शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

भला क्यों लौटाऊं पुरस्कार?

लेखन में मुझे अभी तलक कोई बड़ा-छोटा पुरस्कार नहीं मिला है। हां, बचपन में एक पुरस्कार 'पतंगबाजी' में अवश्य मिला था। पुरस्कारों के नाम पर एक अकेला वही पुरस्कार मेरे कने है। लेखन में पुरस्कार लेने की न कभी जरूरत महसूस हुई, न ही किसी ने देने का वायदा किया।

पतंगबाजी में पाए पुरस्कार को लेकर अब मुझे हर वक्त डर-सा लगा रहता है। डर इसलिए रहता है- कहीं कोई घर पर न आ धमके और बोले- अपना पुरस्कार लौटाओ। हालांकि वो ऐसा कोई बड़ा या महान पुरस्कार नहीं है, फिर भी, पुरस्कार तो है ही। यों भी, पुरस्कार न छोटा होता है न बड़ा। पुरस्कार पुरस्कार होता है। और, मैं अपना यह पुरस्कार किसी कीमत पर नहीं लौटा सकता। न केवल इस पुरस्कार बल्कि पतंगबाजी में मेरी 'जान' बसती है। मैं एक बार को लिखना छोड़ सकता हूं किंतु पतंगबाजी हरगिज नहीं।

दो-चार रोज पहले पत्नी ने मुझे राय दी थी कि 'तुम्हारे पास पुरस्कारों के नाम जो अकेला पुरस्कार है उसे लौटा दो। भगवान कसम, रोतों-रात 'सेलिब्रिटी' बन जाओगे। रिश्तेदारों के लेकर मीडिया तक में तुम्हारी पूछम-पूछ बढ़ जाएगी। जैसे- अन्य बड़े लेखक लोग अपने-अपने सम्मान-पुरस्कार वासप कर रहे हैं, तुम भी कर दो। वैसे भी, इस पुरस्कार में अब रखा ही क्या है!'

पत्नी की 'लघु राय' को सुनने के बाद मैंने बेहद सहज भाषा में उससे कहा- 'देखो यार, पुरस्कार तो मैं लौटाने से रहा। चाहे इस बात पर तुम मेरा घर में हुक्का-पानी ही क्यों न बंद कर दो। इत्ती मेहनत करके तो एक अदद पुरस्कार हत्थे आया था, उसे भी एंवई लौटा दूं। अमां, पुरस्कार कोई लौटाने के लिए थोड़े न लिए जाते हैं। कि, जब मन में आया पुरस्कार ले लिया, जब दिल न ठुका लौटा दिया। न न मैं इस पुरस्कार को नहीं लौटाऊंगा। जो लौटा रहे हैं, उनकी वे जानें। मैं बे-सेलिब्रिटी बने ही ठीक हूं।'

इत्ती सुनने के बाद पत्नी खासा लाल-पीली थी मुझ पर। बोली- 'तुममें मौका देखकर चौका मारने का कोई गुण नहीं है। जैसा ठस्स तुम्हारा लेखन है, वैसे ही तुम भी। यहां तमाम लेखक-साहित्यकार लोग बहती गंगा में हाथ धोने में लगे हैं और तुम हो कि 'आदर्शवाद' का बैंड बजा रहे हो। अजी, बीत लिए दिन आदर्शवाद के; लेखन में भी और जीवन में भी। अब तो वही महान है, जो मौकापरस्त और समझौतावादी है। इत्ती जान-पहचान तो इन लेखकों को पुरस्कार मिलते वक्त न मिली होगी, जो आज लौटाते हुए मिल रही है। सलमान खान से बड़े हीरो हो लिए हैं सब के सब।'

मैंने पत्नी को पुनः समझाया। देखो डार्लिंग- 'ये सब लेखकों की महज 'स्टंटबाजी' है। सत्ता बदली है तो पेट में मरोड़े उठना लाजिमी है। दर्द कहीं न कहीं से तो बाहर आएगा ही। सो, पुरस्कार ही लौटाए दे रहे हैं। लेकिन खुलकर एक भी बंदा पुरस्कार पाने के लिए की गईं किस्म-किस्म की 'जुगाड़बाजियों' पर कोई बात न कर रहा। अगर लौटाना ही था तो लिया ही क्यों था? तरह-तरह के फासीवाद का हवाला न दीजिए, ये तो यहां किसी न किसी रूप में बरसों से मौजूद है।'

मुझे मालूम था, पत्नी अब तक पक चुकी थी, मेरी बकबास को सुनकर। इसलिए उसने बहस से कट लेना ही उचित समझा। मगर हां जाते-जाते मुझे ये 'श्राप' जरूर दे गई, भगवान करे तुम्हें कोई पुरस्कार न मिले।

वाकई, मैं चाहता भी यही हूं कि मुझे कोई पुरस्कार न मिले। पुरस्कार मिले के तमाम झंझट हैं। अगर बात लौटाने की आ जाए, तो झंझट ही झंझट। पुरस्कार एक तरह से प्रेमिका जैसे होते हैं कि छोड़ने का दिल ही नहीं करता। तब ही तो मैं अपना पतंगबाजी वाला पुरस्कार नहीं लौटा रहा। लौटाकर जरा-बहुत कमाई इज्जत का फलूदा थोड़े न बनवाना है मुझे।

एटिट्यूड में आकर जो लौटा रहे हैं, उन्हें मीडिया के बीच भाव भी अच्छे खासे मिल रहे हैं। बैठे-ठाले अगर कुछ मिल जाए, तो सोने पे सुहागा।

उम्मीद है, अब से आगे आने वाली पीढ़ी भी शायद यही मानकर चलेगी कि पुरस्कार लौटाकर ही दुनिया में 'महान' बना जा सकता है!

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

मंगल पर पानी और डिजिटल क्रांति

बधाई हो। मंगल पर पानी खोज लिया गया है। मंगल पर जीवन होने की संभावनाएं पहले ही खोज ली गई थीं। मंगल अब कित्ता 'आसान' हो गया है न हमारे लिए।

अभी मंगल पर पानी मिला है, उम्मीद है, जल्द ही डिजिटल तरंगों के संकेत भी वहां मिलने लेगें। दुनिया में जब सबकुछ इत्ता तेजी से अदल-बदल रहा है फिर भला हमारे ग्रह उन बदलवों से पीछे कैसे रह सकते हैं। ग्रहों पर जाकर खोज करने की इंसानी कोशिशें धीरे-धीरे रंग ला रही हैं।

मुझे उम्मीद है, हमारे समाज का एक वर्ग मंगल पर बसने का मन बना भी चुका होगा। ये कोई बड़ी बात भी नहीं। जब इंसान पहाड़ों का सीना चीरकर और नदी-नालों को पाटकर अपने रहने के लिए आपर्टमेंटस-डियूप्लेक्स बना सकता है, फिर भला मंगल ग्रह पर बसना कौन-सी बड़ी बात है।

इंसान के लिए अब कुछ भी 'कठिन' नहीं रह गया है। अब हम उस युग में आ पहुंचें हैं, जहां सबकुछ डिजिटल तकनीक के हिसाब से बनने व तय होने लगा है। किसी को कहीं जाने की जरूरत नहीं। एक टच में हर चीज आपके द्वार पर हाजिर है।

मंगल पर पानी मिलना, हमारा डिजिटल क्रांति की दशा में कदम रखना, साफ संकेत दे रहा है कि आगे आने वाला समय 'टोटली डिजिटल' ही होगा। इसीलिए मैंने तय किया है कि मैं मंगल ग्रह पर 'डिजिटल ऐस्सीरिज' की दुकान खोलूंगा। धरती पर रह-रहकर अब मैं भी उक्ता चुका हूं।

मंगल पर जाकर बसने वाले कोई सामान्य लोग तो होंगे नहीं। वहां वही जाकर बस पाएगा, जिसकी अंटी में माल होगा। बिना माल आजकल धरती पर कोई किसी को नहीं पूछता फिर वो तो मंगल ग्रह ठहरा। धरती से हजारों-लाखों किलोमीटर दूर। एक नई दुनिया। नया माहौल। नया वातावरण। नए टाइप के लोग।

हां, नए टाइप के लोगों से ध्यान है, मंगल पर हमारे पड़ोसी ज्यादातर एलियंस बिरादरी के लोग ही होंगे। मंगल पर इंसान को पाकर एलियंस बेचैन तो खासा हो उठेंगे। खामखा ही उनकी शांत और अलग दुनिया में खलल पड़ जाएगा। यह तय है कि इंसान मंगल पर भी बाज नहीं आएगा एलियंस को परेशान करने से। कोई न कोई प्रयोग उन पर कर ही डालेगा।

पर इससे मुझे क्या! इंसान चाहे एलियंस पर प्रयोग करे या किसी अन्य ग्रह पर मुझे तो मंगल पर अपनी डिजिटल दुकान चलाने से मतलब। मेरी कोशिश तो अपने बिजनेस को एलियंस के बीच भी बढ़ाने की ही रहेगी। सुना है, एलियंस लोग तकनीक के मामले में हम इंसानों से कहीं ज्यादा एडवांस होते हैं।

देखिएगा, धीरे-धीरे कर मंगल 'मिनी धरती' बन जाएगा। फिर वहां बर्गर-चाऊमीन से लेकर दारू तक की दुकानें खुल जाएंगी। दारू की दुकान तो होगी ही होगी क्योंकि जहां पानी वहां दारू। पीने वालों की अपने यहां कमी थोड़ी न है, हर गली-मोहल्ले में चार-पांच पिडक्कड़ आसानी से मिल जाते हैं। दारू के साथ-साथ नमकीन की दुकान भी कोई न कोई खोल ही लेगा।

मेरे विचार में इस प्रकार की 'प्रगतिशील खोजें' तमाम ग्रहों पर होती रहनी चाहिए। इंसान को आसानी हो जाएगी तमाम ग्रहों पर खुद का बोरिया-बिस्तरा जमाने में। यों भी, धरती पर इंसानी बोझ दिन-ब-दिन बढ़ता ही चला जा रहा है। इस बहाने घुमने-फिरने के नए-नए पर्यटन स्थल भी स्थापित होंगे। सुनने में इत्ता अच्छा-सा लगेगा कि फलां बंदा अपने रिश्तेदारों से मिलने मंगल पर गया है। कोई बृहस्पति पर, कोई शनि पर तो कोई चंद्रमा-तारों पर। दुनिया एकदम बदल जाएगी ग्रहों की। ईंट-पत्थरों की जगह हर तरफ इंसान ही इंसान नजर आएंगे।

अभी मंगल पर पानी मिला है, हो सकता है, अन्य किसी ग्रह पर तेल भी मिल जाए। खोजने के मामले में इंसान के दिमाग का जवाब नहीं। क्या धरती, क्या आकाश वो कहीं भी कुछ भी खोज सकता है। सही भी है न, इंसान जित्ता खोजेगा, उत्ता ही विस्तार पाएगा।

खोजें यों ही चलती रहें। ताकि ग्रह हमारे लिए 'किताबी तिलिस्म' न रहकर 'वास्तविकता' का ही रूप लगें।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

दाल और चिंता

देश में चल रहे इत्ते बवालों के बीच अगर हम 'महंगाई' और 'दाल' पर ध्यान दे पा रहे हैं, तो यह 'सोने पर सुहागा' जैसा ही है। क्लियर कर दूं, यहां हम से मतलब 'जनता' से है, 'नेता' से नहीं। नेता लोग तो फिलहाल बिहार चुनाव और गाय-बीफ की जंग में ही उलझे हुए हैं। उनके लिए महंगाई का बढ़ना या दाल का 200 रुपए किलो बिकना अभी उत्ती बड़ी चिंता का विषय नहीं है।

हालांकि दाल का 200 रुपए किलो बिकना चिंता का विषय तो हमारे लिए भी नहीं है। पर क्या करें, चिंता करने के वास्ते हमारे कने भी तो कुछ होना चाहिए कि नहीं! महंगाई और दाल क्या बुरी हैं। यों, चिंता करने में कुछ जाता भी नहीं। बस, दिल को तसल्ली और दिमाग को काम मिल जाता है।
पिछली सरकार में तो हम दाल से लेकर आटे तक के दर्द को झेल चुके हैं। तब तो हम इत्ती चिंता किया करते थे कि दिन के चौबीस में से साढ़े तेईस घंटे तो चिंता व्यक्त करने में ही फना हो जाया करते थे।

फिलहाल, सरकार बदल जरूर गई है पर महंगाई पर चिंता करने की हमारी आदत कतई न बदली है। अब हम महंगाई के साथ-साथ सामाजिक ताने-बाने के सहिष्णु रहने की भी चिंता करने लगे हैं। क्या करें, दाल से लेकर समाज तक की जिम्मेवारी हम पर भी तो है। बिचारे नेता-मंत्री लोग क्या-क्या देखेंगे? किस-किस की चिंता करेंगे? उन्हें अपने ही इत्ते काम रहते हैं, महंगाई और दाल की सामाजिक स्थिति क्या है, देख नहीं पाते।

सौ बातों की एक बात है प्यारे, दाल चाहे 200 रुपए किलो बिके या 500 रुपए अंततः गलानी हमें (जनता) को ही है। नेता लोगों की दाल तो खुद-ब-खुद गल जाती है। अगर न भी गले तो कौन-सा उनकी तंददुरुस्त पर खास फर्क पड़ने वाला है। लेकिन शबाश है, वो जनता जो 200 रुपए किलो की दाल को भी गला लेती है। मेरी विचार में, एक नोबेल तो उन्हें भी बनता है, जो इत्ती महंगी दाल को गलाने की क्षमता रखते हैं।

अरे आस-पड़ोस में क्या झांकना, मुझे ही देखिए लीजिए, जाने कब से प्लानिंग कर रहा हूं, 200 रुपए किलो की दाल को खरीदने की लेकिन नहीं खरीद पा रहा। कोई न कोई अड़चन ससुरी बीच में आ ही जाती है। कभी जेब में दौ सौ रुपए भी नहीं होते, जब होते हैं, तो दवा-दारू में खर्च हो लेते हैं।

ऊधर, पत्नी 200 रुपए किलो दाल के वास्ते मेरी 'हैसियत' को ही 'चुनौती' देती रहती है। कहती है, 'लेखक तो तुम इत्ते बड़े हो लेकिन हैसियत तुम्हारी दो कौड़ी की भी नहीं। मात्र 200 रुपए किलो की दाल नहीं खरीद सकते, हार क्या खाक खरीदकर पाओगे। तुमसे कहीं अच्छा तो पड़ोस का मंगू है। चाट का ठेला भले ही लगाता है पर दाल और हार खरीदने में कतई कोताही नहीं बरत्ता। मैं फिर कह रही हूं, लेखन को छोड़कर तुम भी ठेला लगाना शुरू कर दो। कम से कम चार पैसे घर में तो आएंगे। न ही दाल के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ेगा।'

पत्नी का क्या है, कुछ भी बोल देती है। दाल-आटे-हार का हिसाब-किताब रखना तो मुझे ही होता है। फिर भी, कभी-कभी मुझे अपने लेखक होने पर 'अफसोस' भी होता है कि बताओ 200 रुपए किलो की दाल को खरीदने में मुझे इत्ता सोचना पड़ रहा है। अभी नेता होता तो न सोचना पड़ता, न पत्नी की सुननी पड़ती। दाल गलती सो अलग।

इत्ती महंगी दाल मुझसे तो गलने से रही। एकाध दिन की बात होती तो चल भी जाता। यह तो रोज की बात है। दाल पर चिंता व्यक्त करने के अतिरिक्त मैं कुछ नहीं कर सकता। चिंता करने से दिल को कुछ तो सुकून मिलता है। ये ही सही।

सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

पुरस्कार लौटाओ, हिट हो जाओ

ऊपर वाले का रहम है, जो मुझे आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। मिल गया होता तो आज मेरी गर्दन एहसानों तले झुकी और जबान शुक्रिया कहते-कहते घिस गई होती।

हालांकि ऐसा कोई मानेगा नहीं परंतु सत्य ये है कि पुरस्कार लेना या मिलना दोनों की स्थितियों में लेखक के लिए 'खतरे' समान होता है। जी हां, पुरस्कार किसी 'भीषण खतरे' से कम नहीं होते। पुरस्कार पाने के लिए किस-किस प्रकार की 'तिकड़में' भिड़ानी पड़ती हैं, यह सबको मालूम है। गिरी चीज को उठाने में लेखक को जित्ती कमर नहीं झुकानी पड़ती, उससे कहीं ज्यादा पुरस्कार पाने के लिए झुकानी होती है। कुछ लेखक तो इत्ता 'पुरस्कार प्रेमी' होते हैं कि पुरस्कार मिल जाने के बाद नेताओं के कदमों में यों गिर पड़ते हैं मानो उनका 'अभूतपूर्व एहसान' जतला रहे हों।

यह दीगर बात है, पुरस्कार पाने के बाद लौटाने की 'धमकी' देना सबसे 'क्रांतिकारी कदम' है। इस 'क्रांतिकारी कदम' को उठाने में किसी दल या नेता की 'सहमति' नहीं लेनी होती, बस एक लाइन बोलनी भर होती है- 'मैं फलां-फलां पुरस्कार लौटा रहा हूं।' इत्ते में ही लेखक 'हिट' हो लेता है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों-चौराहों तक पर उसके नामों के चर्चे गुंजने लगते हैं। जाने कहां-कहां से मीडिया वाले उसका साक्षात्कार लेने पहुंच जाते हैं।

मगर लेखक भी 'घणा सियाना' होता है, पुरस्कार लौटाने की बात तो कह देता है पर यह न कहता कि पुरस्कार की राशि भी साथ में लौटा रहा हूं। क्योंकि राशि को तो वो खा-पचाकर हजम कर गया होता है। कोई अपनी अंटी से थोड़े न लौटाएगा पुरस्कार की रकम! समाज और मीडिया के बीच 'हीरो' बनने का यह तरीका निराला है प्यारे।

अभी तो दो-तीन नामी लेखकों ने ही अपना पुरस्कार लौटाने की धमकी दी है, हो सकता है, कल को लल्लन चाट वाला और टिल्लन छोले वाला भी अपने-अपने पुरस्कारों को लौटाने की घोषणा कर दें। बहती गंगा में हाथ धोने में भला क्या जाता है? इस बहाने 'फेम' मिल रहा है, यह क्या कम बड़ी बात है।

चलो अच्छा ही हुआ जो मुझे कोई पुरस्कार न मिला। नहीं तो अब तलक मुझ पर भी यहां-वहां अपना पुरस्कार लौटाने का 'प्रेशर' बनाया जा रहा होता। पर हूं मैं भी बहुत 'बेशर्म', अगर पुरस्कार मिल होता तो किसी हालत न लौटाता। अमां, पुरस्कार कोई लौटाने के लिए थोड़े न लिए जाते हैं। बात करते हैं।

उम्मीद है, पुरस्कार लौटाने की यह 'नौटंकी' अभी और खींचेगी। कुछ बड़े-छोटे नाम और सामने आएंगे। यों, घर बैठे 'मुफ्त की प्रसिद्धि' भला किसे बुरी लगती है?

पर मुझे क्या...। जिन्हें लौटाना हो लौटाए, मुझे तो 'मनोरंजन' से मतलब। मुफ्त का मनोरंजन क्या बुरा है। 

पत्नी का आदेश- व्यंग्य नहीं, केवल कविता लिखो

इन दिनों मैं एक नई 'मुसीबत' में फंस गया हूं। मुसीबत क्या है, बस यों समझ लीजिए बात तलाक तक आन पहुंची है। वो तो मैं किसी तरह 'मैनेज' कर-कराके हमारा वैवाहिक जीवन बचाए हुआ हूं। नहीं तो यह तलाक कांड जाने कब का हो लेता। न न मुझे डर तलाक से कतई नहीं लगता, डर लगता है तलाक के बाद पैदा होने वाली दिक्कतों से। सबसे बड़ी दिक्कत तो खाना-पकाने की है। अब आपसे क्या शर्माना, मुझे न खाना बनाना आता है, न पकाना। एकाध दफा कोशिश की भी रोटी बेलने की पर वो बिल किसी और आकार में गई।

चलिए खैर इन सब बातों को छोड़िए। पहले यह तो जान लीजिए कि मैं किस मुसीबत में फंसा हूं और नौबत तलाक तक क्यों आ गई है।

दरअसल, पत्नी चाहती है कि मैं व्यंग्य लिखना त्यागकर केवल कविताएं ही लिखूं। उसका कहना है कि व्यंग्य मेरी 'पर्सनेलटी' को सूट नहीं करता। केवल कविता करती है। व्यंग्य में मेरा वो 'टेलेंट' बाहर निकल कर नहीं आ पाता, जो कविता लिखकर आ सकता है। व्यंग्य में 'रूमानियत' नहीं होती, जबकि कविता में रूमानियत ही रूमानियत है।

पत्नी की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि मैंने उस पर केंद्रित व्यंग्य तो तमाम लिखे हैं किंतु कविता कभी नहीं लिखी। ज्यादातर व्यंग्यों में उसकी 'खिंचाई' ही की है। अब भला ऐसी कौन पत्नी होगी, जो अपने पति द्वारा अपनी ही खिंचाई को 'बर्दाशत' कर ले! मिनट भर में उसकी खटिया खड़ी कर देगी। हालांकि ऐसा कई दफा हुआ है, जब पत्नी पर व्यंग्य लिखने की कीमत मुझे अपनी खटिया घर के बाहर डालकर चुकानी पड़ी है। हफ्ते भर के लिए खाना-पीना बंद हुआ है सो अलग। मगर मैं भी क्या करूं, मुद्दा या बात चाहे कोई हो, पत्नी का जिक्र बीच में आ ही जाता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बिन पत्नी का जिक्र किए मेरा व्यंग्य पूरा ही न होगा।

पत्नी को कई दफा समझाया कि कविता लिखना मेरे बस की बात नहीं। कविता लिखने के लिए खूबसूरत-खूबसूरत शब्द चाहिए होते हैं। कोमल टाइप भावनाओं में निरंतर चढ़ना-उतरना पड़ता है। अब मैं ठहरा साधारण-सा व्यंग्यकार। मेरे कने न इत्ते खूबसूरत शब्द हैं न इत्ती कोमल भावनाएं। दिमाग तो दिनभर व्यंग्य के ऐंगल ढूंढ़ने में ही खर्च हो लेता है। कविता और वो भी पत्नी पर कहां लिख पाऊंगा। पत्नी पर कविता लिखने का मतलब है, खोपड़ी की छत मजबूत करके रखना। अगला-पिछला सब सोच-साचकर रखना। कविता में व्यक्त जरा-सी भूल आपका कबाड़ा कर सकती है।

मगर पत्नी है कि समझना ही नहीं चाहती। उसने तो जैसे 'जिद्द' ठान ली है, मुझे व्यंग्यकार से कवि बनाने की। मेरे भीतर ऐसी कोई भी 'क्वॉलिटी' नहीं कि मैं कवि बन सकूं। शक्ल भी मैंने व्यंग्यकार जैसी पाई है, कवि जैसी नहीं। साहित्य के दूसरे कवियों की जाने दीजिए, मैं मेरे मोहल्ले के कवियों के मुकाबले भी कहीं नहीं ठहरता। फिर भला मैं कैसे कवि बन पाऊंगा?

यों हमारे बीच में किसी बात पर कभी कोई झगड़ा-सगड़ा नहीं होता बस इस व्यंग्यकार-कवि के झगड़े को छोड़कर। दिन-ब-दिन यह झगड़ा मेरी जान को मुसीबत बनता जा रहा है। पक लिया हूं यह सुन-सुनकर- 'यार, तुम कवि क्यों नहीं बन जाते।' कवि बनने का बाजार में कोई 'इंजेक्शन' भी तो नहीं आता कि ठोकूं और झट्ट से कवि बन जाऊं!

गलती दरअसल मेरी ही है। मुझे शादी से पहले ही पत्नी से पूछ लेना चाहिए था कि तुम्हें व्यंग्यकार पसंद है या कवि। तब इत्ता ध्यान ही नहीं दिया। घंटों-घंटों फोन पर प्रेमालाप तो चलता रहा मगर 'असल मुद्दे' की बात कभी नहीं की। हर बार बस यही सुनने को मिल जाता था कि 'तुम जैसे भी हो मुझे पसंद हो।' शादी बाद जब 'फोनिया प्रेम' का 'भूत' उतरा तो 'हकीकत' सामने आई। जो अब मेरी जान को 'बवाल' बनी हुई है।

मैं जानता हूं कि कवि मैं इस जन्म में तो क्या अगले जन्म में भी नहीं बन पाऊंगा, चाहे कित्ती ही 'कोशिश' कर लूं। लेकिन, क्या करूं, मुझे अब 'आर्टिफिशल कवि' बनना पड़ेगा ताकि मेरी खटिया घर में पड़ी रहे। राशन-पानी बंद न हो। एवं वैवाहिक जीवन की गाड़ी ठीक-ठाक चलती रहे। आखिर मरता क्या न करता पियारे।

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

डिसलाइक बोले तो 'कलेस'

पियारे मार्क जुकरबर्ग,

चाहे जैसी चल रही है पर फेसबुक पर अपनी लाइफ एकदम मस्त चल रही है। कहीं किसी से कोई झगड़ा-टंटा नहीं। कोई मुंह-जोरी नहीं। लाइक का जवाब लाइक से। कमेंट का जवाब कमेंट से। इन-बॉक्स का जवाब इन-बॉक्स में।

दरअसल, फेसबुक पर रहते इत्ते सालों में मैंने एक यही बात अच्छे से समझी-जानी है कि यहां जित्ता 'कूल' बने रहोगे, उत्ता ही मजे करोगे। बेमतलब की 'हॉटनेस' यहां किसी काम की नहीं। मेरी निगाह में फेसबुक टाइमपास और हल्ले-फुल्के जोक या वन-लाइन को शेयर करने-करवाने का जरिया है, बाकी यहां क्रांति-फ्रांति की बात, खुद को महज दिलासा दिलाने जैसा है।

बहरहाल, इन दिनों यह खबर गर्म है कि तुम फेसबुक पर 'डिसलाइक' का विकल्प भी लाने वाले हो। यानी, अब फेसबुकिया किसी भी पोस्ट या फोटू को अपनी इच्छा से डिसलाइक भी कर सकेगा। डिसलाइक का हथियार उसके हाथ में होगा, चाहे किसी पर भी चला दे।

यार जुकरबर्ग, क्या हम लोगों की शांति या सोशल दोस्ती तुमसे देखी नहीं जा रही? अमां, क्यों खाली-पीली डिसलाइक का उस्तरा हाथ में देकर विरोधियों की गर्देनों को रेतवाना चाह रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं कि फेसबुक पर जरा-सी बात का जरा देर में तिल का ताड़ बन जाता है। बात दीवार को फांदती-फूंदती अखबारों के पन्नों और थाना-कचहरी तक पहुंच जाती है।

यहां लोग बाग जरा-सी असहमति-आलोचना-प्रतिक्रिया तक तो सहन कर नहीं पाते, डिसलाइक को क्या खाकर हजम कर पाएंगे? फेसबुक पर केवल मीठा-मीठा गप्प करने का चल है और कड़वा-कड़वा थू करने का। यहां कमेंट से कहीं ज्यादा तरजीह लाइक को दी जाती है। जो बंदा जित्ते लाइक पा लेता है, खुद को किसी 'फेसबुकिया-बादशाह' से कम नहीं समझता। लाइक के बदले लाइक की रिश्तेदारियां-दोस्तियां निभती हैं यहां केवल।

मेरी बात का बुरा न मानना पियारे पर डिसलाइक का विकल्प आपस में सिर्फ 'कलेस' ही करवाएगा और कुछ नहीं। डिसलाइक करते ही इन-बॉक्स में आनकर तरह-तरह के सवाल पूछे जाएंगे- तूने मेरी पोस्ट या फोटू क्यों डिसलाइक की? क्या मैं इत्ता बुरा लिखता या दिखता हूं? तुम नहीं समझ रहे, यहां फेसबुकियों पर डिसलाइक का जवाब देना का अतिरिक्त भार पड़ जाएगा। जब लोग लाइक पर भी पूर्ण-संतुष्ट नहीं हो पाते फिर भला डिसलाइक पर क्या होंगे?

कहीं बंदा कमजोर दिल का निकला और ले गया डिसलाइक को अपने दिल पर फिर तो राम ही मालिक?

डिसलाइक की आड़ में कित्ते ही अपनी खुन्नस भी निकालेंगे- क्या इसका अंदाजा है तुम्हें।

जो लोग डिसलाइक के विकल्प को लेकर बहुत खुश हो रहे हैं, वो भी सुन लें, यह दांव उन पर भी उल्टा बैठ सकता है। डिसलाइक को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं आपसी कलेस का माध्यम ही मानिए। अभिव्यक्ति की आजादी के दिन हवा हुए। अब तो जमाना लाइक देने और लेने का। सोशल नेटवर्किंग पर संबंधों की गाड़ी लाइक के दम पर ही चली रही है। इसे यों ही चलते रहने दो पियारे जुकरबर्ग।

मेरी मानो तो फेसबुक पर डिसलाइक का विकल्प चढ़ाओ ही मत। लाइक के साथ अपनी लाइफ एकदम बिंदास और मस्त चल रही है। बंदे की पोस्ट या फोटू पर लाइक मार दो तो खुश हो जाता है। सेकेंड भर में कित्ती ही दुआएं दे देता है। डिसलाइक तो केवल कलेस ही करवाएगा और कुछ नहीं।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

किस्म-किस्म की समस्याओं के आकार-प्रकार

यों तो देश में समस्याओं की कमी नहीं। जहां नजर डालो, वहां समस्या। कुछ समस्याएं तो ऐसी, जिनका कोई भी, कैसा भी समाधान खोज लीजिए फिर भी समस्या का दंश बना ही रहता है। हमारी राजनीति में तो इत्ती प्रकार की समस्याएं हैं, अगर हर एक का निदान करने बैठे तो सालों लग जाएंगे। तिस पर भी कोई गारंटी नहीं कि समस्या सुलझ ही जाए।

तमाम ऐरी-गैरी समस्याओं के बीच इधर दो-तीन प्रकार की समस्याओं को मैं बहुत शिद्दत से महसूस कर रहा है। ऐसी लगता है, उन समस्याओं के समाधान के बगैर हमारी जिंदगी बेगानी-सी है। मतलब, हम अब पारिवारिक रिश्तों से कहीं ज्यादा उन समस्याओं के विषय में सोचने लगे हैं।
ये समस्याएं तीन प्रकार की हैं- सेक्स समस्या, बालों के झड़ने की समस्या और चेहरे पर झुर्रियां पड़ने की समस्या।

सेक्स समस्या के बारे में तो कुछ पूछिए ही मत- सारा का सारा अखबार तरह-तरह के तेलों और कैप्सूलों के विज्ञापनों से भरा पड़ा रहता है। विज्ञापनों में छपने वाले फोटू बंदे को इत्ता 'उत्साहित' कर देते हैं कि वो फलां तेल या कैप्सूल लेने से पीछे नहीं हटता। ऐसा लगता है, इंसान की समस्त शारीरिक कमजोरी का समाधान तेल और कैप्सूल में छिपा पड़ा है। इधर कुछ सालों में सेक्स-युक्त विज्ञापनों की ऐसी बाढ़-सी आई है, मानो ये समस्या अगर न सुलझी तो भारतीय पुरुष अन्य देशों के पुरुषों से 'पिछड़' जाएंगे।

बालों के झड़ने की समस्या भी कुछ ऐसी ही है प्यारे। टीवी पर फलां-फलां शैम्पूओं के इत्ते-इत्ते विज्ञापन आते हैं, अक्सर ये 'कनफ्यूजन' हो जाता है कि कौन-सा खरीदें और कौन-सा छोड़ दें। हर शैम्पू की दूसरे शैम्पू से बात निराली। कुछ शैम्पूओं के विज्ञापन तो इत्ते 'क्रांतिकारी' टाइप के होते हैं कि लगाते ही बाल 'फेविकोल' की तरह चिपक जाएं।

कभी-कभी तो महसूस होता है कि अगर बंदे-बंदी के बाल झड़ने से न रुके तो चीन कहीं हम पर हमला न कर दे!

और हां, चेहरे पर झुर्रियों की समस्या तो हमारे तईं इत्ती बड़ी है कि देश-समाज की हर बड़ी से बड़ी समस्या उसके आगे फेल है। मजा देखिए, विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली हर क्रीम आपको झट्ट से गोरा-चिट्टा बनाने का दम भरती है। बस एक दफा फलां कंपनी की क्रीम चेहरे पर लगा लीजिए फिर झुर्रियां तो क्या झुर्रियों के बाप तक का साया आपके चेहरे पर पड़ने से रहा। गोरे लगने-दिखने की चाहत ने हमें इत्ता बेताब कर दिया है कि दिन के चौबीस में से बीस घंटे तो हम अपने रूप-सौंदर्य के विषय में सोचते-सोचते ही गंवा देते हैं।

आप भले न स्वीकारें लेकिन मुझे इंसान के चेहरे पर पड़ी झुर्रियां 'राष्ट्रीय समस्या' से भी कहीं बड़ी समस्या नजर आती है। चेहरे की झुर्रियां हटाने को हम इत्ती 'मशक्त' करते रहते हैं, इत्ती तो शायद डेंगू के खात्मे के लिए भी न की होगी।

मार्केट भी यही चाहता है कि ये समस्याएं बनी रहें ताकि उनकी दुकानदारी मस्त चलती रहे। बाकी जरूरी समस्याओं पर खाक डालिए। क्योंकि उनका मार्केट नहीं है।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

राजनीति, राजनेता और मनोरंजन

बदलते वक्त के साथ राजनीति और राजनेता दोनों का ही 'फॉरमेट' बदल गया है। न अब राजनीति पहले जैसी रही, न राजनेता।

सबसे 'दिलचस्प' बात यह हुई है कि राजनीति और राजनेता (अपवादों को छोड़ दिया जाए) में से गंभीरता गायब हास्य और मनोरंजन अधिक आ गया है। यानी, जो नेता जनता का जित्ता मनोरंजन कर पाएगा, वो ही लंबे समय तक टिका-बना रहेगा। हो सकता है, मेरी कही बात खुद नेताओं के गले न उतरे, मगर पियारे सच यही है।

राजनीति और राजनेताओं के बीच सबसे ज्यादा मनोरंजन चुनावों के वक्त ही दिखने को मिलता है। पार्टियां और नेता लोग तरह-तरह के 'करतब' कर जनता को लुभाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। कोई काला धन के नाम पर जुमले बनाता है, तो कोई जंगल राज को खत्म का डायलॉग एकदम फिम्ली अंदाज में बोलता सुनाई पड़ता है। यानी, फूल-टू मनोरंजन।

देखिए न, बिहार चुनाव के मद्देनजर पार्टियों और नेताओं में किस्म-किस्म के मनोरंजन देखने-सुनने को मिल रहे हैं। कुछ नेता लोग तो अपना टिकट कट जाने पर ही 'रो-धो' रहे हैं। रोना भी इत्ता मनोरंजनात्मक कि उन्हें देखकर बच्चा भी खिलखिलाकर हंस पड़े।

वैसे, बात है तो रोने की ही। टिकट कट जाने का मतलब है, चुनाव के साथ-साथ अपनी इज्जत का 'फलूदा' बन जाना। एक तो बिचारा नेता पार्टी के वास्ते इत्ती मेहनत करे और जब चुनाव लड़ने की बात आए तो ऐन वक्त पर उसका टिकट काट दिया जाए। अब भला नेता रोए नहीं तो और क्या करे? आखिर नेता राजनीति में आता किसलिए है, चुनाव लड़ने के लिए ही न!

जो भी हो पर हम जैसे लोगों के लिए नेता का रोना भी किसी मनोरंजन से कम नहीं। नेता रोता है तो कम से कम यह तो पता चल ही जाता है कि उसके भीतर भी रोने-धोने की संभावनाएं हैं। यों भी, नेता कौन-सा अपने लिए रोता है। टिकट कटने के लिए ही तो रोता है। टिकट का क्या है, एक पार्टी नहीं तो दूसरी पार्टी टिकट देकर उसका रोना बंद कर देगी।

चाहे रो कर हो या बयान देकर राजनीति में मनोरंजन होते रहना चाहिए। मनोरंजन नहीं होगा तो राजनीति और नेता 'बोर' लगने लगेंगे। बोरियत अवसाद की जननी है। शायद यही सोचकर हमारे नेता लोग राजनीति में गंभीरता और अवसाद को नहीं आने देना चाहते।

राजनीति और नेता के बीच मनोरंजन यों ही कायम रहे, हमें और क्या चाहिए। पारंपरिक राजनीति से पिंड छुड़ाने का मनोरंजन ही मस्त रास्ता हो सकता है।

कहने वाले चाहे कुछ भी कहते रहें मगर इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि राजनीति का मजा सिर्फ मनोरंजन के दम पर ही बना हुआ है। बिना मनोरंजन के क्या राजनीति और क्या नेता। मनोरंजन चालू आहे, बस यही दुआ है।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

मंगल पर पानी

मंगल ग्रह पर पानी मिलने की खबर 'जंगल में आग' की तरह मेरे मोहल्ले में फैल चुकी हैं। अपने सभी जरूरी कामों को छोड़कर हर कोई बस मंगल पर पानी होने की बहस में उलझा हुआ है। सुनने में आया है कि कुछ मोहल्ले वालों ने 'प्लान' किया है, मंगल पर जाकर पानी लाने का। दरअसल, उनकी निगाह में मंगल पर मिला पानी 'गंगाजल' से कम नहीं! मंगल के पानी से नहाकर वे अपने समस्त पापों को धो लेना चाहते हैं।

जब से मैंने मोहल्ले वालों की मंगल ग्रह पर जाकर पानी लाने की बात को सुना है, कसम से, मेरा दिल भी मंगल पर जाने को 'बेताब' है। मैं स्वयं मंगल के पानी से नहाकर अपने समस्त पापों को धो लेना चाहता हूं। हालांकि इससे पहले भी मैं कई दफा गंगा में डूबकी लगाकर अपने पापों को धो आया हूं मगर अभी भी वो सही से धुले नहीं हैं। शरीर के कुछ हिस्सों में कुछ पाप अब भी धुलने से रह गए हैं। यों भी, मैंने जिंदगी में पाप क्या कम किए हैं प्यारे!

चलो अच्छा ही हुआ, जो मंगल पर पानी की संभावना की पुष्टि हो गई। अब धरती का इंसान आराम से मंगल ग्रह पर जाकर बस सकेगा। मंगल पर जीवन की संभावना की पुष्टि वैज्ञानिक लोग पहले ही कर चुके हैं। यों भी, धरती अब रहने लायक बची भी कहां है। हवा से लेकर पानी तक सबकुछ 'अशुद्ध' हो चला है। सुनने में आया है कि आने वाले सालों में धरती पर पानी का लेबल भी काफी नीचे खिसक जाएगा। ऐसे में मंगल ग्रह पर पानी का मिलना, वहां कम से कम पानी की किल्लत के झाड़-झंझट से तो निजात दिलायगा ही।

कुछ लोग मंगल के पानी का उपयोग अपने पापों को धोने में करेंगे तो कुछ आड़े वक्त के लिए पानी को स्टोर करने में। धरती पर पानी की कमी के बाद हमारे कने एक ही ऑप्शन होगा- मंगल के पानी का सद्पयोग।

वैसे, मनुष्य के जुगाड़ू होने में कोई शक नहीं। चाहे धरती हो या पाताल या आकाश या मंगल ग्रह अपने जीने-रहने की जुगाड़ कर ही लेता है। ये जो मंगल ग्रह पर पानी की खोज हुई है न, यह केवल अपनी 'वाह-वाह' के लिए नहीं बल्कि वहां जाकर बसने की 'प्यूचर प्लानिंग' भी इसमें शामिल है। इंसान कभी भी कोई काम एंवई नहीं करता। करता तब ही है, जब उसे अपना फायदा नजर आता है।

हालांकि अभी जो पानी मंगल पर मिला है, उसमें 'नमक' की मात्रा अधिक है। पर कोई नहीं, इंसान उसे भी 'प्योरिफाई' करके अपने पीने-नहाने लायक बना ही लेगा। बहुत संभव है, आगे ऐसी तकनीक भी विकसित हो जाए कि फाबर केबल या डिजिटल विधि के सहारे पानी सीधा धरती को सप्लाई होने लगे। जब समूची दुनिया एक हथेली बराबर स्मार्टफोन में समा सकती है, तो फिर मंगल के पानी का धरती पर आना कौन-सी बड़ी बात है प्यारे। हो सकता है, पानी भी वाह्टसएप या मेसैंजर के सहारे मिलने लगे।

फिलहाल, अभी तो हम धरतीवासियों के लिए मंगल ग्रह पर पानी मिलना अजूबी और अनूठी खोज-खबर ही है। कुछ दिनों तलक हम अभी इसी खुमारी में डूबे रहेंगे। मंगल के पानी से पापों को धोना है या पीने लायक बनाना है या बिजली पैदा करती है, इसकी जोड़-जुगाड़ में व्यस्त रहेंगे। क्योंकि पानी हमारे लिए कोई छोटी-मोटी चीज नहीं। पानी हमारी जान और शान है। पानी के लिए तो गली-मोहल्लों में बड़ी-बड़ी लड़ाईयां तक हो जाती है। बिन पानी सब सून।

अभी तो फिलहाल मेरी मेरे मोहल्ले वालों के साथ मंगल ग्रह पर जाने की तैयारियां चल रही हैं। शायद मंगल का पानी ही हमारे पापों को धोकर हमें 'और पवित्र' बना दे!