सोमवार, 13 जुलाई 2015

व्यापमं की व्यापकता

व्यापमं की व्यापकता दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जा रही है। हर रोज किसी न किसी के बारे में कोई न कोई 'बुरी खबर' आ ही जाती है। कभी-कभी तो लगता है कि व्यापमं घोटाला नहीं किसी 'हॉरर' फिल्म सरीखा है। जिसमें भूत कब, कहां और कित्तों की जान लेगा, कुछ पता नहीं चलता। एक झटके में किसी की भी 'मौत' हो जाती है मगर यह कोई नहीं जानता कि किसने की? सीबीआइ से लेकर एसआइटी तक के हाथ फिलहाल 'खाली' हैं। नेता लोगों ने आड़े-तिरछे बयान दे-देकर मामले को और 'संगीन' टाइप बना दिया है।

यों, अपने देश में हमनें इत्ते टाइप के बड़े से बड़े घपले-घोटाले देखे हैं मगर किसी में सीधे-सीधे किसी ने किसी की जान लेने की कोशिश नहीं की। घोटालों की पैरवी करते-करते अपराधी लोग या तो खुद ही खर्च हो लिए या फिर अंदर हो गए। मगर व्यापमं एक ऐसा घोटाला बन गया है, जिसमें असली अपराधी तो छोड़िए नकली तक का मिल पाना मुश्किल जान पड़ रहा है। सब मिलकर, अपने-अपने तरीके से, अंधेरे में तीर छोड़े चले जा रहे हैं। न निशाना ठीक बैठ पा रहा है, न ही तुक्का।

व्यापमं घोटाले का स्वभाव 'खूनी' बन गया है। जो इसके कने जाता है, निपटकर ही बाहर निकलता है। ऐसा घोटाला भी भला किस काम का जिसमें लोगों की जान से खेला जाए। अब तलक हुईं चालीस से ऊपर मौतों ने घोटाले के चरित्र पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सही है कि घोटाले का चरित्र 'करप्ट' होता है मगर खूनी होने के परिणाम संभवता पहली दफा देखने को मिल रहे हैं।

देश और समाज के बीच व्यापमं का खौफ गब्बर सिंह जैसा बना हुआ है। गांव-देहात में जब बच्चा रोता था, तो मां कहती थी, चुप हो जा वरना गब्बर आ जाएगा। अब मां रोते हुए बच्चे से कहती है, चुप हो जाना वरना व्यापमं आ जाएगा। मैं खुद रात को हनुमान चालिसा पढ़कर सोता हूं, कहीं व्यापमं न आ जाए। फिलहाल, हनुमानजी मुझ पर 'कृपा-दृष्टि' बनाए हुए हैं।

सच बोला है किसी ने कि बाजी पलटते देर नहीं लगती। जो बीजेपी कल तलक मनमोहनजी को घोटालों पर 'चुप्पी' साधे रखने के लिए ताने मारा करती थी, आज उसी की सरकार के प्रधानमंत्रीजी की बोलती व्यापमं पर बंद है। 'सेल्फी विद डॉटर' से लेकर 'डिजिटल इंडिया' तक की बातें तो खूब हो रही हैं किंतु व्यापमं पर मौन तारी है। कहीं यह 'होड़' तो नहीं- 'मेरा मौन तेरे मौन से कमतर नहीं'- टाइप। प्रधानमंत्रीजी जब इत्ता सारा-सारा बोल लेते हैं फिर व्यापमं पर भी बोलना चाहिए न। ताकि देश और जनता 'पार्टी विद डिफरेंस' का असर भी देख-समझ सके। है कि नहीं...।

मौन में अक्सर 'गूढ़ रहस्य' छिपा लिए जाते हैं। कहीं ये व्यापमं से जुड़े उन्हीं गूढ़ रहस्यों को छिपाने की कवायद तो नहीं। 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' कि तर्ज पर 'मौन रहूंगा, मौन ही रहने दूंगा।'

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