बुधवार, 30 सितंबर 2015

मच्छरों से लगाव

यह तो चलो डेंगू का मच्छर रहा यों भी मुझे मच्छरों से 'खासा लगाव' है। इस दुनिया में मच्छर मुझे सबसे अधिक 'स्वतंत्र प्राणी' नजर आता है। न कहीं आने, न कहीं जाने, न किसी पर बैठने, न किसी को काटने किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं। एकदम स्वतंत्र और बिंदास।

यह कहावत- 'देखन में छोटे लागें, घाव करें गंभीर' शायद मच्छरों के लिए ही बनाई गई होगी! इसमें कोई शक नहीं मच्छर का काटा सिर्फ बिस्तर और डॉक्टर की पनाह मांगता है। अगर मच्छर डेंगू का हो तो सोने पर सुहागा। इंसान की सारी हेकड़ी मच्छर दो मिनट में निकालकर रख देता है। चाहे कोई कित्ती ही बड़ी तोप क्यों न हो मच्छर के डंक के आगे हर तोप सील जाती है।

पता नहीं क्यों लेकिन हां मुझे डरा-सहमा इंसान बहुत अच्छा लगता है। दिल को बहुत तसल्ली-सी मिलती यह देखकर कि इंसान किसी से डरता भी है। वरना तो इंसान अब न शैतान से डरता है न भगवान से। हर डर का तोड़ निकाल लिया है उसने।

इन दिनों इंसान डेंगू के मच्छर से बेहद डरा हुआ है। डर का आलम यह है कि उसने भीड़ में जाना, लोगों से मिलना, गंदगी के करीब रहना लगभग छोड़ ही दिया है। हर समय खुद को साफ-सुधरा रखने की जुगत में लगा रहता है। वो तो सब ठीक है पर डेंगू का मच्छर इंसान से भी कहीं ज्यादा चालाक और स्मार्ट है। जब जहां मौका पड़ता है, झट्ट से अपना डंक उसके शरीर में घुसेड़ ही देता है। डॉन तो एक बार को फिर भी पकड़ में आ सकता है किंतु डेंगू के मच्छर को पकड़ना आसान ही नहीं बल्कि असंभव है। एक पिद्दी भरे मच्छर से इंसान भला क्या मुकाबला कर पाएगा?

सुनने में आया है कि डेंगू के मच्छर की विल-पॉवर इत्ती मजबूत है कि उस पर किसी भी तगड़े से तगड़े कीटनाशक का कोई असर नहीं होता। अब आप समझ सकते हैं कि मच्छर जिस खून को चूसता है, वो कित्ता 'जहरीला' है। शायद इसीलिए इंसान धरती का सबसे जहरीला प्राणी बनने की ओर अग्रसर है। तब ही तो उस पर किसी की वेदना-संवेदना का कोई असर नहीं होता।

मुझे बड़ा बुरा-सा लगता है, जब लोग डेंगू के लिए बिचारे मच्छर को दोष देते हैं। इसमें बिचारे मच्छर का क्या दोष? उसे जहां अपना पेट भरने का सामान नजर आएगा, वो वहीं जाएगा न। अब इंसान को काटने से उसका पेट भरता है, तो इसमें गलत ही क्या है पियारे। इंसान से लेकर जानवर तक को अपनी सुविधानुसार अपना पेट भरने का हक है।

आपकी तो खैर नहीं जानता लेकिन जब कोई मच्छर मेरा खून चूसने का प्रयास करता है, तो मैं उसे चूसने देता हूं। इस बहाने मेरा 'गंदा खून' कम से कम बाहर तो निकल जाता है। पांच-दस बूंद खून चूस जाने से मैं भला कौन सा 'दुबला' हुआ जा रहा हूं। मच्छर का पेट भरना हमेशा मेरी प्राथमिकता में रहा है। जियो और जीने दो का सिद्धांत मुझे बेहद प्रिय है।

किसी इंसान से दोस्ती करने से बेहतर मैं मच्छर से दोस्ती करना ज्यादा उचित समझूंगा। इंसान तो फिर भी धोखा दे सकता है किंतु मच्छर कभी धोखा नहीं देगा। खासकर, मुझे तो धोखा इसलिए भी नहीं देगा क्योंकि मुझसे उसे उसका पेट भरने लायक पोषण जो मिलता है। इसी कारण मैं इंसानों से ज्यादा मच्छरों से लगाव रखता हूं।

यह मच्छर ही हैं, जिनके कारण आज मैं लिख पा रहा हूं। हर रोज सुबह जगाने के लिए मच्छरों की भून-भूनाहट मेरे तईं किसी 'वरदान' से कम नहीं होती। फिर भला मैं क्यों मच्छरों को बुरा-भला कहूं। मच्छर तो मेरे सुख-दुख के साथी हैं। 

1 टिप्पणी:

अजय कुमार झा ने कहा…

एक मच्छर आदमी ..उफ्फ आदमी नहीं पूरी की पूरी सरकार को निक्कमा और नकारा बना देता है , कमाल की बात है की हर साल बना देता है | डटे रहिए मित्रवर