शुक्रवार, 26 जून 2015

पत्नी और इमरजेंसी

पत्नी ने मुझ पर 'अघोषित इमरजेंसी' लगा रखी है। न.. न.. हंसिए नहीं। यह सच है। न मुझे घर से बाहर जाने और न ही पड़ोस में झांकने की इजाजत है। दिनभर घर की चार-दीवारी में ही कैद रहता हूं। यहां तक कि मेरे लेखन पर भी पाबंदी-सी लगा दी गई है। मुझे केवल पत्नी पर कविताएं लिखने की छूट मिली हुई है। व्यंग्य लिखना तो क्या, उसके बारे में सोच तक नहीं सकता। यह टुकड़ा मैं काफी छिप-छिपाकर लिख पा रहा हूं।

पता नहीं किस करमजले ने पत्नी के कान में यह फूंक दिया कि मेरा पड़ोस की लड़की से 'चक्कर' चल रहा है। पत्नी ने मुझसे न कुछ पूछा, न गछा बस साफ-सीधे शब्दों में कह दिया, अगर घर के बाहर कदम रखा या पड़ोस में झांका भी तो टांगे और आंखें दोनों की 'छंटनी' करवा दूंगी। जो भी करना है, घर में करो। लड़कियां देखने का इत्ता ही शौक है तो पड़ोस की दुकान से सीडीयां मंगवाए देती हूं। जो देखना है, घर में ही देखो।

तब से न जाने कित्ती दफा पत्नी को समझा चुका हूं कि मेरा पड़ोस की किसी लड़की से कोई चक्कर-वक्कर नहीं चल रहा। जो कुछ चल रहा है, केवल तुम्हीं से चल रहा है। लेकिन पत्नी मानने को राजी ही नहीं। उलटा धमकी और दे देती है, कोतवाली में जाने की। जग-हंसाई के कारण कुछ बोल भी तो नहीं सकता। घर में नजरबंद हूं। इमरजेंसी का डंडा चौबीस घंटे मेरी खोपड़ी पर तना रहता है। जो काम यानी कविता लिखने का जिंदगी में कभी नहीं किया, पत्नी के हुकम के आगे वो भी करना पड़ रहा है। सच बताऊं, पत्नी पर कविता लिखना इमरजेंसी की यातना से कहीं ज्यादा कठोर काम है। फिर भी कर रहा हूं। क्योंकि दो वक्त की रोटी का सवाल जो है पियारे।

साथ-साथ यह स्पष्ट करना 'अत्यंत जरूरी' है कि मेरा पड़ोस तो क्या पड़ोसी देश की किसी लड़की से कोई चक्कर-वक्कर नहीं चल रहा। अरे, मैं तो लड़कियों की तरफ ढंग से आंख उठाकर देखता तक नहीं। मैं उस रास्ते को छोड़ देना पसंद करता हूं, जहां से लड़कियां गुजरती हैं। आज तलक मैंने न किसी लड़की को प्रेम-पत्र लिखा है, न ही कविता। मुझे तो यह तक नहीं मालूम रहता कि मेरे पड़ोस में कौन-सी और कैसी लड़की रह रही है।

तिस पर भी पत्नी को मुझ पर 'शक' है कि मेरा पड़ोस की लड़की से चक्कर है। अव्वल तो है नहीं अगर होता भी तो क्या अपनी पत्नी को नहीं बतलाता! यों भी, मैं कभी कोई (व्यक्तिगत या पारिवारिक) बात पत्नी को बताना नहीं भूलता! क्या करूं, मेरे पेट में बात पचती ही नहीं।

दरअसल, पत्नी भी न थोड़े 'पुराने ख्यालों' की है। आजकल के जमाने में भला ऐसा कौन-सा पति-पत्नी होंगे, जिनका एकाध जगह चक्कर-शक्कर न चल रहा हो! आज के जमाने में इससे या उससे चक्कर चलना तो 'स्टेटस-सिंबल' समझा जाता है। लाइफ में जिसका किसी से चक्कर नहीं चलता, उसे 'उदासीन' टाइप समझा लिया जाता है। पृथ्वी भी तो किसी न किसी चक्कर पर ही घूम रही है न। देखिए, कित्ती मस्त है।

पत्नी को तो 'शुक्र' मनाना चाहिए कि मैं दुनिया का इकलौता पति हूं, जिसका किसी से कोई चक्कर नहीं चल रहा। वरना तो दुनिया में कैसे-कैसे पति भरे पड़े हैं।

फिलहाल, यह तो नहीं मालूम कि मुझे पत्नी की इमरजेंसी से कब मुक्ति मिलेगी पर दुआ जरूर कर रहा हूं कि पत्नी के भरे गए कान जल्द ही खाली हों। ताकि हमारे जीवन में खुशियां पुनः लौट सकें।

1 टिप्पणी:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत अच्छी पत्नी है । इमरजेंसी लगा कर छोड़ दिया । आगे कुछ नहीं किया :)