बुधवार, 2 सितंबर 2015

सेंसेक्स की सेहत

पिछली भयंकर गिरावट के बाद से अभी तलक सेंसेक्स की सेहत में 'खास सुधार' नहीं आ पाया है। हालांकि एक-दो दिन बढ़त का माहौल बना जरूर था लेकिन कहानी फिर से वहीं आन टिकी है। सेंसेक्स के खाते में से पांच-छह सौ अंक यों गायब हो जा रहे हैं, जैसे थाली में से दाल।

सेंसेक्स की बिगड़ी सेहत को देखकर दलाल पथ पर भी अब पहले जैसी चहल-पहल नजर नहीं आती। हर चेहरे पर नुकसान की लकीरें साफ दिखलाई पड़ती हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं, जो लगातार नुकसान देते-देते, इस बाजार से ही कट लिए हैं। उनकी हिम्मत जवाब दे गई है। बात भी सही है, आखिर नुकसान को सहन करने की एक सीमा होती है। शेयर बाजार में बंदा दो का चार करने के लिए ही आता है, चार का जीरो बनाने के लिए नहीं।

लेकिन, बिचारा सेंसेक्स भी क्या करे? बिचारा वक्त और हालात के आगे 'मजबूर' है। जब भी ऊबरने की कोशिश करता है, कोई न कोई 'निगेटिव न्यूज' उसे 'टंगड़ी' मारके गिरा ही देती है। 'संवेदनशील' इत्ता है कि जरा-सा कोई 'छींक' भी दे तो भरभरा कर यों गिर पड़ता है, मानो किसी ने 'बम' छोड़ दिया हो। बियर-बुल की लड़ाई में- कभी बियर हावी हो जाता है, कभी बुल। मार सीधी बिचारे निवेशकों पर पड़ती है। न निगलने के रह पाते हैं, न उगलने के।

ये अर्थव्यवस्थाएं भी बड़ा अजीब खेल दिखाती हैं। कभी अपने देश की अर्थव्यवस्था डांवा-डोल हो लेती है, तो कभी समूचे विश्व की। आजकल तो लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था का हाल बद से बदत्तर है। ग्लोबल मंदी ने शेयर बाजारों पर ऐसा जुलम ढहाया है कि बिचारे लुढ़कते हैं तो एक साथ सब के सब लुढ़कते ही चले जाते हैं। लुढ़कते वक्त न वित्तमंत्री की सुनते हैं, न प्रधानमंत्री की। जैसे लुढ़कना और लुढ़कते ही जाना दुनिया भर के शेयर बाजारों की नियति-सी बन गई हो।

इधर हमारी अर्थव्यवस्था में सुस्ती की खबर जब से आम हुई है, सेंसेक्स ने तो जैसे हाथ-पैर ही छोड़ दिए हैं। सेंसेक्स को ऐसा सदमा लगा है कि ऊबरने की गुंजाइश ही दिखाई नहीं देती। पिछले दिनों अर्थव्यव्स्था में अच्छे दिन आने के जो गुब्बारे छोड़े गए थे, धीरे-धीरे कर सब फुस्स होते जा रहे हैं। अच्छे दिन न सेंसेक्स के आ पा रहे हैं, न निवेशकों के, न अर्थव्यवस्था के। हां, नेताओं-मंत्रियों-सांसदों के अच्छे दिन जस के तस बने हुए हैं।

सेंसेक्स की बिगड़ी सेहत देखकर मुझे बेहद 'तकलीफ' होती है। तकलीफ क्यों न हो, आखिर मेरा सेंसेक्स से पिछले पंद्रहा सालों का नाता रहा है। सेंसेक्स से जुड़ा हर सुख-दुख मैंने नजदीक से देखा है। मैंने सेंसेक्स के वो 'गुलाबी दिन' भी देखें हैं, जब वो दुनिया भर के बाजारों का 'बादशाह' हुआ करता था। सेंसेक्स की एकतरफा बढ़ती चाल क्या गजब ढहाया करती थी।

मगर 2008 के बाद से सेंसेक्स की सेहत में जो गिरावट आई, अब तलक ढंग से सुधरने में नहीं आ पाई है। कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता है कि जैसे किसी ने हमारे सेंसेक्स पर 'टोना-टोटका' कर दिया हो। इधर जरा-सा ठीक होकर संभल पाता है कि दूसरे ही दिन फिर धड़ाम। इत्ता तो किसी का करेक्टर भी न गिरता, जित्ता सेंसेक्स गिर चुका हूं। अब तो लोग बाग 'गिरताऊ सेंसेक्स' कहके 'मजाक' भी बनाने लगे हैं।

न जाने कब वो दिन आएगा, जब सेंसेक्स पुनः अपने 'अच्छे दिनों' में वापस लौटेगा। सुस्त अर्थव्यवस्था, रफ्तार पकड़ेगी। दलाल पथ पर जश्न का माहौल होगा। मुरझाए चेहरे गुलाबी रंगत में दिखेंगे।

हम तो केवल सेंसेक्स की सेहत सुधरने की उम्मीद ही पाल सकते हैं, बाकी ऊपर वाले के हाथ है। किसको कैसे कहां नचाता है।

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