मंगलवार, 22 सितंबर 2015

फेसबुक, डिसलाइक और कलेस

पियारे, जमाना 'लाइक' का है। फेसबुक से लेकर निजी जिंदगी तक में रिश्ते-नाते एवं दोस्तियां अब 'लाइक' के दम पर ही तय हो रही हैं। यहां जिसके लाइक में दम होता है, वही बाजी मार ले जाता है। जो लाइक से ज्यादा कमेंट में विश्वास रखता है, उसे 'प्रतिक्रियावादी' कहकर पीछे धकेल दिया जाता है। जी हां, यही सोशल नेटवर्किंग का रूल भी है और दस्तूर भी। और, हमें एडजस्ट भी इसी के साथ करना है।

लेकिन, जब से फेसबुक पर 'डिसलाइक' का विकल्प आने की खबर आम हुई है, तमाम लोगों के साथ-साथ मेरी 'बेचैनियां' भी काफी बढ़ गई हैं। डिसलाइक का साफ-सीधा सा मतलब है, फेसबुक पर 'कलेस' का एक नया मैदान तैयार होना। फिर तो हर दिन किसी न किसी बात पर डिसलाइक को लेकर फेसबुकवीरों में आपस में कलेसबाजी और लठ्ठम-लठ्ठ हुआ करेगी। खुल्लम-खुल्ला प्रश्न पूछे जाएंगे- तूने मेरी पोस्ट या फोटू को डिसलाइक क्यों किया? तेरी इत्ती हिम्मत मेरी पोस्ट को डिसलाइक करने की? अल्लम-बल्लम...।

यों भी, फेसबुक पर पंगे-फसाद क्या कम होते हैं, जो डिसलाइक का उस्तरा भी बंदर के हाथ में थमा दिया जाएगा। मेरी तो यह सोच-सोचकर ही सिट्टी-पिट्टी गुम हुए जा रही है कि डिसलाइक के कलेस को झेला कैसे जाएगा? किसी ने अगर मेरी ही पोस्ट को डिसलाइक कर दिया, फिर मेरा रिएक्शन क्या होगा? यहां तो आलम यह है कि किसी साधारण-सी पोस्ट पर भी अगर लाइक न ठोको तो बंदा सीधा इन-बॉक्स में घुसा चला आता है, यह कहने कि भइया, मेरी पोस्ट पर लाइक तो दे दो। और, कुछ तो इत्ता विकट मुंह फुलाकर बैठ जाते हैं, अगर बिना लाइक मारे उनकी पोस्ट के रास्ते से गुजर भी जाओ तो। इतिहास गवाह है कि यहां लाइक न मारने के चक्कर में न जाने कित्ती ही दोस्तियां टूट-बिखर चुकी हैं।

सौ बातों की एक बात है पियारे, अगर फेसबुक पर रहना है तो लाइक का साथ हर हाल में निभाना ही होगा। बिना लाइक के यहां यारी-दोस्ती की गाड़ी न चलने वाली। अगर आप लाइक के साथ बने हुए हैं तो संबंध सबसे मधुर रखे हुए हैं। डिसलाइक का विकल्प तो केवल कलेसबाजी के लिए ही होगा।

तिस पर भी जो कथित फेसबुकवीर डिसलाइक के विकल्प को लेकर खुश हैं, उनसे मुझे केवल इत्ता ही कहना है कि ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि डिसलाइक का दांव कभी आप पर भी उल्टा पड़ सकता है। यह फेसबुक है मेरी जान। यहां कभी भी, कुछ भी, किसी के साथ हो सकता है। फिर क्या करोगो- बोलो...? न न यह 'भ्रम' दिमाग से कतई निकाल देना कि डिसलाइक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सरीखा विकल्प होगा। फेसबुक पर सारी स्वतंत्रताएं लाइक से शुरू होकर लाइक पर ही खत्म होती हैं। बिन लाइक भला यहां कैसा मनोरंजन और कैसे दोस्त-दोस्तियां।

डिसलाइक के 'दुष्परिणाम' अगर देखने ही हैं न तो एक दफा अपनी बीवी की पोस्ट या फोटू को डिसलाइक करके देख लीजिए। सेकेंडभर में सब मालूम चल जाएगा- डिसलाइक करने का 'आत्मघाती परिणाम' क्या होता है! फिर डिसलाइक पर आपका कोई स्पष्टीकरण नहीं चल पाएगा, सीधी सजा ही सुनाई जाएगी। तो बोलिए क्या हैं, ऐसे आत्मघाती डिसलाइक को झेलने के लिए तैयार?

पियारे जुकरबर्ग, मेरी मानो तो एक दफा फिर से पुर्नविचार कर लो डिसलाइक के विकल्प पर। फेसबुक की दुनिया लाइक के दम पर ही मस्त और बिंदास चल रही है। इसे यों ही चलते रहने दो। काहे को डिसलाइक के विकल्प को बीच में लाकर इसे 'बदरंग' करने पर तुले हो पियारे।

कहीं ऐसा न हो, आगे चलकर डिसलाइक शुद्ध कलेस का माध्यम बन जाए। और हम फेसबुकिए किसी नए कलेस में उलझकर रह जाएं। डिसलाइक जैसे 'आत्मघाती विकल्प' से किसी भी सूरत में बच पाना लगभग 'नामुमकिन' है पियारे जुकरबर्ग।

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