बुधवार, 5 अगस्त 2015

स्मार्टनेस का जलवा

स्मार्ट सिटी, स्मार्ट फोन, स्मार्ट वॉच, स्मार्ट फ्रिज, स्मार्ट गजेट्स और भी न जाने क्या-क्या स्मार्ट। कोई भी अब स्मार्ट से नीचे बात ही करना नहीं चाहता। आलम यह है कि बंदे का 'मेंटल लेवल' भले ही स्मार्ट न हो पर फोन स्मार्ट होना चाहिए। स्मार्टफोन की एप्स स्मार्ट होनी चाहिए। स्मार्टफोन में बेलैंस भले ही बीस रुपए न हो पर कवर स्मार्ट होना चाहिए। ताकि लोगों को लगे कि बंदा कित्ता 'स्मार्ट' है।

समाज में अब सबकुछ 'स्मार्टनेस' के दम पर ही तय होने लगा है। न न मैं उस स्मार्टनेस की बात नहीं कर रहा, जिसका संबंध मेंटल लेवल से होता है। मैं उस स्मार्टनेस की बात कर रहा हूं, जिसमें स्मार्टनेस बतौर दिखावा, बतौर शोशा प्रस्तुत की जाती है। बंदे की बाइक और बालों का स्टाइल देखकर ही पता चलता है कि स्मार्टनेस कैसे परवान चढ़ती है।

स्मार्टनेस के साथ अगर अंगरेजी का तड़का न लगे तो बेकार है। बंदा अपनी स्मार्टनेस का लेवल, अंगरेजी बोलकर ही जतलाता है। अगर अंगरेजी सही से बोलनी नहीं भी आती तो फिकर नहीं, एप्स हैं न। एप्स के दम पर आप अंगरेजी तो छोड़िए, जापानी भी बिंदास बोल सकते हैं। एप्स हर समस्या का एक मात्र स्मार्ट हल हैं। कुछ पूछने के लिए बंदा अब गुरु कने नहीं सीधा एप्स या गूगल की शरण में जाता है। यही तो स्मार्टनेस का जलवा है पियारे।

अब तो सुनने में यह भी आ रहा है कि स्मार्टनेस की तर्ज पर ही स्मार्ट सिटी बनाई जाएंगी। आजकल स्मार्ट सिटी का भूत लोगों के दिलो-दिमाग पर इस कदर तारी है कि जब दो जन कहीं मिलते हैं, तब एक-दूसरे का हाल बाद में लेते हैं, पहले बात स्मार्ट सिटी की होती है। क्रीम-पॉडर लगाकर सिटियों को स्मार्ट करा जरूर जा रहा है पर अंदर का हाल अब भी बेहाल ही है। ट्रैफिक और अतिक्रमरण स्मार्ट सिटी के कॉस्पेट पर पलीता लगाने के लिए काफी हैं। उस पर बेफिक्र होकर घुमतीं गाय-भैंसें-कुत्ते सोने पर सुहागा। इत्ते पर भी बंदा दीवारों पर पान की पीक खुद को स्मार्ट समझकर ही मारता है। सड़क किनारे दीवार को गीला करने में भी अपनी स्मार्टनेस समझता है।

चूंकि जिद पाली हुई है कि स्मार्ट होकर ही रहना है तो फिर सरकार से लेकर अफसर तक लगे हैं, सिटी के ज्यूग्राफिये को स्मार्ट करने में।

स्मार्ट होने-बनने की कोशिश मैं भी कई दफा कर चुका हूं पर हर दफा 'फेल' ही हुआ हूं। स्मार्टफोन ले जरूर लिया है पर टच-स्क्रीन मुझे इत्ता 'आतंकित' किए रहती है कि अंगुलियां अक्सर गलत नंबर पर ही टच हो जाती हैं। इत्ते एप्स हैं पर अभी तलक मुझे ऐसी कोई एप न मिली है, जो मेरी दिमागी-बेवकूफियों को दूर भगा सके। सिर्फ इन्हीं बेवकूफियों की वजह से ही तो मैं स्मार्ट नहीं हो पा रहा।

जिंदगी स्मार्ट होने के चक्कर में इत्ती उलझ कर रह गई है कि यही समझ नहीं आता, स्मार्ट कित्ता होएं और कित्ता छोड़ दें। अब तो प्रधानमंत्रीजी भी स्मार्ट और डिजिटल होने पर लगातार जोर दे रहे हैं।

स्मार्ट होने की जिद के चलते कुछ दिनों बाद हो यह जाएगा कि समाज-परिवार में केवल वही बचेंगे, जो कथित तौर पर स्मार्ट हैं। जो स्मार्ट नहीं हैं, वे 'विलुप्त' हो जाएंगे। क्लियर है, अब हमें स्मार्ट बनने के लिए ही स्मार्ट होना है। 

कोई टिप्पणी नहीं: