बुधवार, 1 जुलाई 2015

ग्रीस संकट और चिंताएं

संकट ग्रीस पर आया है, चिंताएं हमारी बढ़ गई हैं। कथित चिंताओं और चिंता के मामले में हम कुछ ज्यादा ही 'सजग' रहते हैं। हाल यह है, अगर हमारे पड़ोसी को भी जरा-सी छींक आ जाए तो हम चिंतित हो जाते हैं। चिंतित भी ऐसे होते हैं कि बिचारे को किस्म-किस्म की सलाहें दे-देकर 'अधमरा' कर देते हैं। बंदा अपनी चिंता से पहले ही परेशान होता है, ऊपर से हमारे चिंता करने के ढंग पर और चिंतित हो जाता है।

हमारे तईं ग्रीस संकट भी कुछ ऐसा ही चिंता का विषय है। तब ही तो, जब से ग्रीस संकट की खबर फैली है, हमारे शेयर बाजार धम्म से बेदम हो गए हैं। एक ही दिन में पांच सौ प्वांइट का गोता लगा आए। हालांकि शाम होते-होते थोड़ा 'संभल' गए। पर खुद को चिंताग्रस्त तो कर ही लिया न। ऊपर से 'कुर्बान' जाऊं कथित बिजनेस चैनलों का जिन पर आने वाले महा-पंडित और महा-ज्ञानी लोग- ग्रीस संकट के खौफ में- शेयर बाजार को खुलने से पहले ही गिरा डालते हैं। वहां जित्ते मुंह होते हैं, उत्ती बातें होती हैं। एक तो बंदा पहले ही शेयर बाजार की खस्ता हालत से दुखी होता है, ऊपर से ज्ञान बघारने वाले उसकी सिट्टी-पिट्टी और गुम कर देते हैं।

अभी कल की तो बात थी, जब राघुराम राजन साहब ने 'संभावित महामंदी' की आशंका से हमें चेताया था। उसके अगले ही दिन ग्रीस संकट ने आग में और घी छिड़क दिया। अब आप ही बताएं कि ऐसे में दिल जले न तो और क्या करे? अभी 2008 की मंदी से ढंग से पार पाए नहीं थे कि अब 'महामंदी' का खतरा। महामंदी की भविष्यवाणी और ग्रीस संकट के तोते ने न केवल सरकार बल्कि निवेशकों के होश भी फाखता कर दिए हैं।

अच्छा हम भी खूब हैं, जरा-जरा सी बातों में हाथ-पैर छोड़ बैठते हैं। अमां, संकट ग्रीस में आया है। दिवालिया वहां के बैंक और अर्थव्यवस्था हो रही है। तो फिर हम क्यों 'बेगानी बर्बादी में खुद बर्बाद' हुए जा रहे हैं। जैसे- एक होड़-सी लगी हुई है कि अगर दुनिया भर के शेयर बाजार गिरे हैं, तो हम भी गिरेंगे। दरअसल, शेयर बाजारों का हाल कुछ यों होता है- गिरने के मामले में 'हम साथ-साथ हैं' और बढ़ने के मामले में 'हम आपके हैं कौन'। इस रस्साकशी में मारा बिचारा निवेशक जाता है। हालत ग्रीस के बाजार की पतली है, दुबलापन हम पर चढ़ने लगा है।

हर वक्त 'नकारात्मकता' में पड़े रहना भी ठीक नहीं। ग्रीस संकट के नुकसान जो हैं सो हैं पर कुछ फायदे भी हैं। ग्रीस संकट के कारण कच्चे तेल (क्रूड) की कीमतों में गिरावट के चलते पेट्रोलियम उत्पाद सस्ते हो सकते हैं। महंगाई दर में कमी आ सकती है। ब्याज दरें कम हो सकती हैं। इत्ता सब तो संकट होने के बावजूद मिल सकता है, और क्या चाहिए? फिर आरबीआइ और सरकार 'निगाह' बनाए हुए हैं न। तिस पर भी अगर कोई चिंता पर चिंता बढ़ाना चाहे तो उसे 'बेवकूफ' ही कहा जाएगा। माना कि दूसरे की चिंता में साथ देना चाहिए, लेकिन इत्ता भी नहीं कि खुद पर ही चिंताएं ओढ़ ली जाएं।

संकट चाहे ग्रीस का हो या शेयर बाजार का इससे तो कैसे भी पार पाया जा सकता है लेकिन बेवजह अपनी खोपड़ी को ओखली में देने वाली मानसिकता से कभी कोई पार नहीं पा सकता। जैसे-तैसे हमारा शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था थोड़ा पटरी पर आई है, हम फिर से आमादा हो लिए हैं, उसे 'ढहाने' में।

अमां, चिंताएं छोड़ो। ग्रीस का संकट ग्रीस को देखने दो। बस अपनी 'बैक' मजबूत रखो ताकि ग्रीस जैसे संकट हमें 'ग्रीस' न लगा सकें। 

1 टिप्पणी:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

अच्छे दिनों में चिंता का क्या काम ? राम राम ।