिजिटल तरंगों के संकेत भी वहां मिलने लेगें। दुनिया में जब सबकुछ इत्ता तेजी से अदल-बदल रहा है फिर भला हमारे ग्रह उन बदलवों से पीछे कैसे रह सकते हैं। ग्रहों पर जाकर खोज करने की इंसानी कोशिशें धीरे-धीरे रंग ला रही हैं।

मुझे उम्मीद है, हमारे समाज का एक वर्ग मंगल पर बसने का मन बना भी चुका होगा। ये कोई बड़ी बात भी नहीं। जब इंसान पहाड़ों का सीना चीरकर और नदी-नालों को पाटकर अपने रहने के लिए आपर्टमेंटस-डियूप्लेक्स बना सकता है, फिर भला मंगल ग्रह पर बसना कौन-सी बड़ी बात है।

इंसान के लिए अब कुछ भी 'कठिन' नहीं रह गया है। अब हम उस युग में आ पहुंचें हैं, जहां सबकुछ डिजिटल तकनीक के हिसाब से बनने व तय होने लगा है। किसी को कहीं जाने की जरूरत नहीं। एक टच में हर चीज आपके द्वार पर हाजिर है।

मंगल पर पानी मिलना, हमारा डिजिटल क्रांति की दशा में कदम रखना, साफ संकेत दे रहा है कि आगे आने वाला समय 'टोटली डिजिटल' ही होगा। इसीलिए मैंने तय किया है कि मैं मंगल ग्रह पर 'डिजिटल ऐस्सीरिज' की दुकान खोलूंगा। धरती पर रह-रहकर अब मैं भी उक्ता चुका हूं।

मंगल पर जाकर बसने वाले कोई सामान्य लोग तो होंगे नहीं। वहां वही जाकर बस पाएगा, जिसकी अंटी में माल होगा। बिना माल आजकल धरती पर कोई किसी को नहीं पूछता फिर वो तो मंगल ग्रह ठहरा। धरती से हजारों-लाखों किलोमीटर दूर। एक नई दुनिया। नया माहौल। नया वातावरण। नए टाइप के लोग।

हां, नए टाइप के लोगों से ध्यान है, मंगल पर हमारे पड़ोसी ज्यादातर एलियंस बिरादरी के लोग ही होंगे। मंगल पर इंसान को पाकर एलियंस बेचैन तो खासा हो उठेंगे। खामखा ही उनकी शांत और अलग दुनिया में खलल पड़ जाएगा। यह तय है कि इंसान मंगल पर भी बाज नहीं आएगा एलियंस को परेशान करने से। कोई न कोई प्रयोग उन पर कर ही डालेगा।

पर इससे मुझे क्या! इंसान चाहे एलियंस पर प्रयोग करे या किसी अन्य ग्रह पर मुझे तो मंगल पर अपनी डिजिटल दुकान चलाने से मतलब। मेरी कोशिश तो अपने बिजनेस को एलियंस के बीच भी बढ़ाने की ही रहेगी। सुना है, एलियंस लोग तकनीक के मामले में हम इंसानों से कहीं ज्यादा एडवांस होते हैं।

देखिएगा, धीरे-धीरे कर मंगल 'मिनी धरती' बन जाएगा। फिर वहां बर्गर-चाऊमीन से लेकर दारू तक की दुकानें खुल जाएंगी। दारू की दुकान तो होगी ही होगी क्योंकि जहां पानी वहां दारू। पीने वालों की अपने यहां कमी थोड़ी न है, हर गली-मोहल्ले में चार-पांच पिडक्कड़ आसानी से मिल जाते हैं। दारू के साथ-साथ नमकीन की दुकान भी कोई न कोई खोल ही लेगा।

मेरे विचार में इस प्रकार की 'प्रगतिशील खोजें' तमाम ग्रहों पर होती रहनी चाहिए। इंसान को आसानी हो जाएगी तमाम ग्रहों पर खुद का बोरिया-बिस्तरा जमाने में। यों भी, धरती पर इंसानी बोझ दिन-ब-दिन बढ़ता ही चला जा रहा है। इस बहाने घुमने-फिरने के नए-नए पर्यटन स्थल भी स्थापित होंगे। सुनने में इत्ता अच्छा-सा लगेगा कि फलां बंदा अपने रिश्तेदारों से मिलने मंगल पर गया है। कोई बृहस्पति पर, कोई शनि पर तो कोई चंद्रमा-तारों पर। दुनिया एकदम बदल जाएगी ग्रहों की। ईंट-पत्थरों की जगह हर तरफ इंसान ही इंसान नजर आएंगे।

अभी मंगल पर पानी मिला है, हो सकता है, अन्य किसी ग्रह पर तेल भी मिल जाए। खोजने के मामले में इंसान के दिमाग का जवाब नहीं। क्या धरती, क्या आकाश वो कहीं भी कुछ भी खोज सकता है। सही भी है न, इंसान जित्ता खोजेगा, उत्ता ही विस्तार पाएगा।

खोजें यों ही चलती रहें। ताकि ग्रह हमारे लिए 'किताबी तिलिस्म' न रहकर 'वास्तविकता' का ही रूप लगें।

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