बुधवार, 29 जुलाई 2015

मोहल्ले के डिजिटल भिखारी

यह बताने वाली बात है इसीलिए बता रहा हूं। ज्ञानी भी कह गए हैं कि हर जरूरी बात दुनिया को अवश्य बतानी चाहिए ताकि दूसरे लोग 'प्रेरणा' ले सकें।

तो सुनिए..., मेरे मोहल्ले के भिखारी 'डिजिटल' हो गए हैं। जी हां, डिजिटल...। खुद को डिजिटल करने की 'प्रेरणा' उन्होंने मोदीजी के 'डिजिटल इंडिया मिशन' से ली है। मोहल्ले का कोई भी भिखारी अब हाथ में कटोरा लिए नहीं बल्कि टैब या स्मार्टफोन लिए दिखता है। भीख बेचारगी के साथ नहीं बल्कि पूरी ठसक के साथ मांगता है। भिखारियों ने अपना एक 'एप' भी बना लिया है। जिससे भीख मांगते हैं, उसे उस एप का लिंक सेंड कर देते हैं। ताकि भीख का पैसा सीधा अपने खाते में ले सकें और साथ-साथ एप का एडवरटाजमेंट भी हो जाए। जित्ता ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास एप का लिंक जाएगा, उत्ता ही उनकी भीख का स्तर बढ़ेगा।

कहने का मतलब है कि डिजिटल इंडिया ने मोहल्ले के भिखारियों को 'हाई-टेक' साथ-साथ घणा स्मार्ट भी बना दिया है। कुछ भिखारियों ने तो पारंपरिक ड्रेस झोले और मैले-कुचेले कपड़े की जगह जींस-शर्ट धारण कर ली है। झोले की जगह एक बेहतरीन-सा बैग ले लिया है, जिसमें वे अपना टैब या लेपटॉप रखते हैं। मजे की बात यह है कि वे अपने कपड़े और ऐस्सरीज भी अब ऑन-लाइन ही मंगवाने लगे हैं।

भिखारियों के पास अब छुट्टे नोट-पैसे नहीं मिलते। एक-दो या पांच का सिक्का देखकर ऐसे मुंह बनाते हैं मानो उनके हाथ में करेला रख दिया हो। मोहल्ले का कोई भी भिखारी सौ या पांच सौ से नीचे मांगता ही नहीं। आदमी का स्टैंडर्ड देखकर उससे उस स्तर की भीख मांगते हैं। भिखारियों ने बकायदा अपना एक नेटवर्किंग सेल भी बनाया हुआ है, जहां से उनके बंदे हर भिखारी पर नजर रखते हैं। उसे मिलने वाली भीख का हिसाब-किताब रखा जाता है। जहां जिसके भी हिसाब-किताब में गड़बड़ी मिलती है, उसके एकाउंट को तुरंत सीज कर दिया जाता है। उनका कहना है कि भीख के ट्रांजेक्शन में ट्रांसपेरेंसी होनी चाहिए। ताकि लोगों का भीख और भिखारियों पर विश्वास और पुख्ता हो सके।

मुझे लगता है, मोदीजी के डिजिटल इंडिया कॉस्पेट को भारत में अगर किसी ने बहुत तेजी से अपनाया व विकसित किया तो वे भिखारी ही हैं। देखिए न, ऑन-लाइन भीख से लेकर कटोरे की जगह टैब या स्मार्टफोन का आ जाना, डिजिटलाजेशन का ही तो कमाल है। वरना, खुद सरकारी दफ्तर अभी कित्ते और कहां तलक डिजिटल हुए हैं, शायद बतलाने की ज्यादा जरूरत नहीं। अपवादों को छोड़कर, ज्यादातर अब भी वही पुराने-दुराने ठर्रे पर चल रहे हैं। फाइलों-रजिस्टरों से बाहर निकल ही नहीं पाए हैं। बाबू लोगों के हाथों में स्मार्टफोन आ जरूर गए हैं, पर वे ज्यादातर उसका इस्तेमाल मूवी देखने या वाट्सएप चलाने में ही करते हैं। इससे और भी बहुत कुछ हो सकता है, मालूम होने के बाद भी, अनजान बने रहना ही पसंद करते हैं।

पर शाबाश है मेरे मोहल्ले की भिखारी बिरादरी को, जिसने इत्ती जल्दी खुद को डिजिटल कर दिखाया। सुनने में आया है कि दूसरे बड़े शहरो के भिखारी भी अब मेरे मोहल्ले के भिखारियों से डिजिटल तकनीक के बाबत मदद मांगने लगे हैं। कुछ तो ट्रेनिंग को भी आ चुके हैं।

डिजिटल इंडिया के बहाने की सही, यह क्या कम बड़ी बात है कि भिखारियों के दामन पर लगा बेचारगी का दाग धीरे-धीरे कर हट रहा है। भिखारी लोग भी तकनीक की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं।

भिखारियों की देखा-दाखी मेरे मोहल्ले के राममूर्ति चाचा ने भी अपनी डेयरी को धीरे-धीरे डिजिटल करना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों मिले तो बतला रहे थे कि वे भी अब ऑन-लाइन दूध बचने की जुगाड़ में लगे हैं। अपनी गाय-भैंसों का डिजिटलाइजेशन कर ही रहे हैं। फिर डिजिटल तकनीक के माध्यम से ही उनका दूध निकाला व बंटवाया जाएगा।

मुझे पक्की उम्मीद है कि धीरे-धीरे कर हमारे देश के शोषित व वंचित लोग भी डिजिटल होकर अपने हक की लड़ाई डिजिटली ही लड़ा करेंगे। जय हो मोदीजी के डिजिटल इंडिया मिशन की।

रविवार, 26 जुलाई 2015

मोहल्ले के चेन-स्नेचर

जब से सोने के दाम में गिरावट आई है, मेरे मोहल्ले के चेन-स्नेचरों का दम ही निकल गया है। ठलुओं की तरह निठ्ठले घूम रहे हैं आजकल। अखबार भी चेन-स्नेचिंग की खबरों के बिना सूने-सूने से लगते हैं। जो पुलिस कभी चेन-स्नेचरों को पकड़ने में दिन भर अस्त-वयस्त-पस्त रहा करती थी, वो भी खाली हो गई है। चौराहे पर बनी चौकी में एकाध सिपाही ही रहता है, वो भी नाम करने को।

सोने के भाव गिरने से हालांकि बहुत से लोग (खासकर महिलाएं) खुश हैं, लेकिन ऐसी खुशी का क्या मतलब जो किसी की रोजी-रोटी छीन ले। चेन-स्नेचिंग चेन-स्नेचरों के लिए रोजी-रोटी समान है। माना कि उनका धंधा गंदा है, पर धंधा तो है। कम से कम वे काम पर तो लगे हुए हैं न। ठलुओं की तरह निठ्ठले तो नहीं टहल रहे यहां-वहां। दिन भर में दो-चार चेनों पर हाथ साफ करने का मतलब है, अच्छी-खासी मोटी कमाई। इस बहाने उनकी जेब और गर्लफ्रेंड का खरचा तो निकल ही रहा है। क्या बुरा है।

चेन-स्नेचिंग को मामूली काम न समझिए। इसमें चरित्र का पूरा रिस्क है। चेन खींचकर भाग लिए तो ठीक। अगर कहीं पकड़े गए तो मार-कुटाई के साथ-साथ जेल की यात्रा भी करनी पड़ सकती है। इस लाइन में केवल वही लोग आते हैं, जिनका दिल कठोर होता है। कमजोर दिल वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं। किसी की गर्दन पर हाथ साफ करना कोई छोटी बात थोड़े है। सोना जित्ता प्रिय पहनने वाले को है, उत्ता ही चेन-स्नेचर को भी। फिर भला कौन छोड़ना चाहेगा।

इधर सोने के भाव ने गिरकर सब गड़बड़ कर दी है। एकदम उलटा हो लिया है। जब सोने के भाव बढ़ रहे थे, तब मेरे मोहल्ले की महिलाएं जमकर सोना पहन रही थीं मगर जब से भाव गिरे हैं, सोना पहनना इत्ता कम कर दिया है कि बिचारे चेन-स्नेचरों के धंधे-पानी पर बन आई है। सोना पहन जरूर कम रही हैं, मगर खरीद खूब रहीं। खरीद इस उम्मीद में ज्यादा रही हैं, वापस इत्ते कम रेट मिले न मिले। उन पतियों के बारे में जब सोचता हूं तो मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है तो कित्ते टाइप के एडजस्टमेंट कर अपनी पत्नियों को सोना दिलवा रहे हैं। वाकई शबाश है उनको।

'अच्छे दिन' कब 'बुरे दिन' में परिवर्तित हो जाएं, कोई नहीं जानता। कल तलक जो लौंडे चेन-स्नेचिंग कर महंगी-महंगी गाड़ियों पर घुमा करते थे, शौक पूरे करने में कोई कोताही नहीं बरतते थे, गर्लफ्रेडों का खास ख्याल रखते थे, आज साइकिल और बीड़ी पर उतर आए हैं। जाने कित्तों की गर्लफ्रेडें उनको छोड़कर किसी और की हो ली हैं। वक्त और नसीब को पलटते देर ही कित्ती लगती है।

यों, किसी के धंधे का मंदा होना मुझसे देखा नहीं जाता। रोजी-रोटी सबकी चलनी चाहिए। चाहे वो बिजनेसमैन हो या चेन-स्नेचर। दुआ ही कर सकता हूं कि सोना फिर से अपने 'अच्छे दिनों' में लौट गए ताकि चेन-स्नेचरों के 'बुरे दिन' टल सकें।

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

ललित मोदी बनने का सपना

अब रात में मुझे 'रंगीन सपने' कम आने लगे हैं। रंगीन सपनों की जगह 'ललित मोदी के सपने' ने ले ली। रात को जब मैं सोता हूं, थोड़े देर बाद ही मुझे ललित मोदी बनने का सपना अपनी आगोश में ले लेता है। सपनों-सपनों में ही मैं ललित मोदी बनने का सपना देखने लगता हूं। हालांकि मैं जानता हूं वास्तविता के धरातल पर ललित मोदी बनना बहुत कठिन है लेकिन सपने का क्या करूं, जो मुझे रोज रात को ललित मोदी बनने के लिए 'उकसा' जाता है।

ललित मोदी होना इत्ता आसान नहीं। विरले ही होते होंगे, जो ललित मोदी टाइप बन पाते हैं। पूरे ललित मोदी फिर भी नहीं। ललित मोदी अपने आप में एक चलती-फिरती महान शख्सियत हैं। उनके जैसा दिमाग पाना, उनके जैसे ऊंचे राजनीतिक संबंध स्थापित करना, उनके जैसे क्रिकेट से लेकर सामाजिक कामों तक में खास रूतबा बनाकर रखना हर किसी के बस की बात नहीं। मात्र एक ललित मोदी ने देश-विदेश से लेकर, सरकार और मंत्री तक की अच्छे से बैंड बजा रखी है।

उनका मात्र एक ट्वीट ही सब पर भारी पड़ जाता है। पानी मांग जाते हैं अच्छे-अच्छे उनके ट्वीट बम पर। टि्वटर पर ट्रेंड करने वालों में सबसे टॉप पर ललित मोदी ही हैं। क्या अखबार, क्या टीवी चैनल, क्या सड़क, क्या दफ्तर, क्या राजनीतिक हलके हर जगह बस ललित मोदी ललित मोदी ही छाए हुए हैं। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि दुनिया में अगर ललित मोदी न होते तो इत्ते थोक के भाव में न खुलासे होते, न इत्ता भारी मनोरंजन ही हो पाता। ललित मोदी क्रिकेट से लेकर सियासत तक के हर गेम के 'मास्टर' हैं।

अब इत्ती ऊंची शख्सियत टाइप बनने का सपना देखना, बेशक मेरे तईं 'गर्व' का प्रतीक हो सकता है, बावजूद इसके मेरा ललित मोदी बनना कम से कम इस जन्म में तो संभव नहीं।

यों भी, सपने में देखी हर बात सच हो ही जाए, यह जरूरी तो नहीं। फिर भी, ससुरे सपने इंसान को सपना दिखाने से बाज नहीं आते। अभी कल ही की तो बात थी, जब मुझे सनी लियोनी का हजबैंड बनने के सपने आया करते थे। पूनम पांडे संग फिल्म करने के सपने आया करते थे। दाऊद इब्राहिम से बड़ा डॉन (भाई) बनने के सपने आया करते थे। बड़ा लेखक और बड़ा नेता बनने के सपने तो रोज-ब-रोज दिन में कित्ते ही आ जाते हैं।

मेरी तो जाने दीजिए, खुद कभी ललित मोदी ने सपने में नहीं सोचा होगा कि एक दिन वो ललित मोदी बन जाएंगे। लेकिन पियारे इंसान की किस्मत बदलते और बीवी का बेलन पड़ते दे ही कित्ती लगती है। ललित मोदी की मशहूरित को फोकस कर-करके मीडिया के साथ-साथ टि्वटर भी खूब मशहूर हो गया है। किसी और की क्या कहूं, मेरे मोहल्ले के न जाने कित्ते लौंडों ने टि्वटर पर अपना एकाउंट बना डाला है। उन्होंने भी भीतर यह खुशफहमी पाल ली है कि टि्वटर के रास्ते एक दिन उनके फॉलौअर्स की संख्या भी ललित मोदी जित्ती हो जाएगी!

ललित मोदी बनने का सपना आने वाली बात मैंने केवल आप लोगों से ही 'शेयर' की है, पत्नी को तो इस सपने की भनक तक नहीं लगने दी है। कहीं उसे मेरे इस सपने की खबर हो जाती न तो मेरा तो जीना ही हाराम हो जाता। वो तो हकीकत में ही मेरे पीछे पड़ जाती कि तुम्हें ललित मोदी बनना ही बनना है। हाई-प्रोफाइल बंदों की वो इत्ती दीवानी है कि उसने हमारे बेडरूम में ही उनकी तस्वीरें टांग रखी हैं। एक दफा मैंने उससे सलमान खान बनने की इच्छा जाहिर कर दी थी। तब की व्यक्त की गई इच्छा की कीमत आज तलक चुका रहा हूं।

सपने भी न कभी-कभी कबाड़ा कर डालते हैं। अभी पता नहीं कब तलक मुझे ललित मोदी बनने का सपना झेलना पड़ेगा। अभी मैं ढंग से लेखक तक तो बन पाया नहीं हूं, ऊपर से ललित मोदी बनने का सपना मेरी जान की ऐसी-तैसी किए हुए है। न जाने इत्ते बड़े-बड़े (भयंकर टाइप के) सपने मुझे ही क्यों आते हैं? ललित मोदी बनने का सपना भी उनमें से एक है। हाय...!

सोमवार, 13 जुलाई 2015

व्यापमं की व्यापकता

व्यापमं की व्यापकता दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जा रही है। हर रोज किसी न किसी के बारे में कोई न कोई 'बुरी खबर' आ ही जाती है। कभी-कभी तो लगता है कि व्यापमं घोटाला नहीं किसी 'हॉरर' फिल्म सरीखा है। जिसमें भूत कब, कहां और कित्तों की जान लेगा, कुछ पता नहीं चलता। एक झटके में किसी की भी 'मौत' हो जाती है मगर यह कोई नहीं जानता कि किसने की? सीबीआइ से लेकर एसआइटी तक के हाथ फिलहाल 'खाली' हैं। नेता लोगों ने आड़े-तिरछे बयान दे-देकर मामले को और 'संगीन' टाइप बना दिया है।

यों, अपने देश में हमनें इत्ते टाइप के बड़े से बड़े घपले-घोटाले देखे हैं मगर किसी में सीधे-सीधे किसी ने किसी की जान लेने की कोशिश नहीं की। घोटालों की पैरवी करते-करते अपराधी लोग या तो खुद ही खर्च हो लिए या फिर अंदर हो गए। मगर व्यापमं एक ऐसा घोटाला बन गया है, जिसमें असली अपराधी तो छोड़िए नकली तक का मिल पाना मुश्किल जान पड़ रहा है। सब मिलकर, अपने-अपने तरीके से, अंधेरे में तीर छोड़े चले जा रहे हैं। न निशाना ठीक बैठ पा रहा है, न ही तुक्का।

व्यापमं घोटाले का स्वभाव 'खूनी' बन गया है। जो इसके कने जाता है, निपटकर ही बाहर निकलता है। ऐसा घोटाला भी भला किस काम का जिसमें लोगों की जान से खेला जाए। अब तलक हुईं चालीस से ऊपर मौतों ने घोटाले के चरित्र पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सही है कि घोटाले का चरित्र 'करप्ट' होता है मगर खूनी होने के परिणाम संभवता पहली दफा देखने को मिल रहे हैं।

देश और समाज के बीच व्यापमं का खौफ गब्बर सिंह जैसा बना हुआ है। गांव-देहात में जब बच्चा रोता था, तो मां कहती थी, चुप हो जा वरना गब्बर आ जाएगा। अब मां रोते हुए बच्चे से कहती है, चुप हो जाना वरना व्यापमं आ जाएगा। मैं खुद रात को हनुमान चालिसा पढ़कर सोता हूं, कहीं व्यापमं न आ जाए। फिलहाल, हनुमानजी मुझ पर 'कृपा-दृष्टि' बनाए हुए हैं।

सच बोला है किसी ने कि बाजी पलटते देर नहीं लगती। जो बीजेपी कल तलक मनमोहनजी को घोटालों पर 'चुप्पी' साधे रखने के लिए ताने मारा करती थी, आज उसी की सरकार के प्रधानमंत्रीजी की बोलती व्यापमं पर बंद है। 'सेल्फी विद डॉटर' से लेकर 'डिजिटल इंडिया' तक की बातें तो खूब हो रही हैं किंतु व्यापमं पर मौन तारी है। कहीं यह 'होड़' तो नहीं- 'मेरा मौन तेरे मौन से कमतर नहीं'- टाइप। प्रधानमंत्रीजी जब इत्ता सारा-सारा बोल लेते हैं फिर व्यापमं पर भी बोलना चाहिए न। ताकि देश और जनता 'पार्टी विद डिफरेंस' का असर भी देख-समझ सके। है कि नहीं...।

मौन में अक्सर 'गूढ़ रहस्य' छिपा लिए जाते हैं। कहीं ये व्यापमं से जुड़े उन्हीं गूढ़ रहस्यों को छिपाने की कवायद तो नहीं। 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' कि तर्ज पर 'मौन रहूंगा, मौन ही रहने दूंगा।'

नेता और घोटाले

राजनीति और नेता बरसों से एक-दूसरे के 'पूरक' रहे हैं। राजनीति की गाड़ी नेता के बिना, नेता की राजनीति के बिना चल ही नहीं सकती। दोनों एक ही गाड़ी में सवार होकर लंबा सफर तय करते हैं। बिना संघर्ष के राजनीति हो नहीं सकती और हमारे देश के नेता लोग राजनीति के वास्ते संघर्ष करने में न कभी पीछे रहे हैं, न रहेंगे। नेता का राजनीति से 'रोटी-बेटी' जैसा नाता जो है।

नेता और राजनीति के समानांतर भी कुछ चीजें साथ-साथ चलती रहती हैं। साथ-साथ चलने वाली चीजों में यों तो बहुत-सी हैं मगर कुछ सालों से जो भयंकर रूप से दोनों के साथ चल रही है, वो है- 'घपले-घोटाले'। गौरतलब है कि राजनीति में नेता की संलिप्ता जनता से कहीं अधिक घोटालों के साथ बढ़ रही है। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसी न किसी नेता का खाता घोटालों के बैंक में खुला ही है। नेता लोग राजनीति से कहीं ज्यादा ध्यान घपलों-घोटालों पर देने लगे हैं। या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि नेताओं ने घोटालों को राजनीति का प्रमुख अंग बना लिया है। जिस नेता का जित्ता बड़ा कद, उसका घोटला भी उत्ता ही बड़ा।

कमाल यह है कि नेता बनते वक्त जो नेता भ्रष्टाचार व घोटालों से दूर रहकर जनता की सेवा करने की 'शपथ' लेता है, अंततः कूदता उसी खाई में है, जहां से बाहर आने का कोई 'चांस' नहीं होता। जनता की याद नेता को पांच साल में एक बार चुनावों के दौरान वोट मांगने के लिए ही आती है। बाकी साल वो जनता के वोट पर 'ऐश' कर अपनी व अपने चाहने वालों की 'नैया' पार लगाता रहता है। कभी-कभी तो लगता है कि हमारे देश के नेता लोग वोट 'जन-हित' के वास्ते नहीं केवल राजनीति और घोटाले करने के लिए ही लेते हैं।

मैंने नेताओं के चेहरों पर चिंता और माथे पर शिकन वोट मांगने और चुनाव लड़ने के दौरान तो खूब देखी है लेकिन यह तब गायब होती है, जब किसी नेता का नाम किसी घोटाले से जुड़ता है या घोटाले के कारण वो अंदर जाता है। घोटाले करना शायद हमारे देश के नेताओं के लिए बहुत सामान्य-सी बात हो गई है। उन्हें यह अच्छे से मालूम है कि हमारे यहां घपलों-घोटालों पर थोड़ दिन तो खूब हो-हल्ला कटता है फिर धीरे-धीरे कर सब सामान्य हो जाता है। जनता सब भूल-भाल कर अपने-अपने काम-धंधे में लग जाती है और मीडिया अन्य ब्रेंकिग न्यूज में बिजी हो जाता है।

इसीलिए नेता लोग अपनी-अपनी दालें घोटालों के बीच गलाते रहते हैं। जिसकी दाल गल जाती है, वो राजा हो जाता है। जिसकी नहीं गल पाती, वो दूसरे की सूखाने में लग जाता है।

आजकल तो हर तरफ बस व्याप्मं घोटाले के ही चर्चे हैं। मीडिया से लेकर सोशल नेटवर्किंग तक पर व्याप्मं ही व्याप्मं व्याप्त है। व्याप्मं का विस्तार इत्ता हो लिया है कि इसके सिरे ढूंढना ही मुश्किल हो जाता जा रहा है। व्याप्मं में जिस प्रकार एक बाद एक मौतों के मामले सामने आ रहे हैं, लोग बाग अब इसे 'खूनी-घोटाले' की संज्ञा देने लगे हैं। जिस-जिस के तार व्याप्मं से जुड़े मिल रहे हैं, वो-वो एक-एक कर बीच में से निपटता जा रहा है। मांएं अब अपने बच्चों को 'गब्बर' का नहीं 'व्याप्मं' का नाम लेकर डराकर चुप कराने लगी हैं।

देश और राजनीति के इतिहास में व्याप्मं संभवता ऐसा पहला घोटाला होगा, जिसके हाथ इत्ती मौतों से रंगे हैं। एकदम किसी हॉरर या थ्रिलर फिल्म की माफिक। कि, कौन-कब-कहां एक-एक कर संलिप्त लोगों को निपटाता चला जा रहा है।

चलो व्याप्मं के बहाने लगभग खाली बैठे विपक्ष के हाथ बड़ा और तगड़ा मुद्दा आ गया है, सरकार के खिलाफ जमकर बोलने व नारेबाजी करने का। विपक्ष न जाने कित्तों के इस्तीफों की मांग कर चुका है मगर दिया अब तलक किसी ने भी नहीं है। ललित मोदी मामले में किसने दिया था, जो व्याप्मं में दे देंगे! इत्ती मेहनत से पाई कुर्सी को नेता यों ही थोड़े न जाने देगा पियारे।

व्याप्मं घोटाले की व्याप्कता को देखकर बस यही ख्याल बार-बार मन में आता है कि राजनीति के साथ-साथ घोटाले भी अब नेताओं के चेले-चपाटे होते जा रहे हैं, जब और जहां चाहो काम में ले लो। 

बुधवार, 8 जुलाई 2015

महामंदी की आशंका, हालत हुई खस्ता

जब से रघुराम राजनजी का 'महामंदी' वाला बयान पढ़ा है, अपनी तो हालत 'खस्ता' से भी 'गई-बीती' हो गई है। मंदी का नाम सुनते ही दिमाग की सारी नसें जकड़ गई हैं। न कुछ ढंग का सोच में आ पा रहा है, न समझ में। रह-रहकर 2008 वाली मंदी के सपने डराए जा रहे हैं। 2008 की मंदी में मुझ सहित जाने कित्तों ने क्या-क्या और कैसे-कैसे 'कष्ट' झेले थे अगर लिखने बैठें तो पूरा 'उपन्यास' ही तैयार हो जाएगा। मगर अपने निजी व पेशागत 'कड़वे अनुभवों' को लिखना यों भी इत्ता आसान नहीं होता पियारे। तसलीमा नसरीन और खुशवंत सिंह जित्ता 'जिगर' चाहिए होता है।

बताते हैं, 1930 की महामंदी ने पूरे विश्व के टांके पूरे एक दशक तक ढीले रखे थे। जाने कित्ते ही बैंक बर्बाद हो लिए थे। जाने कित्ते ही निवेशक राम को प्यारे हो लिए थे। स्टॉक मार्केट का तो भट्टा ही बैठ गया था। मार्केट ने एक ही दिन में इत्ता तगड़ा गोता लगाया था कि सब तरफ त्राहिमाम-त्राहिमाम मच गया था। विश्व ने कैसे उस महामंदी को झेला होगा, सोचकर ही दस्त होना शुरू हो लेते हैं अपने तो।

खूब याद है। न भूला हूं रत्तीभर भी 2008 की मंदी की मार को। शुरूआत स्टॉक मार्केट के भर-भराकर लुढ़कने से हुई थी। देखते ही देखते मार्केट और इनवेस्टर्स की वाट लग गई थी। उधर मार्केट में सर्किट पर सर्किट लगे जा रहे थे, इधर इनवेस्टर का दिल बैठे जा रहा था। दिल बैठने के चक्कर में न जाने कित्ते खर्च भी हो लिए थे।

बाद में मंदी ने जो अपना 'रौद्र' रूप दिखाया फिर तो यहां-वहां से हर रोज यही खबरें आती रहती थीं कि फलां कंपनी ने इत्ते एम्लाइ को निपटा दिया, फलां ने इत्ते। हालत यह हो गई थी कि सुबह दफ्तर जाने का तो पता रहता था पर शाम तलक सही-सलामत लौटने का नहीं। क्या पता कब टका सा जवाब मिल जाए- 'न जी कल से आप दफ्तर न आएं। घर पर ही आराम फरमाएं।'

सरकार की हालत कौन-सी भली-चंगी थी। राहत पर राहत पैकेज दे देकर कंपनियों की इज्जत बचा रही थी। हां, उस दौरान धरती पर अगर कोई सुखी था, तो वो नेता लोग ही थे। दुनिया की हर मंदी से बेफिक्र, मस्ती के साथ चैन की काट रहे थे। मंदी को छोड़िए, नेता लोग वैसे भी कौन से ज्यादा फिकरमंद रहते हैं सिवाय चुनावों में अपनी जीत-हार के।

तब से अब तक जैसे-तैसे मंदी की मार से थोड़ा-बहुत पार पाए हैं कि रघुराम राजनजी ने पुनः महामंदी की आशंका से डरा दिया है। सबसे बड़ा डर तो स्टॉक मार्केट के सेंसेक्स से लग रहा है। वो तो इत्ता संवेदी होता है कि विश्व में कहीं किसी को जरा-सी छींक भी आए तो चिंता के मारे लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। फिर महामंदी की आशंका... खुदा खैर करे। सेंसेक्स का हिसाब तो 'हम तो डूबेंगे सनम, साथ में तुम्हें भी ले डूबेंगे' जैसा होता है।

मंदी को अगर आना है, तो आकर रहेगी। उसे न राजन साहब रोक सकते हैं, न सरकार, न वित्तमंत्री। मंदी बड़ी 'बौड़म' होती है। कब किसके साथ क्या कर दे, कोई नहीं जानता।

पियारे अपनी सलाह तो यही है कि अपने पिछवाड़े और अपना दिल मजबूत रखो। ताकि हर तरह की मंदी से सीना चौड़ा कर निपटा जा सके। सरकार और नेता लोगों का क्या है, ऐन टाइम पर अपने-अपने हाथ खड़े कर देंगे, जैसे पिछले दिनों किसानों की आत्महत्या पर कर दिए थे। बिचारे किसान... फसल तो बर्बाद हुई ही, खुद भी बर्बाद हो लिए। सौ बात की एक बात- न सगी मंदी होती है, न सरकार, न नेता।

फिलहाल, अब से अपने छोटे-मोटे खरचे सब बंद। जो जरूरी है, केवल वही करेंगे। महंगी न पीकर सस्ती पीएंगे। महंगे साबुन से न नहाकर सस्ते वाले से नहाएंगे। महंगे रेस्त्रां में न जाकर ढाबे पर जाएंगे। ब्रांडेड कपड़े न पहनकर फड़-ठेले से खरीदकर पहनेंगे। स्मार्टफोन की जगह लैंड-लाइन का प्रयोग करेंगे। वाट्सऐप की जगह चिट्ठी-पत्री लिखा करेंगे। जो-जो एडजस्टमेंट हो सकेगा, सब करेंगे। खुद पर कंट्रोल करने से ही बात बनेगी।

फिर भी, ऊपर वाले से यही प्रार्थना रहा हूं कि रघुराम राजनजी की आशंका आशंका ही बनी रहे 'हकीकत' में न तब्दील हो।

सोमवार, 6 जुलाई 2015

डिजिटल होने की राह पर

प्रधानमंत्रीजी ने जब से 'डिजिटल इंडिया' की नींव रखी है, मेरे मोहल्ले में 'जश्न' का सा माहौल है। हर चेहरा डिजिटली खिला-खिला दिख रहा है। डिजिटल इंडिया को ध्यान में रखते हुए, मोहल्ले वाले लंबी-लंबी प्लानिंग बनाने में जुट गए हैं। प्लानिंग क्या है, छोड़ा-छाड़ी ही अधिक है।

मोहल्ले के लौंडों को 'डिजिटल इंडिया' में 'डिजिटल' ही अधिक आकर्षित कर रहा है। उनके तईं डिजिटल का मतलब है, केवल स्मार्टफोन और इंटरनेट...। स्मार्टफोन से उनका सरोकार केवल फेसबुक-टि्वटर-वाट्सएप से ही जुड़ा है। डिजिटल के बहाने स्मार्टफोन से और भी कई खास काम हो सकते हैं, इससे उन्हें ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं। अब तलक वे स्मार्टफोन पर 'सादा इश्क' फरमा रहे थे, अब से 'डिजिटल इश्क' फरमाएंगे। डिजिटल टाइप ही उनकी प्रेमिकाएं होंगी। डिजिटल फॉरमेट में उनके बीच वायदे व लड़ाई-झगड़े होंगे। रिस्क लेकर एक-दूसरे से मिलने का झंझट भी कम होगा। अपने-अपने स्मार्टफोन पर एक-दूसरे से डिजिटली मिल लिया करेंगे।

वक्त के साथ-साथ इश्क में जहां इत्ती तब्दीलियां आई हैं, यह डिजिटल तब्दीली और सही।

मोहल्ले के राममूर्ति चचा अब डिजिटल तकनीक से ही अपनी डेयरी को चलाएंगे। डिजिटल विधि से अपनी गाय-भैंसों की देख-भाल व सानी किया करेंगे। डिजिटल तकनीक से ही उनका दूध निकालेंगे। यह भी खूब रहेगा कि हम मोहल्ले वाले पहली बार डिजिटल दूध पिएंगे। सोचिए जरा उन गाय-भैंसों के बारे में राममूर्ति चचा के यहां कित्ती डिजिटली खुश रहेंगी।

सुनने में यह भी आया है कि मोहल्ले के कुछ पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ अब केवल 'डिजिटल रिलेशनशीप' में ही रहेंगे। डिजिटली एक-दूसरे से बातें करेंगे। डिजिटली एक-दूसरे का ख्याल रखेंगे। डिजटली एक-दूसरे के लिए शॉपिंग करेंगे। खाना भी डिजिटल फॉरमेट में ही खाएंगे-बनाएंगे। और, लड़े-झगड़ेंगे भी डिजिटली ही। यहां तक कि तलाक भी डिजिटली ही होगा। डिजिटल रिलेशनशीप हर प्रकार के सामाजिक व पारिवारिक बंधनों से मुक्त रहेगी।

जब सब डिजिटल हो रहे हैं तो मोहल्ले के भिखारी भला कैसे पीछे रह सकते हैं। मीटिंग कर मोहल्ले के भिखारियों ने तय किया है कि अब से वे सिर्फ 'डिजिटल भीख' ही लिया करेंगे। हिस्सा भी उनके बीच डिजिटल फॉरमेट ही बंटेगा। घर-घर, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले जाकर भीख मांगने से उन्हें मुक्ति मिलेगी। भिखारियों ने भीख की फीस भी बढ़ा दी है। सौ-पचास नहीं सीधे पांच सौ रुपए। उनका कहना है, जब डिजिटल इंडिया में रहना है, तो भीख का स्टैंडर्ड खराब नहीं करेंगे। जिन्हें देना हो दे नहीं तो कट ले।

देख रहा हूं, मोहल्ले में हर किसी के बीच डिजिटल होने की होड़ ठीक वैसे ही मची है, जैसे पिछले दिनों गैस-सब्सिडी लेने की मची हुई थी।
मोहल्ले में बस एक मैं ही अभी डिजिटल नहीं हुआ हूं। जबकि बीवी हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ी रहती है कि मैं किसी तरह डिजिटल हो जाऊं। यहां तक कि उसने धमकी भी दे डाली है अगर मैं डिजिटल नहीं हुआ तो मुझे तलाक भी दे सकती है। मगर इस डिजिटलगिरी को जिस नजरिए से मैं देख रहा हूं शायद बीवी न देख-समझ पाए। इसीलिए मैं अभी डिजिटल नहीं हो रहा हूं।

सोच के साथ शौचालय अभी ढंग से 'डेवलप' हुए नहीं हैं और हम लगे हुए हैं 'डिजिटल इंडिया' होने में। वाह...!

बुधवार, 1 जुलाई 2015

ग्रीस संकट और चिंताएं

संकट ग्रीस पर आया है, चिंताएं हमारी बढ़ गई हैं। कथित चिंताओं और चिंता के मामले में हम कुछ ज्यादा ही 'सजग' रहते हैं। हाल यह है, अगर हमारे पड़ोसी को भी जरा-सी छींक आ जाए तो हम चिंतित हो जाते हैं। चिंतित भी ऐसे होते हैं कि बिचारे को किस्म-किस्म की सलाहें दे-देकर 'अधमरा' कर देते हैं। बंदा अपनी चिंता से पहले ही परेशान होता है, ऊपर से हमारे चिंता करने के ढंग पर और चिंतित हो जाता है।

हमारे तईं ग्रीस संकट भी कुछ ऐसा ही चिंता का विषय है। तब ही तो, जब से ग्रीस संकट की खबर फैली है, हमारे शेयर बाजार धम्म से बेदम हो गए हैं। एक ही दिन में पांच सौ प्वांइट का गोता लगा आए। हालांकि शाम होते-होते थोड़ा 'संभल' गए। पर खुद को चिंताग्रस्त तो कर ही लिया न। ऊपर से 'कुर्बान' जाऊं कथित बिजनेस चैनलों का जिन पर आने वाले महा-पंडित और महा-ज्ञानी लोग- ग्रीस संकट के खौफ में- शेयर बाजार को खुलने से पहले ही गिरा डालते हैं। वहां जित्ते मुंह होते हैं, उत्ती बातें होती हैं। एक तो बंदा पहले ही शेयर बाजार की खस्ता हालत से दुखी होता है, ऊपर से ज्ञान बघारने वाले उसकी सिट्टी-पिट्टी और गुम कर देते हैं।

अभी कल की तो बात थी, जब राघुराम राजन साहब ने 'संभावित महामंदी' की आशंका से हमें चेताया था। उसके अगले ही दिन ग्रीस संकट ने आग में और घी छिड़क दिया। अब आप ही बताएं कि ऐसे में दिल जले न तो और क्या करे? अभी 2008 की मंदी से ढंग से पार पाए नहीं थे कि अब 'महामंदी' का खतरा। महामंदी की भविष्यवाणी और ग्रीस संकट के तोते ने न केवल सरकार बल्कि निवेशकों के होश भी फाखता कर दिए हैं।

अच्छा हम भी खूब हैं, जरा-जरा सी बातों में हाथ-पैर छोड़ बैठते हैं। अमां, संकट ग्रीस में आया है। दिवालिया वहां के बैंक और अर्थव्यवस्था हो रही है। तो फिर हम क्यों 'बेगानी बर्बादी में खुद बर्बाद' हुए जा रहे हैं। जैसे- एक होड़-सी लगी हुई है कि अगर दुनिया भर के शेयर बाजार गिरे हैं, तो हम भी गिरेंगे। दरअसल, शेयर बाजारों का हाल कुछ यों होता है- गिरने के मामले में 'हम साथ-साथ हैं' और बढ़ने के मामले में 'हम आपके हैं कौन'। इस रस्साकशी में मारा बिचारा निवेशक जाता है। हालत ग्रीस के बाजार की पतली है, दुबलापन हम पर चढ़ने लगा है।

हर वक्त 'नकारात्मकता' में पड़े रहना भी ठीक नहीं। ग्रीस संकट के नुकसान जो हैं सो हैं पर कुछ फायदे भी हैं। ग्रीस संकट के कारण कच्चे तेल (क्रूड) की कीमतों में गिरावट के चलते पेट्रोलियम उत्पाद सस्ते हो सकते हैं। महंगाई दर में कमी आ सकती है। ब्याज दरें कम हो सकती हैं। इत्ता सब तो संकट होने के बावजूद मिल सकता है, और क्या चाहिए? फिर आरबीआइ और सरकार 'निगाह' बनाए हुए हैं न। तिस पर भी अगर कोई चिंता पर चिंता बढ़ाना चाहे तो उसे 'बेवकूफ' ही कहा जाएगा। माना कि दूसरे की चिंता में साथ देना चाहिए, लेकिन इत्ता भी नहीं कि खुद पर ही चिंताएं ओढ़ ली जाएं।

संकट चाहे ग्रीस का हो या शेयर बाजार का इससे तो कैसे भी पार पाया जा सकता है लेकिन बेवजह अपनी खोपड़ी को ओखली में देने वाली मानसिकता से कभी कोई पार नहीं पा सकता। जैसे-तैसे हमारा शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था थोड़ा पटरी पर आई है, हम फिर से आमादा हो लिए हैं, उसे 'ढहाने' में।

अमां, चिंताएं छोड़ो। ग्रीस का संकट ग्रीस को देखने दो। बस अपनी 'बैक' मजबूत रखो ताकि ग्रीस जैसे संकट हमें 'ग्रीस' न लगा सकें।