गुरुवार, 20 अगस्त 2015

शिकायतों के बहाने

कुछ लोगों को शिकायत है कि देश में कुछ भी 'अच्छा' नहीं चल रहा है। हर तरफ गड़बड़ ही गड़बड़ है। न सरकार अच्छे से काम कर रही है, न नेता अच्छे से वादे पूरे कर रहे हैं, न सांसद अच्छे से संसद चलने दे रहे हैं, न व्यवस्था में अच्छापन आ पाया है, न समाज अच्छा व्यवहार कर रहा है, न साहित्य में कुछ अच्छा आ पा रहा है। उनकी शिकायतों का ग्राफ इस कदर बढ़ गया है कि उन्हें अब अपने भीतर भी कुछ अच्छा नहीं लगता। हर वक्त, हर किसी से, हर कहीं की शिकायतें करते-करते वे 'शिकायतीलाल' बन गए हैं।

दरअसल, समाज में होते हैं कुछ ऐसे लोग भी जिनका मन चौबीस घंटे शिकायतें करने और शिकायतें सुनने में ही लगा रहता है। 'बाल की खाल' निकालना उनकी 'आदत' होती है। देश, समाज, व्यवस्था, राजनीति, साहित्य में अगर कुछ अच्छा हो भी रहा हो, तो भी उनको दिखाई नहीं देता। उन्हें केवल शिकायतें ही नजर आती हैं। तरह-तरह की शिकायतें कर-करके ही वे अपना पेट भरते रहते हैं। मैंने देखा है, जिस दिन शिकायतीलाल को शिकायत करने का मौका न मिले- न चैन से सो पाते हैं, न ढंग से कुछ खा पाते। माथे पर बल डाले और चेहरे पर बारह बजाए, यों दिखते हैं, मानो अभी शमशान भूमि से लौटकर आए हों।

ऐसा नहीं कि शिकायतीलाल को शिकायतें केवल बाहर ही नजर आती हों, अपना घर भी उन्हें शिकायतों का पुलिंदा ही लगता है। घर के काम से शिकायतें। बीवी-बच्चों, नाते-रिश्तेदारों से शिकायतें। कामवाली से लेकर प्रेसवाले तक से तो उन्हें शिकायत रहती है कि कोई भी काम अच्छे से नहीं कर रहा। अच्छापन उनके दिलो-दिमाग में इस कदर बैठ चुका होता है कि हर समय अच्छे-अच्छे की खुमारी में ही डूबे रहते हैं। जैसे- बीजेपी वाले अच्छे दिन की खुमारी में डूबे हैं। अच्छे दिन लाने के चक्कर में ज्यादातर बातें जुमाला-प्रधान ही हो रही हैं। रही-सही कसर सरकार के मंत्रीगण अपने कथित अच्छे-अच्छे बयानों से पूरी कर दे रहे हैं।

अच्छी बातों या अच्छे दिनों में कोई बुराई नहीं। बुराई केवल 'हवाबाजी' करने में है। हवाबाजी से न शिकायतें दूर हो सकती हैं, न अच्छे दिन आ सकते हैं। कूढ़न में चाहे जित्ता दिल को जला लीजिए।

गजब यह है कि हर वक्त शिकायतें करने वाले शिकायतीलाल खुद कभी कुछ नहीं करते। न उनकी भूमिका समाज में कुछ होती है, न अपने परिवार में। किसकी टांग कैसे और कहां से खींची जा सकती है, बस ध्यान उनका उसी में लगा रहता है। नकारात्मकता की डोज इत्ती ज्यादा ले लेते हैं कि हर वक्त उन्हें हर कहीं काला ही काला नजर आता है। नकारात्मकता अपने आप में सबसे बड़ा जहर है। जिसने इसे पी लिया, समझ लीजिए वो गया काम से। लगभग यही स्थिति शिकायतीलालों है।

नहीं मानो तो देश, समाज, व्यवस्था में कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा और मानो तो सबकुछ अच्छा ही चल रहा है। सब अपने-अपने देखने का नजरिया है। चीजें कभी रात भर में दुरुस्त नहीं हो सकतीं। टाइम लगता है, चीजों को दुरुस्त होने में।

इत्ते बड़े देश को चलाना कोई हंसी-खले नहीं है। टांके ढीले हो जाते हैं, सबको संग-साथ लेकर चलने में। एकाध भी अगर बिगड़ गया, फिर उसे संभालना बड़ा मुश्किल हो जाता है। माना कि लाख खामियां हैं राजनीति, नेता, व्यवस्था में, फिर भी, रहना तो हमें उनके बीच ही है। एकदम से सबको 'खारिज' कर देने का मतलब है कि हमारा विश्वास केवल नकारात्मकता में है, सकारात्मकता में नहीं। शिकायत का क्या है, किसी से भी कर लो। खुली छूट है। मगर शिकायत को सुलटाने में पसीने छूट जाते हैं।

कह कुछ भी लीजिए पर जिन्हें शिकायत करनी है, करेंगे। क्योंकि अगर वो शिकायत नहीं करेंगे तो उनकी रोटी हजम नहीं होगी। जब रोटी हजम नहीं होगी तो हाजमोलावालों की दुकानदारी का क्या होगा? दुकान का चलना जरूरी है, चाहे जैसे चले।

शिकातीलालों की शिकायतों पर ज्यादा ध्यान न देकर, केवल उन्हें एंज्वॉय करें। इसी में भलाई है।

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