सोमवार, 31 अगस्त 2015

मेरे शहर का स्मार्ट सिटी होना

मेरे शहर का नाम भी 'स्मार्ट सिटी' बनने की फेहरिस्त में शामिल हो गया है। भविष्य में मेरा शहर स्मार्ट सिटी के नाम से जाना-पहचाना जाएगा। यकीनन, यह मेरे तईं बेहद खुशी का विषय है। अब मैं भी लोगों से सीना तानकर कह सकूंगा कि मैं स्मार्ट सिटी का बाशिंदा हूं।

अभी तलक तो इंसान और वस्तुएं ही स्मार्ट हुआ करती थीं मगर अब शहर भी स्मार्ट हो जाएंगे। स्मार्ट हुए शहर देखने में कैसे लगेंगे, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। शहरों में हर ओर स्मार्टनेस ही स्मार्टनेस बिखरी पड़ी होगी। गली-मोहल्ले से लेकर सब्जी मंडी तक स्मार्ट होगी। ठेले-फड़ वाले स्मार्ट होंगे। यहां तक कि गाय-भैंसे तक स्मार्ट हो लेंगी। बेहद स्मार्टनेस के साथ वे दूध दिया करेंगी। उनकी सानी एवं साफ-सफाई भी बेहद स्मार्ट तरीके के साथ होगी। सबकुछ कित्ता बदल जाएगा न। स्मार्ट सिटी में स्मार्टनेस मुफ्त में दिखा करेगी।

मेरे शहर को स्मार्ट करने की बात तो अब चली है, जबकि मेरा शहर तो जाने कब से स्मार्ट है। यहां के लोग। यहां का करोबार। यहां की सड़कें-चौराहे। गली-मोहल्ले। हस्पताल-पार्क सब के सब स्मार्ट हैं। शहर को स्मार्ट सिटी का दर्ज मिल जाने से मेरा शहर अब 'ओवर-स्मार्ट' हो लेगा। शहर या लोग जब ओवर-स्मार्ट हो जातें हैं, फिर उनके भीतर मौजूद छोटी-छोटी 'अन-स्मार्ट बातें' कोई खास मायने नहीं रखतीं।

मतलब, क्या हुआ, जो शहर में एकाध जगह गढ्डे रह जाएंगे। क्या हुआ, जो मलिन बस्तियों को शहर से खदेड़ कर बहुत दूर फेंक दिया जाएगा। क्या हुआ, जो गरीब स्मार्ट सिटी में घुसने पर सौ बार सोचेंगे। क्या हुआ, जो स्मार्ट सिटी का बंदा कईयां होगा। क्या हुआ, जो मरीज के गुजर जाने के बाद एंब्यूलेंस पहुंचेगी। इस सब से इतर महत्त्वपूर्ण है, मेरे शहर का स्मार्ट सिटी होना।

आधुनिक होने से कहीं ज्यादा जरूरी होता है आधुनिकता का बोध। तो यह बदलाव मेरे शहर में धीरे-धीरे कर अब नजर आने लगा है। स्मार्ट सिटी में जब हर बंदा कानों में ईयर-फोन और हाथों में स्मार्टफोन लेके घुमेगा, तो कित्ती उम्दा फीलिंग आएगी, इसे महसूस किया जा सकता है। आपस में लोगों के दिल भले ही मिलें या न मिलें पर सिटी का स्मार्ट होना अधिक मायने रखता है। सिटी स्मार्ट तो हम स्मार्ट।

चूंकि मेरा शहर स्मार्ट सिटी होने की राह पर आगे बढ़ चुका हूं तो उसके अनुरूप अब मैं भी ढलने की कोशिश में लग गया हूं। यानी, धीरे-धीरे कर मैं भी स्मार्ट हो रहा हूं। स्मार्ट सिटी में रहने के लिए खुद का भी स्मार्ट होना बेहद जरूरी है। ताकि कल को कोई मुझ पर 'ओल्ड-फैशनड' होने का आरोप न लगा पाए।

यों भी, स्मार्ट सिटी में रहने वालों की बात ही कुछ और होती है। है कि नहीं...।

रविवार, 30 अगस्त 2015

प्याज से इश्क

कहने में कैसी शर्म- हां, मुझे प्याज से 'इश्क' है। प्याज से मेरा इश्क कोई साल-दो साल पुराना नहीं बल्कि 'बचपन' से है। घर वाले बताते हैं- मैंने जन्म लेते ही, सबसे पहला शब्द 'प्याज' ही बोला था। यही वजह है कि मेरा प्याज के प्रति इश्क कम नहीं बल्कि निरंतर 'जवान' ही होता गया। कहा जा सकता है कि मैं और प्याज एक-दूसरे के 'पूरक' बन चुके हैं।

प्याज के प्रति मेरे इश्क का यह आलम है कि मैं खाना बिना प्याज के खा ही नहीं सकता। एक बार को रोटी-दाल-चावल-सब्जी खाना छोड़ सकता हूं किंतु प्याज खाना नहीं। मेरी जीभ को जब तलक प्याज का 'स्वाद' न लगे 'तृप्त' होती ही नहीं। प्याज खाने में जो 'आनंद' है, उसे शब्दों में बयां करना मेरे तईं जरा मुश्किल काम है। प्याज पर मैं जान छिड़कता हूं।

मेरी सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्याज 80 रुपए किलो बिके या 800 रुपए किलो। मुझे तो मतलब केवल प्याज खाने से है। प्याज मेरी आत्मा, मेरे दिल में बसती है।

प्याज को लेकर इधर तमाम तरह की खबरें पढ़ने-सुनने को मिल रही हैं। लोग बाग प्याज के 80 पार जाने से बड़े परेशान व स्तब्ध हैं। कह रहे हैं- प्याज का 80 रुपए किलो बिकना सरकार, लोकतंत्र व रसोई के लिए 'खतरे की घंटी' है। सरकार से अपील कर रहे हैं कि जल्द से जल्द प्याज की कीमतों पर काबू पाए।

मेरा उन लोगों से बस इत्ता पूछना है कि प्याज 80 रुपए किलो क्यों नहीं बिक सकती? जब दालें और सब्जियां महंगी बिक सकती हैं तो प्याज क्यों नहीं? प्याज के महंगे बिकने पर ही पाबंदी क्यों लगनी चाहिए? आखिर प्याज ने किसी का क्या बिगाड़ा है? सिंपल-सी बात है, अगर आपका दिल ठुकता है तो प्याज खाइए। अगर नहीं ठुकता तो न खाइए। कोई प्याज चलकर आपसे कहने तो नहीं आ रही कि आप मुझे जरूर-जरूर खाएं।

मैंने अक्सर देखा है, जब भी प्याज के दाम थोड़े से बढ़ते हैं लोगों के पेट में बेइंतहा दर्द शुरू हो जाता है। एंवई प्याज को गरियाने लग जाते हैं। कुछ तो इत्ते 'क्रांतिकारी' हो जाते हैं कि बकायदा फेसबुक पर यह घोषण कर देते हैं कि वे महंगी प्याज नहीं खाएंगे। या प्याज के महंगा होने पर खुश हैं। अब उनसे मैं क्या कहूं! यह तो वही वाली बात हो जाती है कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद।

प्याज से- मेरी तरह- इश्क करो तो जानो प्याज किसे कहते हैं। यह प्याज ही है, जिसमें बंदे को रूलाने की कुव्वत होती है। वरना, कोई और फल या सब्जी आदमी को रूलाके तो दिखा दे। इसीलिए ज्यादातर लोग प्याज से सीधे-सीधे पंगा नहीं लेना चाहते। क्योंकि उन्हें मालूम है न प्याज का स्वभाव।

मुझे तो प्याज की खातिर रोने में भी मजा आता है। सच बताऊं, मैने जित्ते आंसू पूर्व प्रेमिकाओं के वियोग में नहीं बहाए, उससे कहीं ज्यादा तो प्याज के इश्क में बहा चुका हूं। प्याज के इश्क में आंसू बहाना मुझे अच्छा लगता है। जब-जब प्याज महंगी होती है तो मेरे दिल को बड़ा 'सुकून' मिलता। तब ही तो पता चलता है कि प्याज से 'असली इश्क' करने वाले कित्ते हैं और 'नकली' कित्ते।

जिन्हें प्याज के महंगा होने पर एतराज है, उनकी वे जाने। मगर मुझे कतई नहीं है। मुझे तो प्याज हर रूप-रंग-कीमत में 'सुंदर' ही लगती है। प्याज के प्रति मेरे इश्क का रंग गाढ़ा ही हुआ है। लव यू प्याज।

बुधवार, 26 अगस्त 2015

दिल न लगाना शेयर बाजार से

शेयर बाजार की दुनिया हमारी दुनिया से कतई अलग होती है। वहां के नियम-कायदे-कानून भी अलग होते हैं। कहने को हमने तरह-तरह के 'रूल' बनाए जरूर हैं, शेयर बाजार को चलाने के लिए मगर वो चलता अपनी चाल के हिसाब से ही है। किसी (दूसरे) की चाल पर चलते शेयर बाजार को- कम से कम- मैंने तो नहीं देखा। अपनी 'मस्ती' में होगा तो ऐसा 'मस्त' चलेगा कि लगेगा ही नहीं यह वही सेंसेक्स है, जिसने तगड़ी-तगड़ी गिरवटों में निवेशकों को निपटा डाला है। चाल में नहीं होगा तो कित्ता ही जोर लगा व लगवा लीजिए नहीं चलके देगा।

सेंसेक्स की चाल की थाह आज तलक कोई नहीं पा पाया है। जो लोग ऐसा दवा करते हैं कि वो शेयर बाजार या सेंसेक्स की चाल को पकड़ पाने में सफल हुए हैं, 'कोरी फेंकते' हैं। इत्ता समझ लीजिए कि सेंसेक्स की चाल और बीवी के मूड का कोई पता नहीं रहता- कब में बिगड़ जाए, कब में संवर। इसीलिए मैं सेंसेक्स और बीवी दोनों से ही 'उचित दूरी' बनाकर रहता हूं।

अभी हाल दुनिया के भर के शेयर बाजारों ने जो धूम-धड़ाके के साथ पटखनी लगाई है, अच्छे से अच्छे और सियाने से सियाने चारों खाने चित्त पड़े हैं। बियर ने बूल को गोद में उठाकर ऐसा पटका कि बिचारा बूल न कुछ समझ पाया न संभल पाया। एक ही पटकनी में निवेशकों के साढ़े सात लाख करोड़ स्वाह कर डाले। अब बैठाने को बैठाते रहिए किस्म-किस्म की 'जुगाड़ें' पर शेयर बाजार के दरिया में डूबी हुई रकम का मिलना मुश्किल ही नहीं नामुंकिन है पियारे। यहां जो एक दफा डूब गया, समझो डूब ही गया।

यह 'डूब' केवल शेयर बाजार तक ही सीमित नहीं रही, साथ-साथ रुपया और कच्चा तेल भी डूबा। रुपया फिलहाल 66 पर आनकर टिक लिया है। यह 66 पर कब तलक टिका रहेगा, कहना मुश्किल है। कच्चे तेल का भी दिवाला निकला हुआ है।

शेयर बाजार में कुछ भी 'स्थाई' नहीं होता। हर पल यहां कुछ न कुछ चढ़ता-उतरता रहता ही है। इस दरिया में टिके केवल वही लोग रह पाते हैं, जिनमें हर बड़ी डूबी को सहने की क्षमता होती है। जिनमें क्षमता नहीं होती, उन्हें निपट लेने में एक से दूसरा सेकेंड नहीं लगता। इसीलिए तो ज्ञानी लोग कहते हैं कि शेयर बाजार की दुनिया में केवल वही कदम रखे, जिसमें इसे झेल पाने की कुव्वत हो, वरना यहां से कट लेना ही बेहतर।

यह बात दीगर है कि दुनिया भर के शेयर बाजार आपस में मिले हुए हैं। एक गिरता तो सब गिर पड़ते हैं। यह होड़ भी साथ लगी रहती है कि कौन कित्ता ज्यादा गिरके दिखा पाता है। जो जित्ता ज्यादा गिरता है, वो अगले दिन अखबारों में 'सुर्खियां' बटोर ले जाता है। शेयर बाजार बढ़ने से ज्यादा गिरने को अपनी 'शान' समझने लगे हैं। गिरते वो हैं और दिल निवेशकों के बैठ जाते हैं। वित्तमंत्री के पास जवाब नहीं होता देने को सिवाय इसके कि घबराए नहीं, सब ठीक होगा। सात लाख करोड़ निपट लेने के बाद अब बचा ही क्या है ठीक होने को वित्तमंत्रीजी।

और दिल लगाइए चीन-अमेरिका से। बदले में मिल क्या रहा है- अर्थव्यवस्था का आतंक। यह ऐसा आतंक है, जिससे पार पाने में सालों लग सकते हैं। जैसे-तैसे संभल-संभाला के हमारा सेंसेक्स अपने पैरों को 'कुछ मजबूती' दे पाया था कि एक तगड़ा झटका लगा और धड़ाम। पानी देने वाला भी कोई पास नहीं। केवल दिलासे हैं। किंतु दिलासों से डूबी रकम वापस तो नहीं लौट आएगी न।

इसीलिए तो कहते हैं कि शेयर बाजार से कभी दिल नहीं लगाना चाहिए। यह बेवफा माशूका जित्ता ही दिल-फरेब होता है। यहां से जित्ता प्यार मिल रहा है साथ-साथ लेते जाइए। अगर दिल देने के चक्कर में पड़ जाएंगे तो एक दिन दिल बैठाके ही छोड़ेगा। क्या पता, 1624 प्वाइंट की गिरावट के बाद जाने कित्तों के दिल बैठ भी गए हों।

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

तोते का गाली-प्रेम

जी न इसमें कतई दोष उस बिचारे तोते (हरियल) का नहीं, जो उस बुर्जुग महिला को गंदी-गंदी गालियां दिया करता था। दोषी तो दरअसल उस इंसान का है, जिसके सिखाए में आकर तोता भी गालियां देना सीख गया। यों भी, तोते के बारे प्रचलित है कि उसे जैसा बोलना सिखाओ, वो वैसा ही बोलने लगता है। तोते की 'रटन-शक्ति' बहुत तेजी होती है। इसीलिए तो रटनतूओं को रटनतू-तोता कहा जाता है।

तोते का गालियां देना अपने आप में 'रोमांच' का विषय है। मैं तो इस बात को सोच-सोचकर ही खासा रोमांचित हुआ जाता हूं कि तोता गंदी गालियां (जाहिर, उनमें कुछ मां-बहन-साला-साली की भी रही होंगी) देता किस तरह से होगा। गालियां देते वक्त उसकी आवाज (टोन) किस तरह की रही होगी। गौरतलब यह भी है कि तोता केवल उस बुर्जुग महिला को देखकर ही गालियां दिया करता था। किसी और को नहीं। हालांकि महिला ने पुलिस को बताया भी था कि उसके बेटे के सिखाने पर ही वो उसे गालियां दिया करता था। जो भी हो, तोते का गालियां देना एक बार को मन में रोमांच तो भर ही देता है न।

यह तो चलो तोता रहा जिसकी गाली देनी की आदत के बारे में पता चल गया हो सकता है कुछ और भी ऐसे पशु-पक्षी हों, जो शायद उस तोते की ही तरह गालियां देते हों। अभी जिनके बारे में हमें पता न चल पाया हो। क्या पता, मन ही मन इंसानों को भी गलियाते हों। क्योंकि पशु-पक्षियों का इंसान के बीच दिन-रात का रहना-उठना होता है। इंसान की हर प्रकार की आदतें उन्हें मालूम रहती हैं। जब जानवर इंसानों की और बातों को कॉपी कर सकते हैं तो फिर गालियों पर भी हाथ आजमा ही लेते होंगे। यह निश्चित ही खोज का विषय है।

वैसे इंसान की फितरत का भी जवाब नहीं। उसने तोते को कुछ और नहीं, सीधा गाली देना ही सिखाया-बताया। गालियों के सहारे ही वो अपने मन की भड़ास उस महिला पर निकाल लेना चाहता था। महिला ने बताया भी कि वो तोते से गालियां खा-खाकर मानसिक तौर काफी प्रताड़ित हुई है। जब उस तोते को पुलिस थाने में लाया गया, तब गाली का एक शब्द उसके मुंह से नहीं निकला। यानी, तोता भी आम आदमी और पुलिस के बीच अंतर को समझता है। वाकई बड़ा ही कमाल का तोता है ये तो।

सच बताऊं, अब तो मुझे भी अपने तोते से डर-सा लगने लगा है। कहीं एक दिन वो भी उस कथित तोते की राह पर न चल दे। उसके सामने भी तमाम तरह की बातें (गालियों से लेकर बुराई-भलाई तक) मैं कर लिया करता हूं। अक्सर ध्यान से उन्हें वो सुनता भी है। मगर, शुक्र है कि आज तलक उसने गाली कभी किसी को नहीं दी। पर पक्षी या जानवर के 'मूड' का क्या भरोसा। जब नाम ले सकता है तो गाली भी दे ही सकता है।

कथित तोते ने इंसान के खिलाफ गालियों का मोर्चा खोलकर यह बतला दिया है कि उससे 'पंगा' लेने का नहीं। ज्यादा पंगा लिया तो वो उसे उसी की जुबान में जवाब देने की ताकत रखता है। तोते ने अपनी पारंपरिक छवि को बदल डाला है। अब न उसे ज्योतिषी महाराज के कहे पर चलना है, न सीबीआइ के रूप में उपमा पानी है। अब वो बिंदास गाली बक सकता है।

इसीलिए तो कह रहा हूं, दोषी तोता (हरियल) नहीं, दोषी इंसान है। कार्यवाही इंसान के खिलाफ होनी चाहिए। बोलते वक्त तोते को क्या मालूम कि वो गाली दे रहा है या राम-राम कह रहा है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

शिकायतों के बहाने

कुछ लोगों को शिकायत है कि देश में कुछ भी 'अच्छा' नहीं चल रहा है। हर तरफ गड़बड़ ही गड़बड़ है। न सरकार अच्छे से काम कर रही है, न नेता अच्छे से वादे पूरे कर रहे हैं, न सांसद अच्छे से संसद चलने दे रहे हैं, न व्यवस्था में अच्छापन आ पाया है, न समाज अच्छा व्यवहार कर रहा है, न साहित्य में कुछ अच्छा आ पा रहा है। उनकी शिकायतों का ग्राफ इस कदर बढ़ गया है कि उन्हें अब अपने भीतर भी कुछ अच्छा नहीं लगता। हर वक्त, हर किसी से, हर कहीं की शिकायतें करते-करते वे 'शिकायतीलाल' बन गए हैं।

दरअसल, समाज में होते हैं कुछ ऐसे लोग भी जिनका मन चौबीस घंटे शिकायतें करने और शिकायतें सुनने में ही लगा रहता है। 'बाल की खाल' निकालना उनकी 'आदत' होती है। देश, समाज, व्यवस्था, राजनीति, साहित्य में अगर कुछ अच्छा हो भी रहा हो, तो भी उनको दिखाई नहीं देता। उन्हें केवल शिकायतें ही नजर आती हैं। तरह-तरह की शिकायतें कर-करके ही वे अपना पेट भरते रहते हैं। मैंने देखा है, जिस दिन शिकायतीलाल को शिकायत करने का मौका न मिले- न चैन से सो पाते हैं, न ढंग से कुछ खा पाते। माथे पर बल डाले और चेहरे पर बारह बजाए, यों दिखते हैं, मानो अभी शमशान भूमि से लौटकर आए हों।

ऐसा नहीं कि शिकायतीलाल को शिकायतें केवल बाहर ही नजर आती हों, अपना घर भी उन्हें शिकायतों का पुलिंदा ही लगता है। घर के काम से शिकायतें। बीवी-बच्चों, नाते-रिश्तेदारों से शिकायतें। कामवाली से लेकर प्रेसवाले तक से तो उन्हें शिकायत रहती है कि कोई भी काम अच्छे से नहीं कर रहा। अच्छापन उनके दिलो-दिमाग में इस कदर बैठ चुका होता है कि हर समय अच्छे-अच्छे की खुमारी में ही डूबे रहते हैं। जैसे- बीजेपी वाले अच्छे दिन की खुमारी में डूबे हैं। अच्छे दिन लाने के चक्कर में ज्यादातर बातें जुमाला-प्रधान ही हो रही हैं। रही-सही कसर सरकार के मंत्रीगण अपने कथित अच्छे-अच्छे बयानों से पूरी कर दे रहे हैं।

अच्छी बातों या अच्छे दिनों में कोई बुराई नहीं। बुराई केवल 'हवाबाजी' करने में है। हवाबाजी से न शिकायतें दूर हो सकती हैं, न अच्छे दिन आ सकते हैं। कूढ़न में चाहे जित्ता दिल को जला लीजिए।

गजब यह है कि हर वक्त शिकायतें करने वाले शिकायतीलाल खुद कभी कुछ नहीं करते। न उनकी भूमिका समाज में कुछ होती है, न अपने परिवार में। किसकी टांग कैसे और कहां से खींची जा सकती है, बस ध्यान उनका उसी में लगा रहता है। नकारात्मकता की डोज इत्ती ज्यादा ले लेते हैं कि हर वक्त उन्हें हर कहीं काला ही काला नजर आता है। नकारात्मकता अपने आप में सबसे बड़ा जहर है। जिसने इसे पी लिया, समझ लीजिए वो गया काम से। लगभग यही स्थिति शिकायतीलालों है।

नहीं मानो तो देश, समाज, व्यवस्था में कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा और मानो तो सबकुछ अच्छा ही चल रहा है। सब अपने-अपने देखने का नजरिया है। चीजें कभी रात भर में दुरुस्त नहीं हो सकतीं। टाइम लगता है, चीजों को दुरुस्त होने में।

इत्ते बड़े देश को चलाना कोई हंसी-खले नहीं है। टांके ढीले हो जाते हैं, सबको संग-साथ लेकर चलने में। एकाध भी अगर बिगड़ गया, फिर उसे संभालना बड़ा मुश्किल हो जाता है। माना कि लाख खामियां हैं राजनीति, नेता, व्यवस्था में, फिर भी, रहना तो हमें उनके बीच ही है। एकदम से सबको 'खारिज' कर देने का मतलब है कि हमारा विश्वास केवल नकारात्मकता में है, सकारात्मकता में नहीं। शिकायत का क्या है, किसी से भी कर लो। खुली छूट है। मगर शिकायत को सुलटाने में पसीने छूट जाते हैं।

कह कुछ भी लीजिए पर जिन्हें शिकायत करनी है, करेंगे। क्योंकि अगर वो शिकायत नहीं करेंगे तो उनकी रोटी हजम नहीं होगी। जब रोटी हजम नहीं होगी तो हाजमोलावालों की दुकानदारी का क्या होगा? दुकान का चलना जरूरी है, चाहे जैसे चले।

शिकातीलालों की शिकायतों पर ज्यादा ध्यान न देकर, केवल उन्हें एंज्वॉय करें। इसी में भलाई है।

बुधवार, 19 अगस्त 2015

शर्मीले लोगों का पोर्न प्रेम

समाज में दो प्रकार के लोग पाए जाते हैं। एक वो, जो शर्माते नहीं। दूसरे वो, जो शर्माते हैं। जो शर्माते नहीं, वो अपनी बात या इच्छा 'बिंदास' होकर सामने रखते हैं। जो शर्माते हैं, वो बिंदास तो नहीं होते हां 'मनघुन्ने' जरूर होते हैं। शर्माने-शर्माने की आड़ में वो वो सबकुछ करते रहते हैं, जिसका न शर्माने वाले अक्सर विरोध करते रहे हैं। शर्माने वाले ऊपर से बहुत सीधे-सच्चे दिखते हैं पर भीतर से बेहद रसिया टाइप के होते हैं। न न हंसिए मत, एकदम सही कह रहा हूं।

अब यही देख लीजिए न, बिंदास टाइप के लोग पोर्न साइट्स पर बैन का विरोध भी कर रहे हैं और समर्थन भी। लेकिन शर्माने वाले एकदम 'चुप' हैं। इस बाबत न वे सरकार से कुछ कह रहे हैं, न फेसबुक पर कुछ फरमा रहे हैं। उन्होंने अपनी छवि शर्मीले टाइप की गढ़ ली है। अच्छा, सामने वाला भी जानता-समझता कि मियां शर्मीले हैं। ऐसे मुद्दों पर कुछ नहीं बोलते- चुप ही रहते हैं। पोर्न टाइप विषय उनके तईं 'अश्लीलता' समान है।

मगर एक अंदर की बात बताऊं, सबसे ज्यादा पोर्न शर्मीले टाइप लोग ही देखते हैं। शर्मिलापन तो उनका कथित आवरण है, दुनिया-समाज को बरगलाने का। पर भीतर से लड्डू पोर्न के लिए ही फूटते हैं।

दिन में कभी शर्मीले लोगों से पोर्न के विषय में बात करके देखिए, कमस से, ऐसा शर्माएंगे, ऐसा शर्माएंगे कि एक बार को लगेगा, कहीं धरती में न गढ़ जाएं। लेकिन रात होते ही, उनका कथित शर्मीलापन हवा हो लेता और पोर्न के प्रति एकदम बिंदास हो जाते हैं। पोर्न साइट्स-सीडीज का जो 'कलेक्शन' आपके-हमारे पास न होगा, उन कथित शर्मीले लोगों के पास होगा। ऐसा कि जिसे देखकर आप दांतों तले अंगुलियां चबा लेंगे।

आजकल तो आलम यह है कि हर बंदा पोर्न साइट्स पर बैन को लेकर 'बहस' करने में लगा हुआ है। चाहे सोशल मीडिया हो या समाज बहस छिड़ी हुई है, पोर्न साइट्स पर बैन हो तो क्यों हो और न हो तो क्यों न हो। सबके अपने-अपने तर्क हैं। जो अत्यंत बिंदास हैं, वो इस मुद्दे पर आपस में ही बंटे हुए नजर आते हैं। और, जो कथित शर्मिले हैं, उन्हें इस बहस से कोई लेना-देना नहीं, वे अपने में ही मस्त हैं। उनके तईं पोर्न 'आत्म-संतुष्टि' का विषय है। इसे वे अपने तलक ही 'महदूद' रखना पसंद करते हैं।

यह मुद्दा सबसे अधिक 'दिलचस्प' सोशल मीडिया (फेसबुक-टि्वटर) पर बना हुआ है। फेसबुक पर हर दूसरी पोस्ट और टि्वटर पर हर दूसरा ट्वीट पोर्न के बैन होने न होने पर ही केंद्रित होता है। चलो, पोर्न के बहाने ही सही, कम से कम समाज इस बारे में आपस में 'खुलकर' बात तो कर रहा है। वरना, तो पोर्न का नाम लेते ही हम 'हटो-बचो' की स्थिति में आ जाया करते थे।

वैसे आप मानो चाहे न मानो पोर्न को समाज के बीच 'बहसतलब' बनाया सनी लियोनी ने ही है। जब से उसने हिंदुस्तान की धरती पर कदम रखा है, पोर्न पर चर्चा हमारा 'ध्येय' सा बन गई है। साथ-साथ, समाज भी थोड़ा 'बोल्ड' हुआ है। इंटरनेट पर सबसे अधिक खोजी जाने वाली स्टार-मॉडल-एक्सट्रेस सनी लियोनी ही है। अब तो यह खबरें भी आने लगी हैं कि भारतीय महिलाएं पोर्न देखने में पुरुषों से कहीं ज्यादा आगे निकल गई हैं। हा हा हा हा वाकई हमारा समाज 'बोल्डनेस' के मामले में 'तरक्की' कर रहा है। जियो।

हां, कथित शर्मीले लोगों की पौ बारह है। उन्हें कोई मतलब नहीं पोर्न साइट्स पर बैन लगे, चाहे न लगे उन्हें तो देखने से मतलब। समाज की निगाह में वे 'शर्मीले' हैं मगर अंदर से कित्ते 'रसिया' टाइप हैं, ये उनसे बेहतर कोई नहीं जानता पियारे। कोई नहीं, लगे रहो शर्मीले लोगों, असली 'मजे' तुम्हारे ही हैं। जय हो।

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

राधे मां का जलवा

मैं हर उस तर्क का खंडन करता हूं, जो यह कहता है कि देवी राधे मां ने जनता (या भक्तों) को 'मूर्ख' बनाया है। न जी न कतई मूर्ख नहीं बनाया है। बल्कि भक्तों की मूर्खता को अपने 'चमत्कारिक प्रताप' से 'बल' दिया है। बताया है कि हे! भक्तों धर्म, आस्था, अंध-भक्ति, अंध-विश्वास की आड़ में तुम्हें कभी भी, कैसे भी, कोई भी 'मूर्ख' बना सकता है। और तुम मूर्ख बनने के लिए एक बार नहीं बल्कि हजार बार अभिशप्त हो।

काबिले-गौर यह है कि राधे मां के भक्तों में सबसे बड़ी जमात 'पढ़े-लिखों' की ही है। यह वही पढ़ा-लिखा वर्ग है, जो अपनी बुद्धिमत्ता की ढींगे अक्सर यहां-वहां हांकता हुआ मिल जाता है। बेशक इस पढ़े-लिखे वर्ग ने किताबें बहुत सारी पढ़ी होती हैं, क्लास बहुत सारे पास किए होते हैं, डिग्रियां बहुत सारी हासिल की हुई होती हैं किंतु अंध-आस्था के मामले में दिमागी तौर पर निहायत मूर्ख ही होता है। इत्ता पढ़-लिख जाने के बाद भी अपना भाग्य हाथ की लकीरों में और शांति राधे मां या आसाराम टाइप बाबाओं के आश्रमों में जाकर तलाशता है।

चूंकि उसके कने रुपए-पैसे की कहीं कोई कमी नहीं होती इसलिए कथित देवियों और बाबाओं को मुंह मांगी कीमत देने के लिए हमेशा तत्पर रहता है। अभी उससे कह दो किसी जरूरतमंद या गरीब की मदद करनी शांति तो ऐसे पीछे हट जाएगा जैसे कुत्ते को देखकर बिल्ली।

लेकिन पियारे ये राधे मां भी गजब हैं। आजकल हर तरफ राधे मां, राधे मां के ही चर्चे हैं। सोशल मीडिया पर तो राधे मां यों छाई हुई हैं मानो बहुत बड़ी 'सेलिब्रिटी' हों। इधर आईं राधे मां की कुछ 'बिंदास तस्वीरों' को देखकर कतई नहीं लग रहा कि ये देवी टाइप हैं। लग रहा है, देवी के रूप में 'मॉडल' हैं। राधे मां ने तो कथित देवियों की छवि को ही उलट-पुलट के रख दिया। देवी को बिंदास और मॉडल बना दिया है। क्यों न हो, जब दुनिया-समाज-लोग बदल रहे हैं तो क्या देवी-संत-बाबा न बदलेंगे! फैशनेबल या मॉर्डन होने में क्या बुराई है?

राधे मां के जलवे को देखकर अब तो मेरा मन भी करने लगा है कि लेखन-वेखन छोड़-छाड़के उनका 'भक्त' हो जाऊं। इत्तेफाक से पढ़ा-लिखा मैं भी हूं। इत्ते पढ़े-लिखे मूर्खों के बीच अगर एक मैं और मूर्ख हो गया तो क्या फर्क पड़ जाएगा। मैंने तो पढ़-लिख और लेखक बनकर भी देख लिया, बदले में मिलीं क्या सिर्फ 'तारीफें'। लेकिन पियारे पेट सिर्फ तारीफों से नहीं नोट से भरता है। और, दूसरों को मूर्ख बनाकर नोट कमाने में जो मजा है, वो किसी और काम में नहीं। देखिए न राधे मां कल तलक मामूली सिलाई किया करती थीं, घर का खर्च बामुश्किल चल पाता था मगर जब से देवी बनीं नोट कदमों में बिछे रहते हैं। नोट दान करने वालों में सबसे बड़ा वर्ग पढ़े-लिखे लोगों का ही है। अब बताइए कि मूर्ख कौन हुआ पढ़ा-लिखा या बे-पढ़ी-लिखी राधे मां।

जब तलक अंध-भक्ति और अंध-श्रद्धा का बाजार चमकता रहेगा, यहां से न राधे मां कम होने वाली हैं न आसाराम जैसे बाबा। कहने को कहते रहिए कुछ भी पर फर्क कहां और कित्तों पर पड़ना है। जो एक दफा अंध-भक्ति में डूब गया समझो गया काम से। फिर उसके आगे हर वैज्ञानिक और प्रगतिशील तर्क-वितर्क बेकार हैं। राधे मां का बाजार इसलिए फल-फूल रहा है क्योंकि हमने अपने विश्वास को खुद पर न टिका कर देवियों और बाबाओं पर टिका दिया है। इनके दरबारों में जित्ता पैसा फेंकोगे, उत्ता ही तमाशा देखने को मिलेगा।

फिलहाल, आज की हकीकत तो यही है कि राधे मां का जलवा हिट है। चमत्कार को नमस्कार है। जो जित्ता अंध-भक्ति में डूबा है, वो उत्ता ही सुखी है। बाकी तो बातें हैं, बातों का क्या!

बुधवार, 5 अगस्त 2015

स्मार्टनेस का जलवा

स्मार्ट सिटी, स्मार्ट फोन, स्मार्ट वॉच, स्मार्ट फ्रिज, स्मार्ट गजेट्स और भी न जाने क्या-क्या स्मार्ट। कोई भी अब स्मार्ट से नीचे बात ही करना नहीं चाहता। आलम यह है कि बंदे का 'मेंटल लेवल' भले ही स्मार्ट न हो पर फोन स्मार्ट होना चाहिए। स्मार्टफोन की एप्स स्मार्ट होनी चाहिए। स्मार्टफोन में बेलैंस भले ही बीस रुपए न हो पर कवर स्मार्ट होना चाहिए। ताकि लोगों को लगे कि बंदा कित्ता 'स्मार्ट' है।

समाज में अब सबकुछ 'स्मार्टनेस' के दम पर ही तय होने लगा है। न न मैं उस स्मार्टनेस की बात नहीं कर रहा, जिसका संबंध मेंटल लेवल से होता है। मैं उस स्मार्टनेस की बात कर रहा हूं, जिसमें स्मार्टनेस बतौर दिखावा, बतौर शोशा प्रस्तुत की जाती है। बंदे की बाइक और बालों का स्टाइल देखकर ही पता चलता है कि स्मार्टनेस कैसे परवान चढ़ती है।

स्मार्टनेस के साथ अगर अंगरेजी का तड़का न लगे तो बेकार है। बंदा अपनी स्मार्टनेस का लेवल, अंगरेजी बोलकर ही जतलाता है। अगर अंगरेजी सही से बोलनी नहीं भी आती तो फिकर नहीं, एप्स हैं न। एप्स के दम पर आप अंगरेजी तो छोड़िए, जापानी भी बिंदास बोल सकते हैं। एप्स हर समस्या का एक मात्र स्मार्ट हल हैं। कुछ पूछने के लिए बंदा अब गुरु कने नहीं सीधा एप्स या गूगल की शरण में जाता है। यही तो स्मार्टनेस का जलवा है पियारे।

अब तो सुनने में यह भी आ रहा है कि स्मार्टनेस की तर्ज पर ही स्मार्ट सिटी बनाई जाएंगी। आजकल स्मार्ट सिटी का भूत लोगों के दिलो-दिमाग पर इस कदर तारी है कि जब दो जन कहीं मिलते हैं, तब एक-दूसरे का हाल बाद में लेते हैं, पहले बात स्मार्ट सिटी की होती है। क्रीम-पॉडर लगाकर सिटियों को स्मार्ट करा जरूर जा रहा है पर अंदर का हाल अब भी बेहाल ही है। ट्रैफिक और अतिक्रमरण स्मार्ट सिटी के कॉस्पेट पर पलीता लगाने के लिए काफी हैं। उस पर बेफिक्र होकर घुमतीं गाय-भैंसें-कुत्ते सोने पर सुहागा। इत्ते पर भी बंदा दीवारों पर पान की पीक खुद को स्मार्ट समझकर ही मारता है। सड़क किनारे दीवार को गीला करने में भी अपनी स्मार्टनेस समझता है।

चूंकि जिद पाली हुई है कि स्मार्ट होकर ही रहना है तो फिर सरकार से लेकर अफसर तक लगे हैं, सिटी के ज्यूग्राफिये को स्मार्ट करने में।

स्मार्ट होने-बनने की कोशिश मैं भी कई दफा कर चुका हूं पर हर दफा 'फेल' ही हुआ हूं। स्मार्टफोन ले जरूर लिया है पर टच-स्क्रीन मुझे इत्ता 'आतंकित' किए रहती है कि अंगुलियां अक्सर गलत नंबर पर ही टच हो जाती हैं। इत्ते एप्स हैं पर अभी तलक मुझे ऐसी कोई एप न मिली है, जो मेरी दिमागी-बेवकूफियों को दूर भगा सके। सिर्फ इन्हीं बेवकूफियों की वजह से ही तो मैं स्मार्ट नहीं हो पा रहा।

जिंदगी स्मार्ट होने के चक्कर में इत्ती उलझ कर रह गई है कि यही समझ नहीं आता, स्मार्ट कित्ता होएं और कित्ता छोड़ दें। अब तो प्रधानमंत्रीजी भी स्मार्ट और डिजिटल होने पर लगातार जोर दे रहे हैं।

स्मार्ट होने की जिद के चलते कुछ दिनों बाद हो यह जाएगा कि समाज-परिवार में केवल वही बचेंगे, जो कथित तौर पर स्मार्ट हैं। जो स्मार्ट नहीं हैं, वे 'विलुप्त' हो जाएंगे। क्लियर है, अब हमें स्मार्ट बनने के लिए ही स्मार्ट होना है। 

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

पोर्न बैन : अरे, सरकार ये क्या किया!

सरकार पैसा दोगुना करने वाली साइट्स पर बैन लगा देती, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता। सरकार कार्टून साइट्स पर बैन लगा देती, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता। सरकार कथित उत्तेजना (तेल आदि) पैदा करने वाली साइट्स पर बैन लगा देती, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता। सरकार विज्ञापनों वाली साइट्स पर बैन लगा देती, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता। लेकिन, सरकार ने तो पोर्न साइट्स पर ही बैन लगा दिया। वो भी एक-दो नहीं पूरी 857 साइट्स पर।

एक साथ इत्ती सारी पोर्न साइट्स को बैन करना, भला कहां तक उचित है। पोर्न साइट्स को बैन करने से पहले सरकार ने एक दफा भी मुझ जैसे पोर्न-प्रेमियों के बारे में कुछ नहीं सोचा। यह तक जानने का प्रयास नहीं किया कि अगर पोर्न साइट्स पर बैन लग जाएगा तो मुझ जैसे पोर्न-प्रेमियों की रातें कैसे कटेंगी। अपनी दिमागी-स्ट्रैस को मैं कहां किस साइट, किस दर पर जाकर दूर करूंगा। और फिर उन बड़े-बड़े कथित अखबारों की साइट्स का क्या होगा, जहां पोर्नात्मक मसाला 18 प्लस के तहत परोसा जाता है। इन्हीं पोर्न साइट्स के विज्ञापनों के दम पर न जाने कित्ती और साइट्स की रोजी-रोटी चल रही है। बिना कुछ अगला-पिछला सोचे-समझे सरकार ने एकदम पोर्न को बैन कर मुझ जैसे पोर्न-प्रमियों के हित में जरा भी ठीक नहीं किया। मैं सरकार के इस 'तानाशाही' कदम की घोर निंदा करता हूं।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मेरा और पोर्न का नाता बचपन से है। बचपन में मैं स्कूली किताबों से कहीं ज्यादा पोर्न के विषय में पढ़ा करता था। मेरे बस्ते में जित्ती किताबें कोर्स की रहती थीं, लगभग उत्ती ही पोर्न की भी। बचपन से लेकर आज तलक मैंने पोर्न को कभी 'अश्लीलता' के तौर पर नहीं देखा। हमेशा उसे अपना 'पथ-प्रदर्शक' ही माना है। जिसे देखकर दिल को सुकून और आंखों को राहत मिले, उसे देखने-पढ़ने में- मेरी समझ से- कोई बुराई नहीं।

हालांकि लोग ऐसा कहते-मानते हैं कि पोर्न में केवल अश्लीलता होती है, जिसे देखकर मन में कुंठाएं-उत्तेजनाएं जागती हैं और बच्चे बिगड़ जाते हैं। किंतु मैं ऐसे मिथकों का खंडन करता हूं। पोर्न में विमर्श के अलावा कुछ नहीं होता। रही बात कुंठा की तो कुंठित व्यक्ति को पोर्न तो क्या किसी भी बात-साहित्य-सामग्री में कुंठा या अश्लीलता नजर आ सकती है। सबकी अपनी-अपनी च्वॉइस है। लोकतंत्र में हम किसी को बाध्य नहीं कर सकते ये या वो मानने या न मनने के लिए।

सरकार ने पोर्न साइट्स पर बैन लगाने का फैसला कहीं सनी लियोनी की भारत में निरंतर बढ़ती प्रसिद्धि के तहत तो नहीं लिया? ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। होने के चांस इसलिए ज्यादा हैं क्योंकि कुछ बेहद सभ्यता-संस्कृति पसंद लोगों ने पिछले दिनों सनी लियोनी को वापस अपने देश भेजने की बात कही थी। मगर ऐसे कथित भद्र-पुरुषों को मैं अच्छे से जानता हूं, जो दिन में सनी लियोनी का विरोध और रात में उसकी फिल्मों पर दिल-जान लूटाने को बेताब रहते हैं।

पोर्न में अगर अश्लीलता होती तो मार्केट में उसकी इत्ती डिमांड भी न होती। अभी हाल एक रपट में पढ़ा था कि भारत में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं पोर्न फिल्मों का लुत्फ उठा रही हैं। जब पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना ही है, तो यह भी सही। क्या हर्ज है इसमें। देश-दुनिया-समाज के बीच बदलाव ऐसे ही तो आते हैं।

मेरी समझ से सरकार को पुनः विचार करना चाहिए पोर्न साइट्स पर बैन लगाने के बारे में। पोर्न साइट्स के प्रति सरकार का अगर ऐसा ही अड़ियल रूख रहा तो मुझे जैसे पोर्न-प्रेमियों का क्या होगा? फिर तो मुझे पुरानी पोर्न सीडीज को 'ऐतिहासिक धरोकर' मान काफी सहेजकर रखना पड़ेगा। जिनको मेरी तरह पोर्न में 'दिलचस्पी' है, उनके लिए यह बैन यकीनन 'मानसिक प्रताड़ना' देने वाला है। बाकी सरकार की मर्जी।

सोमवार, 3 अगस्त 2015

हाय! मैं सेक्युलर न हुआ

पियारे, पिछले कई दिनों से मैं इस कोशिश में लगा हुआ हूं कि मैं कैसे भी सेक्युलर हो जाऊं! सेक्युलर होकर बड़े-बड़े तथाकथित सेक्युलरों की जमात में शामिल हो जाऊं। जैसे वे लोग हर समय अपने सेक्युलरिजम का झंडा बुलंद किए रहते हैं, मैं भी करता रहा हूं। लेकिन इत्ती कोशिश करने के बाद भी मैं सेक्युलर नहीं हो पा रहा।

आप यकीन नहीं करेंगे, सेक्युलर होने की खातिर मैं अपना हाथ व जन्मपत्री तक ज्योतिषी महाराज को दिखा चुका है। उन्होंने भी मेरे हाथ (भाग्य) में सेक्युलर होने की कोई रेखा नजर नहीं आई। उन्होंने साफ कह दिया कि कम से कम इस जन्म में तो मैं सेक्युलर नहीं ही हो सकता।

खुद के सेक्युलर न होने पर निराशा से कहीं ज्यादा मुझे शर्मिंदगी महसूस होती है। मन करता है, कहीं रेत में जाकर अपनी गर्दन गाड़ लूं। देखिए न, मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर सेक्युलर लोग मौजूद हैं, एक मैं ही नहीं हूं। मोहल्ले के सारे सेक्युलर लोग जब आपस में मिलते हैं, बड़ी-बड़ी लंबी-लंबी बाते करते हैं, तो मुझे खुद पर गुस्से से अधिक रोना आता है कि हाय! मैं सेक्युलर क्यों न हुआ।

आजकल सेक्युलर लोगों की हर जगह डिमांड बढ़ गई है। खासकर, जब से नई सरकार पावर में आई है, तब से कथित सेक्युलरों की लगभग बाढ़-सी आ गई है। हाल यह है कि हर दूसरा व्यक्ति खुद को सेक्युलर घोषित करने में जी-जान से लगा हुआ है। दिलचस्प है कि समाज से कहीं ज्यादा सेक्युलर लोग फेसबुक पर मौजूद हैं। और, अपने कथित सेक्युलरिजम की आड़ में ऐसी-ऐसी क्रांतिकारी बातें लिख रहे हैं कि जिन्हें पढ़कर मैं खुद को 'बौना' महसूस करता हूं। मेरी फ्रेंड लिस्ट में जित्ते भी सेक्युलर लोग हैं, सब एक से बढ़कर एक 'धाकड़' हैं। उनका बस चले तो वे दुनिया के साथ-साथ फेसबुक को भी सेक्युलरिजम के रंग में रंग दें।

समाज का तो मालूम नहीं मगर हां फेसबुक पर सेक्युलरिजम को लेकर बड़ी तगड़ी बहस चल रही है। कुछ दीवारों पर तो सेक्युलरिजम की आड़ में जुतम-पैजार तक हो चुकी है। हर कोई लगा हुआ है, खुद को दूसरे बड़ा सेक्युलर घोषित करने में। जिन्हें सेक्युलरिजम का ढंग से अर्थ-मतलब तक नहीं मालूम वे भी पिले पड़े हैं, बहस-विवाद में। जब से याकूब को फांसी पर लटकाया गया है, तब से सेक्युलरिजम पर बहस इस कदर बढ़ गई है, पढ़कर लग रहा है, मानो देश-समाज से अन्य जरूरी मुद्दे हवा हो लिए हैं। न किसी को चिंता महंगाई की है, न शिक्षा की, न स्वास्थ्य की, न बिजली की, न पानी की, न रोटी की, न गरीब की; सब के सब सेक्युलरिजम की दीवार पर चढ़कर एक-दूसरे से गुथ्म-गुथ्था हैं।

नेता लोग भी अपने में मस्त हैं। संसद चल नहीं रही। न कोई नया बिल पेश हो रहा है न पास। संसद के भीतर भी वही सीन है, जो बाहर है। अमां, जब अपने देश में इत्ते सेक्युलर भक्त हैं, तो फिर कम्यूनल बातों-राइटस का डर हमेशा क्यों व्याप्त रहता है? फिर तो पूरे देश को आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए न। लेकिन हम तो सेक्युलर-सेक्युलरिजम की बहस में ही उलझकर रह गए हैं।

अच्छा, कथित सेक्युलर लोगों के साथ भी बड़ी गड़बड़ है। वे याकूब को फांसी न हो पर राष्ट्रपति को चिट्ठी तो लिखते हैं किंतु तसलीमा नसरीन पर जब हमला होता है तो चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं। मानो, कुछ हुआ ही न हो। सेक्युलरिजम की पक्षधरताएं कथित सेक्युलरों के तईं समय-समय पर बदलती रहती हैं शायद। उनका कोई ठिकाना नहीं रहता कब-कहां-किसके साथ खड़े हैं, किसके साथ नहीं।

वाकई पियारे बड़ा कन्फयूजन है सेक्युलरिजम में। हो तो मुश्किल न हो तो यह सवाल क्यों नहीं हो।

सेक्युलर और सेक्युलरिजम पर फैले इत्ते रायते को देख-पढ़-सुनकर मुझे अपने आप से बड़ी राहत मिलती है कि अच्छा ही है, जो मैं सेक्युलर नहीं हूं। कथित सेक्युलरों ने सेक्युलर बनकर कौन से झंडे गाड़ लिए हैं, जो मैं गाड़ लेता। इसलिए पियारे, जो हो जैसे हो, वैसे ही बने रहो। यह दुनिया बड़ी अजीब है, कब में 'सीधी' हो जाए, कब में 'टेढ़ी' कुछ नहीं पाता।