सोमवार, 14 सितंबर 2015

लेखन में आरक्षण

मुझे लेखन में 'आरक्षण' चाहिए! न न चौंकिए नहीं। वाकई मुझे लेखन में ही आरक्षण चाहिए। जब दुनिया भर की चीजों में आरक्षण बंदर-बांट की तरह बंट सकता है, तो मेरी लेखन में आरक्षण की मांग क्यों अनुचित है? बल्कि मैं तो कहता हूं, लेखन के साथ-साथ कागज-कलम-दवात तक में हमें आरक्षण की मांग करनी चाहिए। आरक्षण ही हमारे तईं एकमात्र ऐसा औजार है, जिसके दम पर न केवल हम अपनी जाति, अपने समाज बल्कि देश तक को इसका 'राजनीतिक' एवं 'चुनावी गुलाम' बना सकते हैं।

बहुत संभव है, मेरी लेखन में आरक्षण की मांग को सुनकर बहुतों के पेटों में मरोड़ें उठने लगी होंगी। कुछ ने तो मुझे मन ही मन गरिया भी डाला होगा। और कुछ लगे होंगे मुझे लेखन बिरादरी से ही बहिष्कृत करने-करवाने की जुगाड़ में। मगर उससे होता क्या है पियारे? इस डर से क्या मैं अपनी मांग से पीछे हट जाऊंगा? न जी न बिल्कुल नहीं। ऐसे कथित डरों को मैं अपने ठेंगे पर रखता हूं।

जब हार्दिक महाशय अपनी मांग से पीछे नहीं हटे, केवल आरक्षण के मुद्दे पर ही उन्होंने इत्ती बड़ी भीड़ जुटा ली। एक राज्य को आग के हवाले करवा दिया। तो फिर भला मैं ही क्यों पीछे हटूं? हां, इस बात से आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए कि मैं हार्दिक जैसा कुछ करूंगा। न न मैं ऐसा कुछ भी ऊट-पटांग करने नहीं जा रहा। बस अपनी मांग पर कायम हूं। लेखन में आरक्षण से कम मुझे कुछ मंजूर नहीं।

आरक्षण की 'मलाई' बहुत 'स्वादिष्ट' होती है। एक दफा जो चख लेता है, फिर जीवन भर उसे छोड़ना नहीं चाहता। केवल आरक्षण के दम पर ही न जाने कित्ते सुविधाओं की नैया पार कर गए हैं। ठीक ऐसा ही मैं भी करना चाहता हूं। मुझे तो बेहद 'हैरानी' है कि आज तलक कभी किसी लेखक ने लेखन में आरक्षण की मांग क्यों नहीं की? क्यों लेखकों ने लेखन में आरक्षण को लेकर सरकारों-मंत्रियों-नेताओं को नहीं चेताया? लेखक को अगर लेखन में आरक्षण मिलने लग जाए फिर तो उसके सदियों पुराने दलिद्दर को दूर होने में जरा भी समय नहीं लगेगा। राजा बन जाए लेखक राजा।

मैं तो कहता हूं, अभी मौका है, चोट सीधी चोट कर ही देनी चाहिए। आरक्षण पर जहां इत्ती जूतम-पैजार मची है, एक और सही। यों भी, हमारे कने बहुत समय है, ऐसी बहसों-विवादों में पड़कर अपना टाइम खोटी करने के लिए।

लेखन में आरक्षण की मांग को लेकर मैं बहुत ही जल्द जंतर-मंतर पर 'धरना' देने का प्लान बना रहा हूं, अगर कोई लेखक मेरे साथ आना चाहे तो उसका स्वागत है। नहीं तो मैं ये लड़ाई अकेले दम ही लड़ूंगा। आरक्षण का सवाल है भाई। जब सब मिलकर आरक्षण का लड्डू गटकने में लगे हैं तो फिर मैं ही क्यों लल्लू बना रहूं। लेखन में आरक्षण को लेकर 'मेरा संघर्ष' अंत तक जारी रहेगा। आरक्षण जिंदाबाद।

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