मंगलवार, 30 जून 2015

पागलपन की डिग्री

जी हां, मेरे कने 'पागलपन की डिग्री' है! यों, यह डिग्री- आंशिक या बहुतायत में- हममें से हर किसी के पास होती है। किंतु कुछ सामाजिक तो कुछ पारिवारिक भय के कारण कोई बताना नहीं चाहता। लेकिन मुझे ऐसा कोई भय नहीं। जब मंत्रियों को फर्जी डिग्री रखने पर कोई 'शर्म' नहीं तो फिर मुझे 'असली डिग्री' रखने पर क्यों हो?

पागलपन की डिग्री भीड़ में पाई जाने वाली फर्जी डिग्रियों से कहीं बेहतर नजर आती है। इस डिग्री से कम से कम शैक्षिक-प्रतिबद्धताएं तो नहीं जुड़ी हैं। न ही कागज-पत्तर के रूप में इसे कहीं दिखाने की जरूरत है। पागलपन की डिग्री का सीधा-साधा संबंध आपकी आदतों और व्यवहार से है। मुझे इस बात का फख्र है कि मेरी आदतें और व्यवहार पागलपन से काफी तक हद मेल खाती हैं। यही नहीं पागलपन के कुछ अंश मेरे लेखन में भी मौजूद हैं। सही कहूं, इस पगलाई दुनिया पर पागल होकर लिखने में जो आनंद है, वो बुद्धिजीवि या ज्ञानी होकर लिखने में नहीं।

पागल होना समझदारों के लिए बेशक 'बेअक्ली' का प्रतीक होगा किंतु मेरे तईं 'वरदान' है। कम से कम मुझ पर इस-उस के 'बौद्धिक-वाद' का 'बोझ' नहीं है। बौद्धिक आदमी कई दफा जिन बातों को कहने से डरता है, पागल उन्हें 'बिंदास' कह-बोल डालता है। इसी पागलपन ने मुझे इत्ता 'बोल्ड' बनाया है। नहीं तो अब तलक मैं भी बौद्धिकता के लिहाज के चक्कर में निपट लिया होता।

पागलपन की डिग्री पाना इत्ता सहज-सरल नहीं होता है। लगातार पागलों के बीच उठना-बैठना पड़ता है। उन जैसी हरकतें करनी पड़ती हैं। उन जैसा दिमाग पाना होता है। सीधे रास्ते पर नहीं हमेशा उल्टे रास्ते चलकर मंजिल को अपने कब्जे में करना होता है। पागल कभी किंतु-परंतु के चक्कर में नहीं पड़ता। हमेशा जैसे तो तैसा वाली स्थिति में रहता है। बुद्धिजीवि भले ही दो का पांच कर ले मगर पागल दो को दो ही रहने देता है। दुनियाभर के सच पागलों के आगे 'पनाह' मांगते हैं।

सबसे राहत की बात मेरे साथ यह रही कि मुझे पागलपन की डिग्री लेने के लिए दिल्ली-बंबई नहीं जाना पड़ा। पागलखाना मेरे शहर में ही मौजूद है। यहां तो दूसरी जगह के लोग पागलपन की डिग्री पाने के लिए भर्ती होते हैं। कुछ अंत तक डटे रहते हैं तो कुछ बीच में छोड़कर ही भाग जाते हैं। पागलपन की डिग्री पाना इत्ता आसान थोड़े न है पियारे।

दुनिया या मेरे परिवार वाले भले ही मुझे पागल समझकर मेरा मजाक उड़ाएं, मेरी सेहत पर कोई फरक नहीं पड़ता। उन्हें क्या पता, पागल होने में जो आनंद है, वो समझदार बने रहने में नहीं। फिर जिसके कने पागलपन की डिग्री हो, उसकी तो बात ही निराली है।

बिन पगलाए आप इस दुनिया-समाज को समझ ही नहीं सकते। सबकुछ (अपवादों को छोड़के) यहां फर्जी है, डिग्री से लेकर रिश्ते तक। ऐसे में अगर मेरे पास पागलपन की ओरिजनल डिग्री है तो कैसी शरम।

5 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बधाई हो ओरीजनल के लिये :)

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मुसकुराते रहिए और स्वस्थ रहिए - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सही बात! क़ैदख़ाने में बन्द क़ैदी को दुनिया क़ैद में दिखाई देती है! दुनिया को देखने का यह भी एक नज़रिया है. दार्शनिक विचार!

Sudhir Singh ने कहा…

बहुत अचछी डिगरी

Sudhir Singh ने कहा…

बहुत अचछी डिगरी