बुधवार, 30 सितंबर 2015

मच्छरों से लगाव

यह तो चलो डेंगू का मच्छर रहा यों भी मुझे मच्छरों से 'खासा लगाव' है। इस दुनिया में मच्छर मुझे सबसे अधिक 'स्वतंत्र प्राणी' नजर आता है। न कहीं आने, न कहीं जाने, न किसी पर बैठने, न किसी को काटने किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं। एकदम स्वतंत्र और बिंदास।

यह कहावत- 'देखन में छोटे लागें, घाव करें गंभीर' शायद मच्छरों के लिए ही बनाई गई होगी! इसमें कोई शक नहीं मच्छर का काटा सिर्फ बिस्तर और डॉक्टर की पनाह मांगता है। अगर मच्छर डेंगू का हो तो सोने पर सुहागा। इंसान की सारी हेकड़ी मच्छर दो मिनट में निकालकर रख देता है। चाहे कोई कित्ती ही बड़ी तोप क्यों न हो मच्छर के डंक के आगे हर तोप सील जाती है।

पता नहीं क्यों लेकिन हां मुझे डरा-सहमा इंसान बहुत अच्छा लगता है। दिल को बहुत तसल्ली-सी मिलती यह देखकर कि इंसान किसी से डरता भी है। वरना तो इंसान अब न शैतान से डरता है न भगवान से। हर डर का तोड़ निकाल लिया है उसने।

इन दिनों इंसान डेंगू के मच्छर से बेहद डरा हुआ है। डर का आलम यह है कि उसने भीड़ में जाना, लोगों से मिलना, गंदगी के करीब रहना लगभग छोड़ ही दिया है। हर समय खुद को साफ-सुधरा रखने की जुगत में लगा रहता है। वो तो सब ठीक है पर डेंगू का मच्छर इंसान से भी कहीं ज्यादा चालाक और स्मार्ट है। जब जहां मौका पड़ता है, झट्ट से अपना डंक उसके शरीर में घुसेड़ ही देता है। डॉन तो एक बार को फिर भी पकड़ में आ सकता है किंतु डेंगू के मच्छर को पकड़ना आसान ही नहीं बल्कि असंभव है। एक पिद्दी भरे मच्छर से इंसान भला क्या मुकाबला कर पाएगा?

सुनने में आया है कि डेंगू के मच्छर की विल-पॉवर इत्ती मजबूत है कि उस पर किसी भी तगड़े से तगड़े कीटनाशक का कोई असर नहीं होता। अब आप समझ सकते हैं कि मच्छर जिस खून को चूसता है, वो कित्ता 'जहरीला' है। शायद इसीलिए इंसान धरती का सबसे जहरीला प्राणी बनने की ओर अग्रसर है। तब ही तो उस पर किसी की वेदना-संवेदना का कोई असर नहीं होता।

मुझे बड़ा बुरा-सा लगता है, जब लोग डेंगू के लिए बिचारे मच्छर को दोष देते हैं। इसमें बिचारे मच्छर का क्या दोष? उसे जहां अपना पेट भरने का सामान नजर आएगा, वो वहीं जाएगा न। अब इंसान को काटने से उसका पेट भरता है, तो इसमें गलत ही क्या है पियारे। इंसान से लेकर जानवर तक को अपनी सुविधानुसार अपना पेट भरने का हक है।

आपकी तो खैर नहीं जानता लेकिन जब कोई मच्छर मेरा खून चूसने का प्रयास करता है, तो मैं उसे चूसने देता हूं। इस बहाने मेरा 'गंदा खून' कम से कम बाहर तो निकल जाता है। पांच-दस बूंद खून चूस जाने से मैं भला कौन सा 'दुबला' हुआ जा रहा हूं। मच्छर का पेट भरना हमेशा मेरी प्राथमिकता में रहा है। जियो और जीने दो का सिद्धांत मुझे बेहद प्रिय है।

किसी इंसान से दोस्ती करने से बेहतर मैं मच्छर से दोस्ती करना ज्यादा उचित समझूंगा। इंसान तो फिर भी धोखा दे सकता है किंतु मच्छर कभी धोखा नहीं देगा। खासकर, मुझे तो धोखा इसलिए भी नहीं देगा क्योंकि मुझसे उसे उसका पेट भरने लायक पोषण जो मिलता है। इसी कारण मैं इंसानों से ज्यादा मच्छरों से लगाव रखता हूं।

यह मच्छर ही हैं, जिनके कारण आज मैं लिख पा रहा हूं। हर रोज सुबह जगाने के लिए मच्छरों की भून-भूनाहट मेरे तईं किसी 'वरदान' से कम नहीं होती। फिर भला मैं क्यों मच्छरों को बुरा-भला कहूं। मच्छर तो मेरे सुख-दुख के साथी हैं। 

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

अब प्याज घोटाला

आह! इत्ते दिनों के बाद किसी घोटाले की खबर सुनने को मिली। वरना, तो घोटाले की खबर सुनने को कान तरस गए थे। एकदम नई सरकार। एकदम नया घोटाला। घोटाला भी ऐसा कि सुनते ही आंखों में पानी आ जाए।... प्याज घोटाला।

वाह! प्याज ने क्या किस्मत पाई है। अभी तलक तो प्याज मार्केट से लेकर किचन तक रूला रहा था, अब घोटाले में सरकार को रूलाएगा। प्याज ने हालांकि पुरानी सरकारों को भी खूब रूलाया है लेकिन इस सरकार को रोते देखने का मजा ही कुछ और है। ईमानदार सरकार। ईमानदार नेता। ईमानदार आचरण। ईमानदार बातें। कित्ती ईमानदारियों के बीच प्याज घोटाला किसी 'ईमानदार घोटाले' से कम नहीं!

सच बोलूं, मुझे बेईमानों को घोटाला करते देखना जरा भी पसंद नहीं। ईमानदार लोग जब घोटाले के रण-क्षेत्र में उतरते हैं, फिर 'मनोरंजन' दोगुना हो जाता है। हालांकि सरकार के मुख्यमंत्री से लेकर नेता लोग यह कह जरूर रहे हैं कि प्याज घोटाले से उनका कोई मतलब नहीं। यह सब विरोधियों की साजिश है, एक ईमानदार सरकार को खुलेआम बदनाम करने की। इस बाबत उन्होंने एक बड़े न्यूज चैनल के खिलाफ भारी-भरकम विज्ञापन भी छपवा दिया है। मगर इससे क्या होता है? एक दफा घोटाले की फेहरिस्त में नाम दर्ज हो गया तो फिर हो ही गया। प्याज घोटाले का यह तमगा अब ईमानदार सरकार के माथे पर चिपका ही रहना है।

बड़े कहते थे कि हम अलग तरह की राजनीति करने वाले लोग हैं। जन-आंदोलन से उपजे हैं। केवल जनता की बात करते हैं। हमारा उद्देश्य भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना है। दरअसल, राजनीति के मैदान में खड़े होकर ऊंचे-ऊंचे जुमले बनाने में कुछ नहीं जाता है। कोई 'काला धन' पर जुमले बनाता है तो कोई 'भ्रष्टाचार' पर। जुमलों का कर्ज अंततः चुकाना जनता को ही पड़ता है। पांच साल तलक सरकार और नेता तो घोटालों में व्यस्त हो जाते हैं। बाद में सफाई चाहे जो दे लो, सेहत पर फर्क केवल जनता के ही पड़ना है।

वैसे, ईमानदार सरकार को प्याज घोटाले पर इत्ता 'बुरा' नहीं मानना चाहिए। घोटाले तो सत्ता, सरकार, राजनीति, नेता की 'बपौती' होते हैं। भला इनसे कैसा बैर? राजनीति में आएं और घोटाले का दाग न लगे, भला ऐसे भी कोई सरकार चला करती है? घोटाले सरकार और नेता को 'अमिट पहचान' दिलाते हैं।

आप हैं कि एक ही घोटाले पर इत्ता परेशान हो लिए। यहां तो इत्ती सरकारें आईं और चली गईं किस्म-किस्त के घोटालों के तमाम 'इल्जाम' लगे। नेता-मंत्री तक जेल की सैर कर आए। लेकिन मजाल है, जो किसी नेता या सरकार के माथे पर, घोटाले को, लेकर बल भी पड़े हों। वो घोटाले करते रहे। सजा-सुनवाई होती रही। जनता इत्मिनान से मनोरंजन करती रही। दो-चार दिन कोस-कास के मीडिया वाले भी चुप बैठ जाते हैं।

अब तलक हुए तमाम घोटालों के बीच प्याज घोटाला एकदम मस्त घोटाला है। ऐसा घोटाला न पहले कभी हुआ, न आगे होने की संभावना ही है। क्योंकि सरकार दाल-गेहूं-चावल से तो पंगा ले सकती है किंतु प्याज से नहीं। प्याज से पंगा लेने का मतलब है, आंसूओं के साथ रोना। जब भी प्याज के दाम बढ़े हैं, इसने बड़ी से बड़ी सरकारों को खूब रूलाया है।

कथित ईमानदार सरकार के लिए प्याज घोटाला पहला एक्सपीरियंस है। उन्हें इस पहले एक्सपीरियंस को एंज्वॉय करना चाहिए नाकि इस-उस के खिलाफ विज्ञापन छपवाना। घोटाले से सरकार या नेता की छवि 'बदनाम' नहीं बल्कि 'नामदार' बनती है। वो कहावत है न कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा।

ईमनदार सरकार के पास यही मौका है, अपने नाम को प्याज घोटाले के बहाने चमकाने का।

सोमवार, 28 सितंबर 2015

फेसबुक और डिसलाइक

फेसबुक पर किस्म-किस्म के 'फसाद' होते रहना कोई नई बात नहीं। हर रोज, हर क्षण कोई न कोई किसी न किसी से किसी न किसी बात पर मुंह फुलाए बैठ ही रहता है। कभी-कभी तो बात इत्ती बढ़ जाती है कि फेसबुक की दीवार से बाहर देख लेने तक की नौबत आ जाती है। जिनमें ऐसे फसादों को झेलने की कुव्वत होती है, वे फेसबुक पर ठसक के साथ जमे रहते हैं। जिनमें नहीं होती, वे तुरंत कट लेते हैं।

दरअसल, फेसबुकवीरों को असहमति को सुनना कतई बर्दाशत नहीं। आप उनकी कही-लिखी बात को काट नहीं सकते। अगर काटेंगे तो भुगतेंगे। उनकी बस एक ही तमन्ना रहती है कि आप उनकी पोस्ट को 'लाइक' पर 'लाइक' करते चले जाएं। जो पसंद न भी आ रही हो, उसे भी लाइक मारें। कुछ फेसबुकवीर तो ऐसे भी हैं, जो सीधा इन-बॉक्स में आकर बंदे-बंदी से कहते हैं कि हमारी फलां-फलां पोस्ट को अपने लाइक से नवाजें।

लाइक न हुआ बंगाली रसोगुल्ला हो गया। जब तलक मुंह में नहीं चला जाता, मिठास का अहसास ही नहीं होता। कभी-कभी तो महसूस होता है कि फेसबुक पर अगर लाइक का बटन न होता, तो न जाने कित्ते फेसबुकवीर इसकी दीवार से अपना सिर-सिर पट-पटकर जाने दे देते। मानो, सारी कायनात की खुशी एक लाइक पर ही टिकी हो!

इधर, सुनने में आया है कि फेसबुक के मुखिया मार्क जुकरबर्ग फेसबुक पर 'डिसलाइक' का ऑप्शन चिपकाने वाले हैं। मतलब, अगर किसी की पोस्ट या फोटू आपको पसंद न आए या किसी से असहमति जतलानी हो तो खट्ट से डिसलाइक दबा दें। वो तो सब ठीक है पियारे लेकिन मुझे यह डिसलाइक का ऑप्शन एक नए फसाद की जड़ सरीखा एहसास दे रहा है। यों, फेसबुक पर विवाद-फसाद पहले ही क्या कम थे, जो अब एक नया हथियार दे दिया जाएगा लड़ने-भिड़ने को।

यहां तो एक जरा से लाइक न करने पर लोग इन-बॉक्स में घुसे चले आते हैं। कहीं अगर पोस्ट या फोटू को डिसलाइक कर दिया तो सीधा घर में ही न घुसे चले आएं! मार्क जुकरबर्ग समझ नहीं रहे पर इस डिसलाइक के भीषण खतरे हैं। जरा कल्पना कीजिए, यह डिस्लाइक अगर कहीं पत्नी की पोस्ट या फोटू पर ही दब गया, फिर बिचारे पति के हाल को बेहाल होने में देर ही कित्ती लगनी है। न जाने कित्ते ही तलाक केवल डिसलाइक के कारण ही हो लेंगे। डिसलाइक का यह ऑप्शन बैठे-ठाले रायता फैलाने का जरिया बन जाएगा।

वैसे, डिस्लाइक की स्थिति न सिर्फ सोशल प्लेटफॉर्म बल्कि समाज में भी काफी 'दयनीय' है। हालत यह है कि कोई किसी के भी डिसलाइक को सहन नहीं करना चाहता। हर कोई केवल लाइक पर मरता है। लाइक करते रहें और समाने वाले की प्रशंसा के पात्र बने रहें। मनुष्य अब सामाजिक नहीं बल्कि लाइक-ओरिएंटिड प्राणी बनकर रह गया है। अब तो लोग लाइक खरीदने की हैसियत भी रखने लगे हैं।

ऐसे में फेसबुक पर डिसलाइक का ऑप्शन आपस में दंगल करवाने वाला कदम ही कहा जाएगा। जो लोग फेसबुक पर डिसलाइक के ऑप्शन पर बल्लियों उछल रहे हैं, वे शायद नहीं जानते, इस हथियार का इस्तेमाल उनके खिलाफ भी हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा जरूरी है, इस पंगेबाज (डिसलाइक) के ऑप्शन को साधना।

मार्क जुकरबर्ग से मेरी गुजारिश है कि डिसलाइक के इस ऑप्शन पर वे पुनः विचार करें। डिसलाइक को इत्ता हलके में न लें कि आगे चलकर कहीं अंगूठा ही काटने की नौबत न आ जाए!

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

फेसबुक, डिसलाइक और कलेस

पियारे, जमाना 'लाइक' का है। फेसबुक से लेकर निजी जिंदगी तक में रिश्ते-नाते एवं दोस्तियां अब 'लाइक' के दम पर ही तय हो रही हैं। यहां जिसके लाइक में दम होता है, वही बाजी मार ले जाता है। जो लाइक से ज्यादा कमेंट में विश्वास रखता है, उसे 'प्रतिक्रियावादी' कहकर पीछे धकेल दिया जाता है। जी हां, यही सोशल नेटवर्किंग का रूल भी है और दस्तूर भी। और, हमें एडजस्ट भी इसी के साथ करना है।

लेकिन, जब से फेसबुक पर 'डिसलाइक' का विकल्प आने की खबर आम हुई है, तमाम लोगों के साथ-साथ मेरी 'बेचैनियां' भी काफी बढ़ गई हैं। डिसलाइक का साफ-सीधा सा मतलब है, फेसबुक पर 'कलेस' का एक नया मैदान तैयार होना। फिर तो हर दिन किसी न किसी बात पर डिसलाइक को लेकर फेसबुकवीरों में आपस में कलेसबाजी और लठ्ठम-लठ्ठ हुआ करेगी। खुल्लम-खुल्ला प्रश्न पूछे जाएंगे- तूने मेरी पोस्ट या फोटू को डिसलाइक क्यों किया? तेरी इत्ती हिम्मत मेरी पोस्ट को डिसलाइक करने की? अल्लम-बल्लम...।

यों भी, फेसबुक पर पंगे-फसाद क्या कम होते हैं, जो डिसलाइक का उस्तरा भी बंदर के हाथ में थमा दिया जाएगा। मेरी तो यह सोच-सोचकर ही सिट्टी-पिट्टी गुम हुए जा रही है कि डिसलाइक के कलेस को झेला कैसे जाएगा? किसी ने अगर मेरी ही पोस्ट को डिसलाइक कर दिया, फिर मेरा रिएक्शन क्या होगा? यहां तो आलम यह है कि किसी साधारण-सी पोस्ट पर भी अगर लाइक न ठोको तो बंदा सीधा इन-बॉक्स में घुसा चला आता है, यह कहने कि भइया, मेरी पोस्ट पर लाइक तो दे दो। और, कुछ तो इत्ता विकट मुंह फुलाकर बैठ जाते हैं, अगर बिना लाइक मारे उनकी पोस्ट के रास्ते से गुजर भी जाओ तो। इतिहास गवाह है कि यहां लाइक न मारने के चक्कर में न जाने कित्ती ही दोस्तियां टूट-बिखर चुकी हैं।

सौ बातों की एक बात है पियारे, अगर फेसबुक पर रहना है तो लाइक का साथ हर हाल में निभाना ही होगा। बिना लाइक के यहां यारी-दोस्ती की गाड़ी न चलने वाली। अगर आप लाइक के साथ बने हुए हैं तो संबंध सबसे मधुर रखे हुए हैं। डिसलाइक का विकल्प तो केवल कलेसबाजी के लिए ही होगा।

तिस पर भी जो कथित फेसबुकवीर डिसलाइक के विकल्प को लेकर खुश हैं, उनसे मुझे केवल इत्ता ही कहना है कि ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि डिसलाइक का दांव कभी आप पर भी उल्टा पड़ सकता है। यह फेसबुक है मेरी जान। यहां कभी भी, कुछ भी, किसी के साथ हो सकता है। फिर क्या करोगो- बोलो...? न न यह 'भ्रम' दिमाग से कतई निकाल देना कि डिसलाइक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सरीखा विकल्प होगा। फेसबुक पर सारी स्वतंत्रताएं लाइक से शुरू होकर लाइक पर ही खत्म होती हैं। बिन लाइक भला यहां कैसा मनोरंजन और कैसे दोस्त-दोस्तियां।

डिसलाइक के 'दुष्परिणाम' अगर देखने ही हैं न तो एक दफा अपनी बीवी की पोस्ट या फोटू को डिसलाइक करके देख लीजिए। सेकेंडभर में सब मालूम चल जाएगा- डिसलाइक करने का 'आत्मघाती परिणाम' क्या होता है! फिर डिसलाइक पर आपका कोई स्पष्टीकरण नहीं चल पाएगा, सीधी सजा ही सुनाई जाएगी। तो बोलिए क्या हैं, ऐसे आत्मघाती डिसलाइक को झेलने के लिए तैयार?

पियारे जुकरबर्ग, मेरी मानो तो एक दफा फिर से पुर्नविचार कर लो डिसलाइक के विकल्प पर। फेसबुक की दुनिया लाइक के दम पर ही मस्त और बिंदास चल रही है। इसे यों ही चलते रहने दो। काहे को डिसलाइक के विकल्प को बीच में लाकर इसे 'बदरंग' करने पर तुले हो पियारे।

कहीं ऐसा न हो, आगे चलकर डिसलाइक शुद्ध कलेस का माध्यम बन जाए। और हम फेसबुकिए किसी नए कलेस में उलझकर रह जाएं। डिसलाइक जैसे 'आत्मघाती विकल्प' से किसी भी सूरत में बच पाना लगभग 'नामुमकिन' है पियारे जुकरबर्ग।

सोमवार, 21 सितंबर 2015

डेंगू का कहर

इंसान का इंसान के प्रति डर खत्म हुए बरसों हुए। अब इंसान को भगवान का भी डर न रहा। जिन्हें भगवान का जरा-बहुत डर सताता भी है, तो वे उसे जप-तप के बहाने बहला लेते हैं। और, भगवान मान भी जाता है। समय और बदलते परिवेश के साथ भगवान ने खुद को भी बदल डाला है।

मगर, एक प्राणी से इंसान इन दिनों बहुत डरा-सहमा हुआ है। उस प्राणी ने इंसान की नाक में दम कर रखा है। न जागते चैन लेने दे रहा है, न सोते। ऊपर से खरचा तो करवा ही रहा है, साथ-साथ ऊपर का टिकट भी कटवा दे रहा है।

दरअसल, यह प्राणी कोई और नहीं एक साधारण-सा मच्छर है, वो भी डेंगू का मच्छर। डेंगू के डर के मारे क्या इंसान, क्या शैतान, क्या अमीर, क्या गरीब, क्या भक्त, क्या संत सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम है। डेंगू के मच्छर के डंक ने ऐसा कहर बरपाया है कि हर रोज दो-चार के निपटने की खबरें आ ही जाती हैं।

हालांकि डॉक्टर लोग डेंगू से बचने के उपाय निरंतर बतला रहे हैं लेकिन बचाव फिर भी नहीं हो पा रहा। गंदगी डेंगू के मच्छर को भी पसंद है और हमें भी। तो फिर बचाव हो तो कैसे? अब तो भीड़ में जाते, लोगों से मेल-मुलाकात करते हुए भी डर-सा लगता है। क्या पता डेंगू का डंक कहीं हमला न बोल दे।

डेंगू के मच्छर का लार्वा इंसान से भी कहीं ज्यादा 'ढीठ' है। तगड़े से तगड़े कीटनाशक का उस पर कोई असर नहीं होता। चाहे क्वॉइल जला लो या हिट छिड़क लो मगर डेंगू का मच्छर न मरता है न ही दूर भागता। और, कब में आकर डंक मारकर भाग लेता है, यह भी पता नहीं चल पाता। ससुरा डंक भी ऐसा मारता है अगर समय पर डाइग्नोस न हो तो अगला खर्च ही हो ले।

कहिए कुछ भी मगर डेंगू के मच्छर ने इंसान की सारी की सारी 'हेकड़ी' निकालकर उसके हाथ में रख दी है। अपने ही घर में डेंगू के मच्छर से ऐसा डरा-डरा घुमता है मानो कोई भूत-प्रेत हो। मजबूरी है, डेंगू के मच्छर को डांट-फटकार भी तो नहीं सकता। मच्छर का क्या भरोसा कब में बुरा मान पीछे से डंक भोंक दे। और, काम तमाम कर जाए।

कोशिशें तो खूब की जा रही हैं, डेंगू के डंक से निपटने की पर मुझे नहीं लगता डेंगू से निपटता इत्ता आसान होगा। आखिर पी तो वो इंसान का खून ही रहा है न। अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि इंसान के खून में कित्ता जहर घुला हुआ है। एक साधारण से मच्छर ने इंसान को चारों खाने चित्त कर दिया है। बताइए, इत्ता बड़ा इंसान पिद्दी भरे मच्छर से पनाह मांग रहा है।

मैं तो चाहता हूं, इंसान को डेंगू का डर हमेशा बना रहे। किसी से नहीं डरता, इस बहाने, मच्छर से तो डरेगा ही। डर बहुत जरूर है, चाहे मच्छर का हो या बिच्छू का। डंक लगने के बाद तो डर और भी मारक हो जाता है। फिर बंदा न घर का रह पाता है न घाट का।

डेंगू के मच्छर का कहर बरपाना इसे ही तो कहते हैं।

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

करते रहिए हवाबाजी

हवाबाजी बहुत उम्दा शगल है। हवाबाजी करना हर किसी के बस की बात नहीं। हवाबाजी करने वाले हवाओं के रूख तक को मोड़ने की ताकत रखते हैं। कुछ हवाबाज तो मैंने ऐसे भी देखे-सुने हैं, जिनकी अपनी निजी हवाएं हैं। जब मन चाहा कोई-सी भी हवा उड़ा ली।

ऐसा नहीं है कि हवाबाज केवल राजनीति में ही हैं, साहित्य में भी हैं, कला में भी और समाज में भी। लेकिन हवाबाजी करने में सबकी अपनी-अपनी 'प्राथमिकताएं' तय हैं। इन सब में सबसे अधिक जोर और शोर राजनीति के हवाबाजों का ही रहता है। दरअसल, न राजनीति और न राजनेता बिना हवाबाजी के चल ही नहीं सकते।

हां, यह सच है कि हवाबाज दहाड़ें बहुत ऊंची-ऊंची मारता है। जब बोलने पर आता है, तो बोलता ही चला जाता है। किसी दूसरे को बोलने का मौका ही नहीं देता। बोलते-बोलते हवा में पतंग इत्ती ऊंची उड़ा लेता है कि उतार ही नहीं पाता। जब उतार नहीं पाता तो हवा को नहीं पतंग को दोष देकर आगे बढ़ जाता है।

सीधी-सी बात यह है कि हवाबाजी करने में सिर्फ जुबान ही खर्च हुआ करती है, पैसा नहीं। यों भी, हमारे देश के नेता लोग जुबानी जमा-खर्च के मामले में सबसे आगे रहते हैं। हवाबाजी के साथ-साथ जुमलेबाजी भी तो जुबानी खर्च ही है न। फर्क बस इत्ता है कि जुमालेबाजी का हिसाब देना पड़ता है किंतु हवाबाजी का कोई हिसाब ही नहीं बनता। भला बहती हवा का हिसाब कौन रख पाया है आज तलक।

हवाबाजी, हावालाबाजी और जुमलेबाजी पर हो रही बहसों को देखना व सुनना मुझे अच्छा लगता है। राजनीति में मनोरंजन इन्हीं बाजियों के दम ही तो कायम है। ऐसी राजनीति और ऐसे चुनाव भला किस काम के जिसमें हवाबाजी के साथ-साथ जुमलेबाजियां न हों। अब आप इसे देश के नेताओं की 'अभद्र भाषा' कहकर 'दुत्कारिएगा' नहीं। यह तो राजनीति और नेताओं की 'भाषा शैली' में आया एक नए किस्म का बदलाव है। इस बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए।

हवाबाजी और हवाबाजों को अपनी 'प्रेरणा' मानकर मैंने भी इसे अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग बना लिया है। अब तो मैं पत्नी और रिश्तेदारों से भी केवल हवाबाजी में ही बातें किया करता हूं। हवाबाजी में यही तो स्वतंत्रता है कि जब जित्ता चाहो, उत्ता छोड़ते चले जाओ। न कोई रोकने वाला है, न टोकने वाला।

मेरे विचार में हवाबाजी ऑल-टाइम हिट फंडा है। हममें से हर किसी को इसे अपनाना चाहिए। हवाबाजी को केवल राजनीति तक ही नहीं, हमें अपने निजी एवं सामाजिक जीवन में भी इसका सद्पयोग करना चाहिए। जित्ती हवाबाजी करेंगे, उत्ता ही सम्मान पाएंगे। तो फिर करते रहिए हवाबाजी।

सोमवार, 14 सितंबर 2015

लेखन में आरक्षण

मुझे लेखन में 'आरक्षण' चाहिए! न न चौंकिए नहीं। वाकई मुझे लेखन में ही आरक्षण चाहिए। जब दुनिया भर की चीजों में आरक्षण बंदर-बांट की तरह बंट सकता है, तो मेरी लेखन में आरक्षण की मांग क्यों अनुचित है? बल्कि मैं तो कहता हूं, लेखन के साथ-साथ कागज-कलम-दवात तक में हमें आरक्षण की मांग करनी चाहिए। आरक्षण ही हमारे तईं एकमात्र ऐसा औजार है, जिसके दम पर न केवल हम अपनी जाति, अपने समाज बल्कि देश तक को इसका 'राजनीतिक' एवं 'चुनावी गुलाम' बना सकते हैं।

बहुत संभव है, मेरी लेखन में आरक्षण की मांग को सुनकर बहुतों के पेटों में मरोड़ें उठने लगी होंगी। कुछ ने तो मुझे मन ही मन गरिया भी डाला होगा। और कुछ लगे होंगे मुझे लेखन बिरादरी से ही बहिष्कृत करने-करवाने की जुगाड़ में। मगर उससे होता क्या है पियारे? इस डर से क्या मैं अपनी मांग से पीछे हट जाऊंगा? न जी न बिल्कुल नहीं। ऐसे कथित डरों को मैं अपने ठेंगे पर रखता हूं।

जब हार्दिक महाशय अपनी मांग से पीछे नहीं हटे, केवल आरक्षण के मुद्दे पर ही उन्होंने इत्ती बड़ी भीड़ जुटा ली। एक राज्य को आग के हवाले करवा दिया। तो फिर भला मैं ही क्यों पीछे हटूं? हां, इस बात से आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए कि मैं हार्दिक जैसा कुछ करूंगा। न न मैं ऐसा कुछ भी ऊट-पटांग करने नहीं जा रहा। बस अपनी मांग पर कायम हूं। लेखन में आरक्षण से कम मुझे कुछ मंजूर नहीं।

आरक्षण की 'मलाई' बहुत 'स्वादिष्ट' होती है। एक दफा जो चख लेता है, फिर जीवन भर उसे छोड़ना नहीं चाहता। केवल आरक्षण के दम पर ही न जाने कित्ते सुविधाओं की नैया पार कर गए हैं। ठीक ऐसा ही मैं भी करना चाहता हूं। मुझे तो बेहद 'हैरानी' है कि आज तलक कभी किसी लेखक ने लेखन में आरक्षण की मांग क्यों नहीं की? क्यों लेखकों ने लेखन में आरक्षण को लेकर सरकारों-मंत्रियों-नेताओं को नहीं चेताया? लेखक को अगर लेखन में आरक्षण मिलने लग जाए फिर तो उसके सदियों पुराने दलिद्दर को दूर होने में जरा भी समय नहीं लगेगा। राजा बन जाए लेखक राजा।

मैं तो कहता हूं, अभी मौका है, चोट सीधी चोट कर ही देनी चाहिए। आरक्षण पर जहां इत्ती जूतम-पैजार मची है, एक और सही। यों भी, हमारे कने बहुत समय है, ऐसी बहसों-विवादों में पड़कर अपना टाइम खोटी करने के लिए।

लेखन में आरक्षण की मांग को लेकर मैं बहुत ही जल्द जंतर-मंतर पर 'धरना' देने का प्लान बना रहा हूं, अगर कोई लेखक मेरे साथ आना चाहे तो उसका स्वागत है। नहीं तो मैं ये लड़ाई अकेले दम ही लड़ूंगा। आरक्षण का सवाल है भाई। जब सब मिलकर आरक्षण का लड्डू गटकने में लगे हैं तो फिर मैं ही क्यों लल्लू बना रहूं। लेखन में आरक्षण को लेकर 'मेरा संघर्ष' अंत तक जारी रहेगा। आरक्षण जिंदाबाद।

खोपड़ी पर प्रेशर

अपनी खोपड़ी पर मैं उत्ता ही प्रेशर डालता हूं, जित्ता वो सह सके। खोपड़ी पर 'अतिरिक्त प्रेशर' डालने का मुझे शौक है, आदत। मैं अपनी खोपड़ी के स्वभाव को अच्छी तरह से जानता हूं। जैसे ही इस पर अतिरिक्त प्रेशर पड़ना शुरू होता है, यह घोड़ी के माफिक 'बिदक' जाती है। फिर इत्ती आसानी से काबू में नहीं आती।

लेकिन इस दफा मैंने खुद ही अपनी खोपड़ी पर कुल्हाड़ी मार ली है। मैंने अपनी एकमात्र खोपड़ी पर शीना बोरा मर्डर मिस्ट्री को समझने का 'प्रेशर' डाला है। मैं जानता हूं, इस चर्चित मर्डर मिस्ट्री को समझने का काम मेरा नहीं पुलिस का है, जिसे वो कर भी रही है। फिर भी, मैंने सोचा थोड़ा अपनी खोपड़ी पर भी प्रेशर डालके देखा जाए, शायद कुछ समझ में सके। पूरी मिस्ट्री का समझ में आना तो दूर की बात रही, अभी तो यही समझ नहीं पाया है कि इंद्राणी के पति कित्ते थे और असली वाले मां-बाप कित्ते। मिस्ट्री में इत्ता विकट घाल-मेल मचा हुआ है कि अच्छे-अच्छे दिमागदार के दिमाग का दही हो रखा है।

मेरा तो इंद्राणी की दिमागी-शक्ति को सलाम ठोकने का मन करता है। वल्लाह क्या धांसू दिमाग पाया है बंदी है। केवल पुलिस बल्कि परिवार के पारिवारिक ताने-बाने को भी खूब गच्चा दिया है। इत्ते सब पर भी बंदी के चेहरे पर पछतावे मात्र की 'शिकन' नहीं है। हर रोज एक नए खुलासे का इजहार पुलिस से कर देती है। बिचारी पुलिस को इत्ता व्यस्त कर रखा है कि कभी वो पति को पकड़ती है, कभी बेटे को, कभी बेटी को। फिर भी, तमाम राज ऐसे हैं, जिनका पर्दाफाश होना बाकी है।

अब इत्ते पेचों वाली मिस्ट्री का प्रेशर जब मैं अपनी खोपड़ी पर डालूंगा तो उसकी टें बोलना निश्चित है। आखिर खोपड़ी ही तो है, कोई रोबोट थोड़े है कि चुटकियों में समाधान हो गया।

समय के साथ इंसान भी कित्ता एडवांस हो लिया है, रिश्ता चाहे कैसा भी हो, उसकी वाट लगाने में कभी पीछे नहीं हटता। दिमाग का इस्तेमाल संबंधों को मधुर बनाने से कहीं ज्यादा, सामने वाले की ऐसी-तैसी करने में करता है। इंद्राणी ने तो अपना सारा दिमाग किसको कब, कहां, कैसे मारना-मरवाना है में ही जाया कर डाला। सही है, इंसान जब खुद से और दिमाग से उक्ता जाता है, तब शायद ऐसा ही किया करता है।

कहिए कुछ भी पर इस केस को समझना उत्ता ही मुश्किल काम है, जित्ता नेता के 'मन की बात' को समझना कि भीतर क्या चल रहा है।


बहरहाल, मैं तो अपनी खोपड़ी पर बने प्रेशर को इस मामले से हटा रहा हूं। इस केस को समझना मेरे बस की बात है, मेरी खोपड़ी के। खोपड़ी जित्ता स्वतंत्र रहे, उत्ता ही अच्छा। कहीं ज्यादा बुरा मान गई तो लेने के देने पड़ जाएं। मुझे मेरी खोपड़ी सबसे ज्यादा प्रिय है।