सोमवार, 3 अगस्त 2015

हाय! मैं सेक्युलर न हुआ

पियारे, पिछले कई दिनों से मैं इस कोशिश में लगा हुआ हूं कि मैं कैसे भी सेक्युलर हो जाऊं! सेक्युलर होकर बड़े-बड़े तथाकथित सेक्युलरों की जमात में शामिल हो जाऊं। जैसे वे लोग हर समय अपने सेक्युलरिजम का झंडा बुलंद किए रहते हैं, मैं भी करता रहा हूं। लेकिन इत्ती कोशिश करने के बाद भी मैं सेक्युलर नहीं हो पा रहा।

आप यकीन नहीं करेंगे, सेक्युलर होने की खातिर मैं अपना हाथ व जन्मपत्री तक ज्योतिषी महाराज को दिखा चुका है। उन्होंने भी मेरे हाथ (भाग्य) में सेक्युलर होने की कोई रेखा नजर नहीं आई। उन्होंने साफ कह दिया कि कम से कम इस जन्म में तो मैं सेक्युलर नहीं ही हो सकता।

खुद के सेक्युलर न होने पर निराशा से कहीं ज्यादा मुझे शर्मिंदगी महसूस होती है। मन करता है, कहीं रेत में जाकर अपनी गर्दन गाड़ लूं। देखिए न, मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर सेक्युलर लोग मौजूद हैं, एक मैं ही नहीं हूं। मोहल्ले के सारे सेक्युलर लोग जब आपस में मिलते हैं, बड़ी-बड़ी लंबी-लंबी बाते करते हैं, तो मुझे खुद पर गुस्से से अधिक रोना आता है कि हाय! मैं सेक्युलर क्यों न हुआ।

आजकल सेक्युलर लोगों की हर जगह डिमांड बढ़ गई है। खासकर, जब से नई सरकार पावर में आई है, तब से कथित सेक्युलरों की लगभग बाढ़-सी आ गई है। हाल यह है कि हर दूसरा व्यक्ति खुद को सेक्युलर घोषित करने में जी-जान से लगा हुआ है। दिलचस्प है कि समाज से कहीं ज्यादा सेक्युलर लोग फेसबुक पर मौजूद हैं। और, अपने कथित सेक्युलरिजम की आड़ में ऐसी-ऐसी क्रांतिकारी बातें लिख रहे हैं कि जिन्हें पढ़कर मैं खुद को 'बौना' महसूस करता हूं। मेरी फ्रेंड लिस्ट में जित्ते भी सेक्युलर लोग हैं, सब एक से बढ़कर एक 'धाकड़' हैं। उनका बस चले तो वे दुनिया के साथ-साथ फेसबुक को भी सेक्युलरिजम के रंग में रंग दें।

समाज का तो मालूम नहीं मगर हां फेसबुक पर सेक्युलरिजम को लेकर बड़ी तगड़ी बहस चल रही है। कुछ दीवारों पर तो सेक्युलरिजम की आड़ में जुतम-पैजार तक हो चुकी है। हर कोई लगा हुआ है, खुद को दूसरे बड़ा सेक्युलर घोषित करने में। जिन्हें सेक्युलरिजम का ढंग से अर्थ-मतलब तक नहीं मालूम वे भी पिले पड़े हैं, बहस-विवाद में। जब से याकूब को फांसी पर लटकाया गया है, तब से सेक्युलरिजम पर बहस इस कदर बढ़ गई है, पढ़कर लग रहा है, मानो देश-समाज से अन्य जरूरी मुद्दे हवा हो लिए हैं। न किसी को चिंता महंगाई की है, न शिक्षा की, न स्वास्थ्य की, न बिजली की, न पानी की, न रोटी की, न गरीब की; सब के सब सेक्युलरिजम की दीवार पर चढ़कर एक-दूसरे से गुथ्म-गुथ्था हैं।

नेता लोग भी अपने में मस्त हैं। संसद चल नहीं रही। न कोई नया बिल पेश हो रहा है न पास। संसद के भीतर भी वही सीन है, जो बाहर है। अमां, जब अपने देश में इत्ते सेक्युलर भक्त हैं, तो फिर कम्यूनल बातों-राइटस का डर हमेशा क्यों व्याप्त रहता है? फिर तो पूरे देश को आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए न। लेकिन हम तो सेक्युलर-सेक्युलरिजम की बहस में ही उलझकर रह गए हैं।

अच्छा, कथित सेक्युलर लोगों के साथ भी बड़ी गड़बड़ है। वे याकूब को फांसी न हो पर राष्ट्रपति को चिट्ठी तो लिखते हैं किंतु तसलीमा नसरीन पर जब हमला होता है तो चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं। मानो, कुछ हुआ ही न हो। सेक्युलरिजम की पक्षधरताएं कथित सेक्युलरों के तईं समय-समय पर बदलती रहती हैं शायद। उनका कोई ठिकाना नहीं रहता कब-कहां-किसके साथ खड़े हैं, किसके साथ नहीं।

वाकई पियारे बड़ा कन्फयूजन है सेक्युलरिजम में। हो तो मुश्किल न हो तो यह सवाल क्यों नहीं हो।

सेक्युलर और सेक्युलरिजम पर फैले इत्ते रायते को देख-पढ़-सुनकर मुझे अपने आप से बड़ी राहत मिलती है कि अच्छा ही है, जो मैं सेक्युलर नहीं हूं। कथित सेक्युलरों ने सेक्युलर बनकर कौन से झंडे गाड़ लिए हैं, जो मैं गाड़ लेता। इसलिए पियारे, जो हो जैसे हो, वैसे ही बने रहो। यह दुनिया बड़ी अजीब है, कब में 'सीधी' हो जाए, कब में 'टेढ़ी' कुछ नहीं पाता।

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