बुधवार, 29 जुलाई 2015

मोहल्ले के डिजिटल भिखारी

यह बताने वाली बात है इसीलिए बता रहा हूं। ज्ञानी भी कह गए हैं कि हर जरूरी बात दुनिया को अवश्य बतानी चाहिए ताकि दूसरे लोग 'प्रेरणा' ले सकें।

तो सुनिए..., मेरे मोहल्ले के भिखारी 'डिजिटल' हो गए हैं। जी हां, डिजिटल...। खुद को डिजिटल करने की 'प्रेरणा' उन्होंने मोदीजी के 'डिजिटल इंडिया मिशन' से ली है। मोहल्ले का कोई भी भिखारी अब हाथ में कटोरा लिए नहीं बल्कि टैब या स्मार्टफोन लिए दिखता है। भीख बेचारगी के साथ नहीं बल्कि पूरी ठसक के साथ मांगता है। भिखारियों ने अपना एक 'एप' भी बना लिया है। जिससे भीख मांगते हैं, उसे उस एप का लिंक सेंड कर देते हैं। ताकि भीख का पैसा सीधा अपने खाते में ले सकें और साथ-साथ एप का एडवरटाजमेंट भी हो जाए। जित्ता ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास एप का लिंक जाएगा, उत्ता ही उनकी भीख का स्तर बढ़ेगा।

कहने का मतलब है कि डिजिटल इंडिया ने मोहल्ले के भिखारियों को 'हाई-टेक' साथ-साथ घणा स्मार्ट भी बना दिया है। कुछ भिखारियों ने तो पारंपरिक ड्रेस झोले और मैले-कुचेले कपड़े की जगह जींस-शर्ट धारण कर ली है। झोले की जगह एक बेहतरीन-सा बैग ले लिया है, जिसमें वे अपना टैब या लेपटॉप रखते हैं। मजे की बात यह है कि वे अपने कपड़े और ऐस्सरीज भी अब ऑन-लाइन ही मंगवाने लगे हैं।

भिखारियों के पास अब छुट्टे नोट-पैसे नहीं मिलते। एक-दो या पांच का सिक्का देखकर ऐसे मुंह बनाते हैं मानो उनके हाथ में करेला रख दिया हो। मोहल्ले का कोई भी भिखारी सौ या पांच सौ से नीचे मांगता ही नहीं। आदमी का स्टैंडर्ड देखकर उससे उस स्तर की भीख मांगते हैं। भिखारियों ने बकायदा अपना एक नेटवर्किंग सेल भी बनाया हुआ है, जहां से उनके बंदे हर भिखारी पर नजर रखते हैं। उसे मिलने वाली भीख का हिसाब-किताब रखा जाता है। जहां जिसके भी हिसाब-किताब में गड़बड़ी मिलती है, उसके एकाउंट को तुरंत सीज कर दिया जाता है। उनका कहना है कि भीख के ट्रांजेक्शन में ट्रांसपेरेंसी होनी चाहिए। ताकि लोगों का भीख और भिखारियों पर विश्वास और पुख्ता हो सके।

मुझे लगता है, मोदीजी के डिजिटल इंडिया कॉस्पेट को भारत में अगर किसी ने बहुत तेजी से अपनाया व विकसित किया तो वे भिखारी ही हैं। देखिए न, ऑन-लाइन भीख से लेकर कटोरे की जगह टैब या स्मार्टफोन का आ जाना, डिजिटलाजेशन का ही तो कमाल है। वरना, खुद सरकारी दफ्तर अभी कित्ते और कहां तलक डिजिटल हुए हैं, शायद बतलाने की ज्यादा जरूरत नहीं। अपवादों को छोड़कर, ज्यादातर अब भी वही पुराने-दुराने ठर्रे पर चल रहे हैं। फाइलों-रजिस्टरों से बाहर निकल ही नहीं पाए हैं। बाबू लोगों के हाथों में स्मार्टफोन आ जरूर गए हैं, पर वे ज्यादातर उसका इस्तेमाल मूवी देखने या वाट्सएप चलाने में ही करते हैं। इससे और भी बहुत कुछ हो सकता है, मालूम होने के बाद भी, अनजान बने रहना ही पसंद करते हैं।

पर शाबाश है मेरे मोहल्ले की भिखारी बिरादरी को, जिसने इत्ती जल्दी खुद को डिजिटल कर दिखाया। सुनने में आया है कि दूसरे बड़े शहरो के भिखारी भी अब मेरे मोहल्ले के भिखारियों से डिजिटल तकनीक के बाबत मदद मांगने लगे हैं। कुछ तो ट्रेनिंग को भी आ चुके हैं।

डिजिटल इंडिया के बहाने की सही, यह क्या कम बड़ी बात है कि भिखारियों के दामन पर लगा बेचारगी का दाग धीरे-धीरे कर हट रहा है। भिखारी लोग भी तकनीक की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं।

भिखारियों की देखा-दाखी मेरे मोहल्ले के राममूर्ति चाचा ने भी अपनी डेयरी को धीरे-धीरे डिजिटल करना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों मिले तो बतला रहे थे कि वे भी अब ऑन-लाइन दूध बचने की जुगाड़ में लगे हैं। अपनी गाय-भैंसों का डिजिटलाइजेशन कर ही रहे हैं। फिर डिजिटल तकनीक के माध्यम से ही उनका दूध निकाला व बंटवाया जाएगा।

मुझे पक्की उम्मीद है कि धीरे-धीरे कर हमारे देश के शोषित व वंचित लोग भी डिजिटल होकर अपने हक की लड़ाई डिजिटली ही लड़ा करेंगे। जय हो मोदीजी के डिजिटल इंडिया मिशन की।

2 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…
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Kavita Rawat ने कहा…

बहुत खूब! हाईटेक देख लगता है वह दिन अब दूर नहीं जब भिखारियों के साथ सेल्फ़ी लेने के लिए लोग कतारबद्ध नज़र आयेगे ..