सोमवार, 28 सितंबर 2015

फेसबुक और डिसलाइक

फेसबुक पर किस्म-किस्म के 'फसाद' होते रहना कोई नई बात नहीं। हर रोज, हर क्षण कोई न कोई किसी न किसी से किसी न किसी बात पर मुंह फुलाए बैठ ही रहता है। कभी-कभी तो बात इत्ती बढ़ जाती है कि फेसबुक की दीवार से बाहर देख लेने तक की नौबत आ जाती है। जिनमें ऐसे फसादों को झेलने की कुव्वत होती है, वे फेसबुक पर ठसक के साथ जमे रहते हैं। जिनमें नहीं होती, वे तुरंत कट लेते हैं।

दरअसल, फेसबुकवीरों को असहमति को सुनना कतई बर्दाशत नहीं। आप उनकी कही-लिखी बात को काट नहीं सकते। अगर काटेंगे तो भुगतेंगे। उनकी बस एक ही तमन्ना रहती है कि आप उनकी पोस्ट को 'लाइक' पर 'लाइक' करते चले जाएं। जो पसंद न भी आ रही हो, उसे भी लाइक मारें। कुछ फेसबुकवीर तो ऐसे भी हैं, जो सीधा इन-बॉक्स में आकर बंदे-बंदी से कहते हैं कि हमारी फलां-फलां पोस्ट को अपने लाइक से नवाजें।

लाइक न हुआ बंगाली रसोगुल्ला हो गया। जब तलक मुंह में नहीं चला जाता, मिठास का अहसास ही नहीं होता। कभी-कभी तो महसूस होता है कि फेसबुक पर अगर लाइक का बटन न होता, तो न जाने कित्ते फेसबुकवीर इसकी दीवार से अपना सिर-सिर पट-पटकर जाने दे देते। मानो, सारी कायनात की खुशी एक लाइक पर ही टिकी हो!

इधर, सुनने में आया है कि फेसबुक के मुखिया मार्क जुकरबर्ग फेसबुक पर 'डिसलाइक' का ऑप्शन चिपकाने वाले हैं। मतलब, अगर किसी की पोस्ट या फोटू आपको पसंद न आए या किसी से असहमति जतलानी हो तो खट्ट से डिसलाइक दबा दें। वो तो सब ठीक है पियारे लेकिन मुझे यह डिसलाइक का ऑप्शन एक नए फसाद की जड़ सरीखा एहसास दे रहा है। यों, फेसबुक पर विवाद-फसाद पहले ही क्या कम थे, जो अब एक नया हथियार दे दिया जाएगा लड़ने-भिड़ने को।

यहां तो एक जरा से लाइक न करने पर लोग इन-बॉक्स में घुसे चले आते हैं। कहीं अगर पोस्ट या फोटू को डिसलाइक कर दिया तो सीधा घर में ही न घुसे चले आएं! मार्क जुकरबर्ग समझ नहीं रहे पर इस डिसलाइक के भीषण खतरे हैं। जरा कल्पना कीजिए, यह डिस्लाइक अगर कहीं पत्नी की पोस्ट या फोटू पर ही दब गया, फिर बिचारे पति के हाल को बेहाल होने में देर ही कित्ती लगनी है। न जाने कित्ते ही तलाक केवल डिसलाइक के कारण ही हो लेंगे। डिसलाइक का यह ऑप्शन बैठे-ठाले रायता फैलाने का जरिया बन जाएगा।

वैसे, डिस्लाइक की स्थिति न सिर्फ सोशल प्लेटफॉर्म बल्कि समाज में भी काफी 'दयनीय' है। हालत यह है कि कोई किसी के भी डिसलाइक को सहन नहीं करना चाहता। हर कोई केवल लाइक पर मरता है। लाइक करते रहें और समाने वाले की प्रशंसा के पात्र बने रहें। मनुष्य अब सामाजिक नहीं बल्कि लाइक-ओरिएंटिड प्राणी बनकर रह गया है। अब तो लोग लाइक खरीदने की हैसियत भी रखने लगे हैं।

ऐसे में फेसबुक पर डिसलाइक का ऑप्शन आपस में दंगल करवाने वाला कदम ही कहा जाएगा। जो लोग फेसबुक पर डिसलाइक के ऑप्शन पर बल्लियों उछल रहे हैं, वे शायद नहीं जानते, इस हथियार का इस्तेमाल उनके खिलाफ भी हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा जरूरी है, इस पंगेबाज (डिसलाइक) के ऑप्शन को साधना।

मार्क जुकरबर्ग से मेरी गुजारिश है कि डिसलाइक के इस ऑप्शन पर वे पुनः विचार करें। डिसलाइक को इत्ता हलके में न लें कि आगे चलकर कहीं अंगूठा ही काटने की नौबत न आ जाए!

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

पहले आने दो डिसलाइक बटन..एक नया खिलौना मिल जाएगा जो कुछ दिन बाद घिस पिट जाएगा ....फिर कोई और आ जायेगा ....बस चलते रहना चाहिए खट्टर पटर