बुधवार, 3 जून 2015

सेल्फी की दुकान

तय किया कि मैं नौकरी छोड़के मोहल्ले में ही 'सेल्फी की दुकान' खोलूंगा! नौकरी छोड़ने का विचार दिमाग में था तो कई दिनों से पर कोई ऑल्टरनेटिव नहीं मिल पा रहा था। मगर अब मिल गया है। सेल्फी की दुकान मेरे तईं 'बेहतर' विकल्प रहेगा। आजकल सेल्फियों का 'क्रेज' भी खूब है। हर कोई किसी न किसी बहाने अपनी सेल्फी लेने में लगा है।

लोगों के बीच सेल्फी का क्रेज तब से और अधिक बढ़ गया है, जब से प्रधानमंत्रीजी सेल्फी लेते 'जग-प्रसिद्ध' हुए हैं। प्रधानमंत्रीजी अब तलक जित्ती भी विदेश यात्राओं पर गए, हर मौके की सेल्फी लेना नहीं भूले। बंदा चाहे जित्ता ही बड़ा तुर्रमखां क्यों न हो मगर प्रधानमंत्रीजी के आगे सेल्फी-मोड में आ ही गया।

अब तो कहा भी जाने लगा है कि ये वाले प्रधानमंत्री 'सेल्फी-प्रधानमंत्री' हैं। विपक्ष तो प्रधानमंत्री के सेल्फी प्रेम से इत्ता 'आहत' है कि उसने अपने ही चेहरे को आईने में देखना बंद कर दिया है। सरकार से एक साल का हिसाब-किताब मांग रहा है लेकिन अपने दस के किए पर यों चुप है मानो 'गूंगा' हो!

मगर मुझे इससे क्या! मुझे तो सीधा मतलब अपनी सेल्फी की दुकान से है। वातावरण में सेल्फी का खुमार कुछ इस तरह से घुल गया है कि हर कोई मदहोश सा रहता है अपनी सेल्फियां लेने को। लोग अब स्मार्टफोन 'बात' करने के लिए कम 'सेल्फी' लेने के लिए ज्यादा खरीद रहे हैं। मोबाइल कंपनियों ने भी वक्त के तकाजे को भांपते हुए किस्म-किस्म के सेल्फी फोन मार्केट में उतार दिए हैं। फोन क्या हैं पूरा कैमरा ही हैं।

स्टूडियों में बंदा-बंदी अब फोटू खींचवाने नहीं सेल्फी लेने जाते हैं। हालांकि सेल्फी खुद ही ली जाती है लेकिन अगर दूसरा भी ले ले तो भी उसे सेल्फी ही कहा जाता है। फोटू खींचना-खींचवाने जैसा पारंपरिक चलन अब बीत जमाने की बात हुआ। और तो और शादी-ब्याह के लिए भी बंदा-बंदी फोटू नहीं खींचवाते सीधा सेल्फी लेके वाट्सएप कर देते हैं। यही तो तकनीक की ताकत है पियारे।

अपनी सेल्फी की दुकान में मैं भी कुछ ऐसी ही सुविधाएं रखूंगा ताकि सामने वाले को अपने ही मोबाइल से ली गई सेल्फी जैसा फील हो। फील होना ही महत्त्वपूर्ण है।

मोबाइल सेल्फी ने कैमरों का मार्केट भी चौपट करके रख दिया है। पहले जित्ते में एक कैमरा आ जाता था, अब उससे भी कम में सेल्फी मोबाइल आ जाता है। न रखने का झंझट न खींचने-खींचवाने का झाड़। अपना हाथ जगननाथ।

सबसे खास बात, सेल्फी के लिए किसी प्रकार का 'मूड-शूड' बनाने की जरूरत नहीं। हाथ में बस मोबाइल होना चाहिए। फिर तो सेल्फियां ही सेल्फियां।
आने वाला समय सेल्फी-युग का ही होगा! हमारे प्रधानमंत्रीजी ने यह अच्छे से पहचान लिया है। कोई अचंभा नहीं होना चाहिए कि अब दूसरे देशों से संबंध 'बातचीत' से ज्यादा सेल्फियों के आदान-प्रदान से सुधरें! ऐसा प्रधानमंत्री के सेल्फी-मोड में रहने को देखकर लगने लगा है।

सेल्फी के प्रति हमारी 'दीवानगी' और बढ़ेगी ही कम नहीं होगी। अभी मैंने सेल्फी की दुकान खोलने का मन बनाया है, हो सकता है, आगे चलकर सरकार इस क्षेत्र में कोई 'डिप्लोमा' कोर्स ही शुरू न कर दे!

जो भी कहिए पर सेल्फी का बाजार हिटम-हिट है।

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