मंगलवार, 9 जून 2015

पत्नी और अच्छे दिन

पत्नी 'नाराज' है कि उसके अभी 'अच्छे दिन' नहीं आए हैं। ताना मारकर कहती है- 'देख लो। कुछ सबक लो। मोदीजी मात्र एक साल में ही 'अच्छे दिन' ले आए और तुम शादी के दस साल बाद भी अच्छे दिन नहीं ला पाए! अच्छे दिन लाओगे कैसे रात-दिन तो कलम-कागज में डूबे रहते हो। लेखक हो न।'

पत्नी के तानों पर अब मैं ज्यादा ध्यान नहीं देता। क्योंकि उसकी तो आदत है। मैं अच्छे दिन लाने के लिए चाहे खुद को ही क्यों न 'बेच' दूं, शिकायत उसकी फिर भी बनी रहेगी- मेरे अच्छे दिन अभी नहीं आए। इसलिए 'इग्नोर' करता हूं। इग्नोर करने के सिवाय मेरे पास चारा भी तो नहीं।

पत्नी क्या जाने मोदीजी देश में अच्छे दिन कैसे और कहां-कहां ला पाए हैं। चमकते विज्ञापनों, दमकते भाषणों और लुभावने बयानों से थोड़े न अच्छे दिन आ जाते हैं। अच्छे दिन का मतलब अच्छे दिन से होता है।

दूर क्यों जाऊं, अच्छे दिन के वायदे में एक काला धन वापस लाना भी तो था। लेकिन अभी तलक न काला धन वापस आया न खाते में 15 लाख की रकम। मैं तो इस 'उम्मीद' में बैठा था कि इधर काला धन वापस आएगा और उधर 15 लाख मेरे खाते में चढ़ जाएंगे। बाद में पता चला कि 15 लाख खाते में आने वाली बात महज 'राजनीति जुमला' थी। हकीकत से उसका कोई लेना-देना नहीं था। तो जनता ने जुमले पर ही लट्टू होकर इत्ता बड़ा एकपक्षीय बहुमत दे दिया। वाह जी वाह।

इत्ते पर भी पत्नी को यकीन है कि अच्छे दिन आ चुके हैं और बुरे दिन हवा हुए। कल ही कह रही थी- 'मोदीजी ने 'बुरे दिनों' को समाप्त कर वो महान काम किया है, जो तुम अपनी पूरी जिंदगी लगाकर भी नहीं कर पाते। मोदीजी की 'इच्छा-शक्ति' कित्ती 'स्ट्रांग' है। और तुम्हारी... न तुममें 'इच्छा' है न 'शक्ति'। बस हर वक्त बैठे-बैठे कागजों में 'प्रगतिशीलता का नगाड़ा' बजाते रहते हो। कागजों के बाहर तुम क्या हो? दुनिया 'शाब्दिक-प्रगतिशीलता' से नहीं पैसे, विकास और अच्छे दिन से चला करती है। क्या समझे...?'

क्या करूं, पत्नी की प्रत्येक 'जली-कटी' सुननी पड़ती है। न सुनूं तो रोटी का एक कौरा नसीब न हो। मेरी खाट अगले दिन घर के बाहर ही पड़ी नजर आएगी। यह दीगर बात है कि लेखक चाहे कित्ता बड़ा, कित्ता प्रगतिशील ही क्यों न हो परंतु पत्नी के आगे रहता 'भिगी बिल्ली' बनकर ही है। मजाल है जो पत्नी के कहे को काट सके।

पत्नी कहती है कि उसके अच्छे दिन नहीं आए हैं, मैं भी मान लेता हूं कि हां नहीं आएं हैं। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि न मैं मोदीजी जित्ता इच्छा-शक्तिपूर्ण हो सकता हूं न सलमान खान जित्ता ताकतवर। दुनिया-समाज के उनकी 'ठसक' है। मेरा क्या है, सिर्फ लेखक ही तो हूं। पत्नी की निगाह में तो वो भी नहीं। अगर मैं यों ही लेखक बना रहा तो कम से कम इस जन्म में तो पत्नी के वास्ते अच्छे दिन लाने से रहा। अच्छे दिन लाने के लिए हर कोण से अच्छा होना पड़ता है और वो मैं चाहकर भी नहीं हो सकता।

चलिए, अच्छा ही हुआ जो 'बुरे दिन' चले गए और अच्छे दिन आ गए। मेरा काम आसान हो गया। अब मुझे बुरे दिनों पर लिखने के लिए ज्यादा मगज-मारी नहीं करनी पड़ेगी। अब मैं केवल अच्छे दिनों पर ही लिखा करूंगा। अच्छे दिनों पर लिखते-लिखते हो सकता है मेरी 'किस्मत' भी 'चकम' जाए। क्या पता प्रधानमंत्रीजी की निगाह में चढ़ जाऊं। इस बहाने मेरे अच्छे दिन भी आ जाएं।

सरकार के एक साल पूरा होने और बुरे दिन रूखसत होने पर 'जश्न' मनाइए। मैं पत्नी को समझाने की कोशिश करता हूं, चिंता न कर- एक न एक दिन तुम्हारे अच्छे दिन भी आ ही जाएंगे।

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