मंगलवार, 11 अगस्त 2015

राधे मां का जलवा

मैं हर उस तर्क का खंडन करता हूं, जो यह कहता है कि देवी राधे मां ने जनता (या भक्तों) को 'मूर्ख' बनाया है। न जी न कतई मूर्ख नहीं बनाया है। बल्कि भक्तों की मूर्खता को अपने 'चमत्कारिक प्रताप' से 'बल' दिया है। बताया है कि हे! भक्तों धर्म, आस्था, अंध-भक्ति, अंध-विश्वास की आड़ में तुम्हें कभी भी, कैसे भी, कोई भी 'मूर्ख' बना सकता है। और तुम मूर्ख बनने के लिए एक बार नहीं बल्कि हजार बार अभिशप्त हो।

काबिले-गौर यह है कि राधे मां के भक्तों में सबसे बड़ी जमात 'पढ़े-लिखों' की ही है। यह वही पढ़ा-लिखा वर्ग है, जो अपनी बुद्धिमत्ता की ढींगे अक्सर यहां-वहां हांकता हुआ मिल जाता है। बेशक इस पढ़े-लिखे वर्ग ने किताबें बहुत सारी पढ़ी होती हैं, क्लास बहुत सारे पास किए होते हैं, डिग्रियां बहुत सारी हासिल की हुई होती हैं किंतु अंध-आस्था के मामले में दिमागी तौर पर निहायत मूर्ख ही होता है। इत्ता पढ़-लिख जाने के बाद भी अपना भाग्य हाथ की लकीरों में और शांति राधे मां या आसाराम टाइप बाबाओं के आश्रमों में जाकर तलाशता है।

चूंकि उसके कने रुपए-पैसे की कहीं कोई कमी नहीं होती इसलिए कथित देवियों और बाबाओं को मुंह मांगी कीमत देने के लिए हमेशा तत्पर रहता है। अभी उससे कह दो किसी जरूरतमंद या गरीब की मदद करनी शांति तो ऐसे पीछे हट जाएगा जैसे कुत्ते को देखकर बिल्ली।

लेकिन पियारे ये राधे मां भी गजब हैं। आजकल हर तरफ राधे मां, राधे मां के ही चर्चे हैं। सोशल मीडिया पर तो राधे मां यों छाई हुई हैं मानो बहुत बड़ी 'सेलिब्रिटी' हों। इधर आईं राधे मां की कुछ 'बिंदास तस्वीरों' को देखकर कतई नहीं लग रहा कि ये देवी टाइप हैं। लग रहा है, देवी के रूप में 'मॉडल' हैं। राधे मां ने तो कथित देवियों की छवि को ही उलट-पुलट के रख दिया। देवी को बिंदास और मॉडल बना दिया है। क्यों न हो, जब दुनिया-समाज-लोग बदल रहे हैं तो क्या देवी-संत-बाबा न बदलेंगे! फैशनेबल या मॉर्डन होने में क्या बुराई है?

राधे मां के जलवे को देखकर अब तो मेरा मन भी करने लगा है कि लेखन-वेखन छोड़-छाड़के उनका 'भक्त' हो जाऊं। इत्तेफाक से पढ़ा-लिखा मैं भी हूं। इत्ते पढ़े-लिखे मूर्खों के बीच अगर एक मैं और मूर्ख हो गया तो क्या फर्क पड़ जाएगा। मैंने तो पढ़-लिख और लेखक बनकर भी देख लिया, बदले में मिलीं क्या सिर्फ 'तारीफें'। लेकिन पियारे पेट सिर्फ तारीफों से नहीं नोट से भरता है। और, दूसरों को मूर्ख बनाकर नोट कमाने में जो मजा है, वो किसी और काम में नहीं। देखिए न राधे मां कल तलक मामूली सिलाई किया करती थीं, घर का खर्च बामुश्किल चल पाता था मगर जब से देवी बनीं नोट कदमों में बिछे रहते हैं। नोट दान करने वालों में सबसे बड़ा वर्ग पढ़े-लिखे लोगों का ही है। अब बताइए कि मूर्ख कौन हुआ पढ़ा-लिखा या बे-पढ़ी-लिखी राधे मां।

जब तलक अंध-भक्ति और अंध-श्रद्धा का बाजार चमकता रहेगा, यहां से न राधे मां कम होने वाली हैं न आसाराम जैसे बाबा। कहने को कहते रहिए कुछ भी पर फर्क कहां और कित्तों पर पड़ना है। जो एक दफा अंध-भक्ति में डूब गया समझो गया काम से। फिर उसके आगे हर वैज्ञानिक और प्रगतिशील तर्क-वितर्क बेकार हैं। राधे मां का बाजार इसलिए फल-फूल रहा है क्योंकि हमने अपने विश्वास को खुद पर न टिका कर देवियों और बाबाओं पर टिका दिया है। इनके दरबारों में जित्ता पैसा फेंकोगे, उत्ता ही तमाशा देखने को मिलेगा।

फिलहाल, आज की हकीकत तो यही है कि राधे मां का जलवा हिट है। चमत्कार को नमस्कार है। जो जित्ता अंध-भक्ति में डूबा है, वो उत्ता ही सुखी है। बाकी तो बातें हैं, बातों का क्या!

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