बुधवार, 8 जुलाई 2015

महामंदी की आशंका, हालत हुई खस्ता

जब से रघुराम राजनजी का 'महामंदी' वाला बयान पढ़ा है, अपनी तो हालत 'खस्ता' से भी 'गई-बीती' हो गई है। मंदी का नाम सुनते ही दिमाग की सारी नसें जकड़ गई हैं। न कुछ ढंग का सोच में आ पा रहा है, न समझ में। रह-रहकर 2008 वाली मंदी के सपने डराए जा रहे हैं। 2008 की मंदी में मुझ सहित जाने कित्तों ने क्या-क्या और कैसे-कैसे 'कष्ट' झेले थे अगर लिखने बैठें तो पूरा 'उपन्यास' ही तैयार हो जाएगा। मगर अपने निजी व पेशागत 'कड़वे अनुभवों' को लिखना यों भी इत्ता आसान नहीं होता पियारे। तसलीमा नसरीन और खुशवंत सिंह जित्ता 'जिगर' चाहिए होता है।

बताते हैं, 1930 की महामंदी ने पूरे विश्व के टांके पूरे एक दशक तक ढीले रखे थे। जाने कित्ते ही बैंक बर्बाद हो लिए थे। जाने कित्ते ही निवेशक राम को प्यारे हो लिए थे। स्टॉक मार्केट का तो भट्टा ही बैठ गया था। मार्केट ने एक ही दिन में इत्ता तगड़ा गोता लगाया था कि सब तरफ त्राहिमाम-त्राहिमाम मच गया था। विश्व ने कैसे उस महामंदी को झेला होगा, सोचकर ही दस्त होना शुरू हो लेते हैं अपने तो।

खूब याद है। न भूला हूं रत्तीभर भी 2008 की मंदी की मार को। शुरूआत स्टॉक मार्केट के भर-भराकर लुढ़कने से हुई थी। देखते ही देखते मार्केट और इनवेस्टर्स की वाट लग गई थी। उधर मार्केट में सर्किट पर सर्किट लगे जा रहे थे, इधर इनवेस्टर का दिल बैठे जा रहा था। दिल बैठने के चक्कर में न जाने कित्ते खर्च भी हो लिए थे।

बाद में मंदी ने जो अपना 'रौद्र' रूप दिखाया फिर तो यहां-वहां से हर रोज यही खबरें आती रहती थीं कि फलां कंपनी ने इत्ते एम्लाइ को निपटा दिया, फलां ने इत्ते। हालत यह हो गई थी कि सुबह दफ्तर जाने का तो पता रहता था पर शाम तलक सही-सलामत लौटने का नहीं। क्या पता कब टका सा जवाब मिल जाए- 'न जी कल से आप दफ्तर न आएं। घर पर ही आराम फरमाएं।'

सरकार की हालत कौन-सी भली-चंगी थी। राहत पर राहत पैकेज दे देकर कंपनियों की इज्जत बचा रही थी। हां, उस दौरान धरती पर अगर कोई सुखी था, तो वो नेता लोग ही थे। दुनिया की हर मंदी से बेफिक्र, मस्ती के साथ चैन की काट रहे थे। मंदी को छोड़िए, नेता लोग वैसे भी कौन से ज्यादा फिकरमंद रहते हैं सिवाय चुनावों में अपनी जीत-हार के।

तब से अब तक जैसे-तैसे मंदी की मार से थोड़ा-बहुत पार पाए हैं कि रघुराम राजनजी ने पुनः महामंदी की आशंका से डरा दिया है। सबसे बड़ा डर तो स्टॉक मार्केट के सेंसेक्स से लग रहा है। वो तो इत्ता संवेदी होता है कि विश्व में कहीं किसी को जरा-सी छींक भी आए तो चिंता के मारे लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। फिर महामंदी की आशंका... खुदा खैर करे। सेंसेक्स का हिसाब तो 'हम तो डूबेंगे सनम, साथ में तुम्हें भी ले डूबेंगे' जैसा होता है।

मंदी को अगर आना है, तो आकर रहेगी। उसे न राजन साहब रोक सकते हैं, न सरकार, न वित्तमंत्री। मंदी बड़ी 'बौड़म' होती है। कब किसके साथ क्या कर दे, कोई नहीं जानता।

पियारे अपनी सलाह तो यही है कि अपने पिछवाड़े और अपना दिल मजबूत रखो। ताकि हर तरह की मंदी से सीना चौड़ा कर निपटा जा सके। सरकार और नेता लोगों का क्या है, ऐन टाइम पर अपने-अपने हाथ खड़े कर देंगे, जैसे पिछले दिनों किसानों की आत्महत्या पर कर दिए थे। बिचारे किसान... फसल तो बर्बाद हुई ही, खुद भी बर्बाद हो लिए। सौ बात की एक बात- न सगी मंदी होती है, न सरकार, न नेता।

फिलहाल, अब से अपने छोटे-मोटे खरचे सब बंद। जो जरूरी है, केवल वही करेंगे। महंगी न पीकर सस्ती पीएंगे। महंगे साबुन से न नहाकर सस्ते वाले से नहाएंगे। महंगे रेस्त्रां में न जाकर ढाबे पर जाएंगे। ब्रांडेड कपड़े न पहनकर फड़-ठेले से खरीदकर पहनेंगे। स्मार्टफोन की जगह लैंड-लाइन का प्रयोग करेंगे। वाट्सऐप की जगह चिट्ठी-पत्री लिखा करेंगे। जो-जो एडजस्टमेंट हो सकेगा, सब करेंगे। खुद पर कंट्रोल करने से ही बात बनेगी।

फिर भी, ऊपर वाले से यही प्रार्थना रहा हूं कि रघुराम राजनजी की आशंका आशंका ही बनी रहे 'हकीकत' में न तब्दील हो।

2 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

मुफ्त की सलाह का मजा कहाँ फिर भी चलिये मान लेते हैं ।

Kajal Kumar ने कहा…

रघुराम राजनश्री अगर राजनीति‍ में होते तो इतना खरा खरा बोल कर तो अपनी पार्टी की लुटि‍या ही डुबो देते