मंगलवार, 29 सितंबर 2015

अब प्याज घोटाला

आह! इत्ते दिनों के बाद किसी घोटाले की खबर सुनने को मिली। वरना, तो घोटाले की खबर सुनने को कान तरस गए थे। एकदम नई सरकार। एकदम नया घोटाला। घोटाला भी ऐसा कि सुनते ही आंखों में पानी आ जाए।... प्याज घोटाला।

वाह! प्याज ने क्या किस्मत पाई है। अभी तलक तो प्याज मार्केट से लेकर किचन तक रूला रहा था, अब घोटाले में सरकार को रूलाएगा। प्याज ने हालांकि पुरानी सरकारों को भी खूब रूलाया है लेकिन इस सरकार को रोते देखने का मजा ही कुछ और है। ईमानदार सरकार। ईमानदार नेता। ईमानदार आचरण। ईमानदार बातें। कित्ती ईमानदारियों के बीच प्याज घोटाला किसी 'ईमानदार घोटाले' से कम नहीं!

सच बोलूं, मुझे बेईमानों को घोटाला करते देखना जरा भी पसंद नहीं। ईमानदार लोग जब घोटाले के रण-क्षेत्र में उतरते हैं, फिर 'मनोरंजन' दोगुना हो जाता है। हालांकि सरकार के मुख्यमंत्री से लेकर नेता लोग यह कह जरूर रहे हैं कि प्याज घोटाले से उनका कोई मतलब नहीं। यह सब विरोधियों की साजिश है, एक ईमानदार सरकार को खुलेआम बदनाम करने की। इस बाबत उन्होंने एक बड़े न्यूज चैनल के खिलाफ भारी-भरकम विज्ञापन भी छपवा दिया है। मगर इससे क्या होता है? एक दफा घोटाले की फेहरिस्त में नाम दर्ज हो गया तो फिर हो ही गया। प्याज घोटाले का यह तमगा अब ईमानदार सरकार के माथे पर चिपका ही रहना है।

बड़े कहते थे कि हम अलग तरह की राजनीति करने वाले लोग हैं। जन-आंदोलन से उपजे हैं। केवल जनता की बात करते हैं। हमारा उद्देश्य भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना है। दरअसल, राजनीति के मैदान में खड़े होकर ऊंचे-ऊंचे जुमले बनाने में कुछ नहीं जाता है। कोई 'काला धन' पर जुमले बनाता है तो कोई 'भ्रष्टाचार' पर। जुमलों का कर्ज अंततः चुकाना जनता को ही पड़ता है। पांच साल तलक सरकार और नेता तो घोटालों में व्यस्त हो जाते हैं। बाद में सफाई चाहे जो दे लो, सेहत पर फर्क केवल जनता के ही पड़ना है।

वैसे, ईमानदार सरकार को प्याज घोटाले पर इत्ता 'बुरा' नहीं मानना चाहिए। घोटाले तो सत्ता, सरकार, राजनीति, नेता की 'बपौती' होते हैं। भला इनसे कैसा बैर? राजनीति में आएं और घोटाले का दाग न लगे, भला ऐसे भी कोई सरकार चला करती है? घोटाले सरकार और नेता को 'अमिट पहचान' दिलाते हैं।

आप हैं कि एक ही घोटाले पर इत्ता परेशान हो लिए। यहां तो इत्ती सरकारें आईं और चली गईं किस्म-किस्त के घोटालों के तमाम 'इल्जाम' लगे। नेता-मंत्री तक जेल की सैर कर आए। लेकिन मजाल है, जो किसी नेता या सरकार के माथे पर, घोटाले को, लेकर बल भी पड़े हों। वो घोटाले करते रहे। सजा-सुनवाई होती रही। जनता इत्मिनान से मनोरंजन करती रही। दो-चार दिन कोस-कास के मीडिया वाले भी चुप बैठ जाते हैं।

अब तलक हुए तमाम घोटालों के बीच प्याज घोटाला एकदम मस्त घोटाला है। ऐसा घोटाला न पहले कभी हुआ, न आगे होने की संभावना ही है। क्योंकि सरकार दाल-गेहूं-चावल से तो पंगा ले सकती है किंतु प्याज से नहीं। प्याज से पंगा लेने का मतलब है, आंसूओं के साथ रोना। जब भी प्याज के दाम बढ़े हैं, इसने बड़ी से बड़ी सरकारों को खूब रूलाया है।

कथित ईमानदार सरकार के लिए प्याज घोटाला पहला एक्सपीरियंस है। उन्हें इस पहले एक्सपीरियंस को एंज्वॉय करना चाहिए नाकि इस-उस के खिलाफ विज्ञापन छपवाना। घोटाले से सरकार या नेता की छवि 'बदनाम' नहीं बल्कि 'नामदार' बनती है। वो कहावत है न कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा।

ईमनदार सरकार के पास यही मौका है, अपने नाम को प्याज घोटाले के बहाने चमकाने का।

5 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 01 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Kavita Rawat ने कहा…


कथित ईमानदार सरकार के लिए प्याज घोटाला पहला एक्सपीरियंस है। उन्हें इस पहले एक्सपीरियंस को एंज्वॉय करना चाहिए नाकि इस-उस के खिलाफ विज्ञापन छपवाना। घोटाले से सरकार या नेता की छवि 'बदनाम' नहीं बल्कि 'नामदार' बनती है। वो कहावत है न कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा।
...प्याज घोटाला एकदम मस्त घोटाला है।

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 1 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2115 में दिया जाएगा
धन्यवाद

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत ही गजब की चिकोटी काटी है आपने जी , सरकार तो खून के ऊप्स यानी प्याज के आंसू रोने पर मजबूर हो गयी है

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत शानदार