रविवार, 13 सितंबर 2015

हिंदी और टेंशन

'आप एंवई हिंदी की टेंशन ले रहे हैं। हिंदी टनाटन दौड़ रही है। सोशल नेटवर्किंग से लेकर निजी जिंदगी तक में बस हिंदी ही हिंदी है।' मैंने उन्हें समझाया। मगर वो मानने को तैयार ही नहीं। चिंतत होकर कहते हैं कि 'हिंदी भाषा हर ओर मर रही है और आप कह रहे हैं कि हिंदी टनाटन दौड़ रही है।'

'देखिए हुजूर सोच-सोच का फरक है। आपकी निगाह में हिंदी मर रही है। मेरी निगाह में हिंदी टनाटन दौड़ रही है। बेहतर होगा कि आप अपनी सोच को बदल डालें। हिंदी के बारे में अधिक टेंशन न लें। यों भी, आप हार्ट के मरीज हैं। हिंदी के चक्कर में कहीं ऊंच-नीच हो गई तो दुनिया दोष बिचारी हिंदी को ही देगी।'

वे बेहद दुखी होकर बोले- 'आपने फेसबुक और टि्वटर पर लिखी जाने वाली हिंदी पढ़ी है कभी! क्या लिखते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। इत्ते कम शब्दों में भी भला कोई बात हो सकती है? लोग तो वन-लाइन लिखकर ही खुद को लेखन व हिंदी जगत का 'बादशाह' मानने लगे हैं। बिगाड़कर रख दिया है, इस वन-लाइनर भाषा ने। इसीलिए तो मैं न फेसबुक पर हूं न टि्वटर पर।'

मैंने पुनः समझाने की कोशिश की- 'मान्यवर, दुनिया बदल रही है। लोग की पहचान से लेकर पहनावा तक बदल रहा है। तो क्या भाषा और शब्द न बदलेंगे? फेसबुक और टि्वटर पर अगर शुक्ल या द्विवेदी युगीन भाषा (हिंदी) लिखी जाएगी तो भला कित्ते लोग समझ-पढ़ पाएंगे? अब जमाना कम से कम शब्दों में ज्यादा बात को कहने का है। फेसबुक पर लंबे-लंबे स्टेटस न पढ़ने का चलन है, न लिखने का (केवल अपवादों को छोड़कर)। वहां तो बंदा-बंदी कम शब्दों में ही अपनी बात को कहकर निकल लेते हैं। ठीक लगे तो 'लाइक' मार दें। ठीक नहीं लगे तो बिन पढ़े ही छोड़ दें। वहां भला कौन आपसे यह कहने आ रहा है कि मेरा वाला स्टेटस पढ़ा कि नहीं। वहां सब खुद ही संपादक और खुद ही पाठक हैं। एकदम स्वतंत्र टाइप के।'

'वो सब सही है भाई मगर हिंदी की 'शाश्वत्ता' तो नष्ट हो ही रही है न। आजकल के बच्चे हिंदी ढंग से न लिखना जानते हैं, न बोलना, न पढ़ना। जब देखो तो तब 'व्हाट्सऐप' पर चैटिंग-शैटिंग में बिजी रहते हैं। शब्द और वाक्य इत्ते छोटे कर दिए हैं कि समझ नहीं आता- क्या 'ऑल' लिखा है और क्या 'बट'। सबकुछ शॉर्ट...। भला ऐसे-कैसे चलेगी हमारी हिंदी। हिंदी तो बिल्कुल शुद्ध होनी चाहिए।' उन्होंने फिर अपनी बात को विस्तार दिया।

मैंने कहा- 'हुजूर, जिस टाइप की हिंदी की खुमारी में आप जी रहे हैं, उसके जमाने हवा हुए। अपने कथित सुनहरे अतीत से बाहर निकल आइए। यह दुनिया इत्ती तेजी से पलटियां खा रही हैं कि आप-हम इसको पकड़ने की कोशिश करेंगे तो भी ये पकड़ाई में न आने वाली। अब शॉर्ट बातों, शॉर्ट शब्दों, शॉर्ट लेखन का ही जमाना है। हुनर तो इस बात में है कि कम से कम शब्दों में आप अपनी बात को कैसे कह-लिख पाते हैं। आजकल के बच्चों और तब के बच्चों में बस यही 'फरक' है। जिस दिन इस फरक को आप जान-समझ जाएंगे फिर आजकल की हिंदी आपको 'बोर' नहीं बल्कि 'घणी इंटरस्टिंग' लगेगी। अमां, आज के जमाने में जब इंसान से लेकर पानी तक 'शुद्ध' नहीं फिर भला भाषा कैसे शुद्ध हो लेगी? ज्यादा शुद्धता के चक्कर में न पड़ें, जो है उसे स्वीकार करें। इसी में मजा है।'

उन्हें अब भी लग रहा था कि मैं हिंदी के प्रति 'गंभीर' नहीं। सोशल नेटवर्किंग की हिंदी का पक्ष लेकर मैं हिंदी का 'अपमान' कर रहा हूं। उन्हें आज भी वही हिंदी पसंद है, जो पचास-साठ के दशक में लिखी-बोली जाती थी। शायद इसीलिए आज की बदलती हिंदी को लेकर उनके भीतर गहरा 'अवसाद' है।

जो भी हो, हिंदी अब न मेरे चहाने से बदलने वाली है, न उनके। भलाई इसी में है कि वर्तमान में चल रही हिंदी को ही स्वीकार किया जाए। फिर यह क्या कम बड़ी उपलब्धि है कि आज हिंदी इंग्लिश से बराबर की टक्कर ले रही है। हिंदी एकदम टनाटन है। हिंदी की टेंशन लेने से बेहतर होगा कि हम खुद के बंद पड़े दिमाग को खोलें। जय हिंदी। 

4 टिप्‍पणियां:

jyotsna kumari ने कहा…

समय के साथ सबको बदलना पड़ता है. ......फिर भाषा वही समृद्घ हो सकती है, जो अपने भीतर प्रचलित शब्दों और बोलियों को आत्मसात् करती हुई आगे बढे।

Kavita Rawat ने कहा…

हिन्दी दिवस पर टनाटन पोस्ट के लिए धन्यवाद!
जय हिन्दी

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व हिन्दी सम्मलेन और हमारी हिन्दी में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

शुक्रिया आप सब का।