सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

पत्नी का आदेश- व्यंग्य नहीं, केवल कविता लिखो

इन दिनों मैं एक नई 'मुसीबत' में फंस गया हूं। मुसीबत क्या है, बस यों समझ लीजिए बात तलाक तक आन पहुंची है। वो तो मैं किसी तरह 'मैनेज' कर-कराके हमारा वैवाहिक जीवन बचाए हुआ हूं। नहीं तो यह तलाक कांड जाने कब का हो लेता। न न मुझे डर तलाक से कतई नहीं लगता, डर लगता है तलाक के बाद पैदा होने वाली दिक्कतों से। सबसे बड़ी दिक्कत तो खाना-पकाने की है। अब आपसे क्या शर्माना, मुझे न खाना बनाना आता है, न पकाना। एकाध दफा कोशिश की भी रोटी बेलने की पर वो बिल किसी और आकार में गई।

चलिए खैर इन सब बातों को छोड़िए। पहले यह तो जान लीजिए कि मैं किस मुसीबत में फंसा हूं और नौबत तलाक तक क्यों आ गई है।

दरअसल, पत्नी चाहती है कि मैं व्यंग्य लिखना त्यागकर केवल कविताएं ही लिखूं। उसका कहना है कि व्यंग्य मेरी 'पर्सनेलटी' को सूट नहीं करता। केवल कविता करती है। व्यंग्य में मेरा वो 'टेलेंट' बाहर निकल कर नहीं आ पाता, जो कविता लिखकर आ सकता है। व्यंग्य में 'रूमानियत' नहीं होती, जबकि कविता में रूमानियत ही रूमानियत है।

पत्नी की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि मैंने उस पर केंद्रित व्यंग्य तो तमाम लिखे हैं किंतु कविता कभी नहीं लिखी। ज्यादातर व्यंग्यों में उसकी 'खिंचाई' ही की है। अब भला ऐसी कौन पत्नी होगी, जो अपने पति द्वारा अपनी ही खिंचाई को 'बर्दाशत' कर ले! मिनट भर में उसकी खटिया खड़ी कर देगी। हालांकि ऐसा कई दफा हुआ है, जब पत्नी पर व्यंग्य लिखने की कीमत मुझे अपनी खटिया घर के बाहर डालकर चुकानी पड़ी है। हफ्ते भर के लिए खाना-पीना बंद हुआ है सो अलग। मगर मैं भी क्या करूं, मुद्दा या बात चाहे कोई हो, पत्नी का जिक्र बीच में आ ही जाता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बिन पत्नी का जिक्र किए मेरा व्यंग्य पूरा ही न होगा।

पत्नी को कई दफा समझाया कि कविता लिखना मेरे बस की बात नहीं। कविता लिखने के लिए खूबसूरत-खूबसूरत शब्द चाहिए होते हैं। कोमल टाइप भावनाओं में निरंतर चढ़ना-उतरना पड़ता है। अब मैं ठहरा साधारण-सा व्यंग्यकार। मेरे कने न इत्ते खूबसूरत शब्द हैं न इत्ती कोमल भावनाएं। दिमाग तो दिनभर व्यंग्य के ऐंगल ढूंढ़ने में ही खर्च हो लेता है। कविता और वो भी पत्नी पर कहां लिख पाऊंगा। पत्नी पर कविता लिखने का मतलब है, खोपड़ी की छत मजबूत करके रखना। अगला-पिछला सब सोच-साचकर रखना। कविता में व्यक्त जरा-सी भूल आपका कबाड़ा कर सकती है।

मगर पत्नी है कि समझना ही नहीं चाहती। उसने तो जैसे 'जिद्द' ठान ली है, मुझे व्यंग्यकार से कवि बनाने की। मेरे भीतर ऐसी कोई भी 'क्वॉलिटी' नहीं कि मैं कवि बन सकूं। शक्ल भी मैंने व्यंग्यकार जैसी पाई है, कवि जैसी नहीं। साहित्य के दूसरे कवियों की जाने दीजिए, मैं मेरे मोहल्ले के कवियों के मुकाबले भी कहीं नहीं ठहरता। फिर भला मैं कैसे कवि बन पाऊंगा?

यों हमारे बीच में किसी बात पर कभी कोई झगड़ा-सगड़ा नहीं होता बस इस व्यंग्यकार-कवि के झगड़े को छोड़कर। दिन-ब-दिन यह झगड़ा मेरी जान को मुसीबत बनता जा रहा है। पक लिया हूं यह सुन-सुनकर- 'यार, तुम कवि क्यों नहीं बन जाते।' कवि बनने का बाजार में कोई 'इंजेक्शन' भी तो नहीं आता कि ठोकूं और झट्ट से कवि बन जाऊं!

गलती दरअसल मेरी ही है। मुझे शादी से पहले ही पत्नी से पूछ लेना चाहिए था कि तुम्हें व्यंग्यकार पसंद है या कवि। तब इत्ता ध्यान ही नहीं दिया। घंटों-घंटों फोन पर प्रेमालाप तो चलता रहा मगर 'असल मुद्दे' की बात कभी नहीं की। हर बार बस यही सुनने को मिल जाता था कि 'तुम जैसे भी हो मुझे पसंद हो।' शादी बाद जब 'फोनिया प्रेम' का 'भूत' उतरा तो 'हकीकत' सामने आई। जो अब मेरी जान को 'बवाल' बनी हुई है।

मैं जानता हूं कि कवि मैं इस जन्म में तो क्या अगले जन्म में भी नहीं बन पाऊंगा, चाहे कित्ती ही 'कोशिश' कर लूं। लेकिन, क्या करूं, मुझे अब 'आर्टिफिशल कवि' बनना पड़ेगा ताकि मेरी खटिया घर में पड़ी रहे। राशन-पानी बंद न हो। एवं वैवाहिक जीवन की गाड़ी ठीक-ठाक चलती रहे। आखिर मरता क्या न करता पियारे।

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