गुरुवार, 4 जून 2015

आ गए मैगी के 'बुरे दिन'

मैगी बनाने वालों, न खाने वालों, न बेचने वालों ने कभी सोचा होगा कि मैगी के भी 'बुरे दिन' आएंगे। आज जिधर देखो उधर केवल मैगी, मैगी और मैगी के ही चर्चे हैं। अखबार में हर रोज मैगी के बाबत कुछ न कुछ छप ही रहा है। सरकार और मैगी बनाने वालों में ऐसी 'ठनी' है कि न झुकने को वो तैयार हैं न ये। ऊपर से मैगी के ब्रांड एबेंसडरों को नोटिस और जारी कर दिए गए हैं। कि बताओ- मैगी के विज्ञापन में हिस्सा लेने की क्या मजबूरी रही। अब वे बिचारे क्या बतलाएं- उन्हें इससे क्या लेना-देना कि मैगी के खाने, न खाने के क्या फायदे, क्या नुकसान हैं, उन्हें तो अपनी 'फीस' से मतलब। विज्ञापन चल रहा है। मैगी बिक रही। और पैसा अपनी अंटी में आ रहा है। पर्याप्त है।

मुझे खूब ध्यान है, जब पहली दफा मैं मैगी को घर लेके आया था। बनने के बाद लंबी-लंबी सूढ़ियों जैसी लगी थी। न खाते बन रहा था, न उगलते। फिर एक डर यह भी लग रहा था कि कहीं खाने के बाद सुबह को पीछे के रास्ते से न निकल आए। हिम्मत करके खाई। लेकिन मैगी के प्रति 'डर' हमेशा कायम रहा कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। मात्र दो मिनट में बनी चीज का क्या भरोसा, कब अपना 'रंग' दिखा दे।

घर-घर में मैगी का चलन ऐसा बढ़ा, ऐसा बढ़ा कि लोग 'रोटी' की जगह 'मैगी' ही खाने लगे। खासकर बच्चे। दो मिनट में भूख मिटाने का इससे सस्ता और आसान जरिया भला क्या हो सकता है?

इधर मैगी चलन में आई तो उधर चीन वालों ने चाऊमीन को इंडिया के मार्केट में खपा दिया। आज देखिए, मैगी और चाऊमीन मार्केट में गजब ढहाए हुए हैं। हर शहर के गली-मोहल्लों में चाहे 'दाल का ठेला' न मिले पर 'चाऊमीन का ठेला' जरूर मिलेगा। और लोग भी ऐसे 'दीवाने' की चाऊमीन खाने को यों टूटे रहते हैं मानो ये न मिले तो जीवन ही बेकार।

कहना न होगा कि मैगी और इंसान एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। न मैगी अपना 'आकर्षण' छोड़ सकती है, न इंसान अपनी आदत। लेकिन इधर मैगी पर जो सितम ढहाए जा रहे हैं, उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि मैगी के शायद 'बुरे दिन' शुरू हो चुके हैं। दुकानदार से भी अगर मैगी मांग लो तो झट से 'इंकार' कर देता है कि 'नहीं है'। या फिर दाएं-बाएं देख-दाखकर देता है।

मैगी पर जब से बैन लगने की बात सामने आई है, बीवी ने तो मेरा बुरा हाल कर रक्खा है। रोज कहती है कि अभी ही मैगी के पांच-सात बोरे लाके घर में रख लो। ताकि बाद में दिक्कत न हो। क्योंकि मैं रोटी के बिना तो रह सकती हूं मगर मैगी के बिना नहीं। मैगी मेरे जिंदगी में तुमसे अधिक इंर्पोटेंट है। अब बीवी को कैसे समझाऊं कि मैगी की फैक्टी मेरे पिताजी की नहीं है। कि जब चाहा ले आया।

मजबूरी है कि आजकल मैं भी मैगी को छोड़कर चाऊमीन पर ही निर्भर हूं। बीवी के पास मैगी का विकल्प चाऊमीन जो मौजूद है। क्या करूं, खानी पड़ती है। न खाऊं तो एक ही दिन में बोरिया-बिस्तरा गोल। मरता क्या न करता वाली स्थिति से गुजर रहा हूं फिलहाल।

मैं तो चाहता हूं कि मैगी और सरकार के बीच चल रही तना-तनी जल्द ही खत्म हो। नहीं तो बीवी ने मुझे मैगी का विकल्प चाऊमीन खीला-खीला के चाइनीज बना ही देना है। मैगी आती रहेगी तो कम से कम मुझे मिलने वाली रोटी के बुरे दिन तो नहीं रहेंगे।

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