सोमवार, 22 जून 2015

ललित मोदी का दिमाग

ऐसा नहीं है कि 'गर्मी' केवल आम आदमी को ही लगती है, सरकार और नेताओं को भी बराबर लगती है। मगर नेताओं को 'सियासी गर्मी' ही ज्यादा लगती है। सियासी तापमान के हिसाब से उनका 'पारा' भी चढ़ता-उतरता रहता है।

अब देखिए न, बीच में न जाने कहां से आन टपके श्रीमान ललित मोदी ने सरकार और नेताओं के तापमान को इस कदर बढ़ा दिया है कि न पसीना पोछते बन रहा है, न सुखाते। छोटे-मोटे विवादों और मसलों को छोड़कर सरकार के भीतर-बाहर सबकुछ 'टनाटन' (!) चल रहा था मगर ललित मोदी के प्रकरण ने सब 'मटियामेट' करके रख दिया। सरकार के साथ मुसीबत यह लग गई है कि वो जवाब क्या और कैसे दे? विदेश मंत्री को बचाए या मुख्यमंत्री को?

ऊपर से विपक्ष ऐसे पीछे पड़ा है, जैसे गाय के पीछे शेर। इधर भागते हैं तो 'खाई' है, उधर भागते हैं तो 'दरवाजा बंद'। बीच में लटके हुए हैं। लटक कर ही जवाब दे रहे हैं, जो भी बन पड़ रहा है। नेता लोगों को अभी एक मोदीजी के बचाव में ही आगे आना पड़ता था, अब दो-दो हो गए हैं। दुविधा में हैं, किसको छोड़ें और किसको पकड़ें।

लेकिन साहब 'दाद' देनी पड़ेगी श्रीमान ललित मोदी के 'दिमाग' की भी। कहना पड़ेगा कि श्रीमान मोदी का दिमाग तो चाचा चौधरी के दिमाग से भी तेज चलता है। मियांजान एक ही तीर से जाने कित्ते-कित्ते शिकार किए बैठे हैं। आइपीएल का तो मजा लिया ही, साथ-साथ सियासत और नेताओं के साथ संबंध खूब गहरे किए। मियांजान कने कुछ नेताओं की टनाटन 'पोल-पट्टी' भी है। अगर खोल दें तो बैठे-ठाले 'भूचाल' आ जाए। वैसे कुछ के साथ तो यह आ भी चुका है।

विदेश मंत्री ने अच्छा 'मानवीयता' का रिश्ता निभाया कि अगला 'गले' ही पड़ गया। मानवीयता के रिश्ते ने विवाद का रूप धारण कर लिया। विवाद भी ऐसा कि लगता नहीं इत्ती आसान से पीछा छोड़ेगा। यानी, सियासत में अब तो किसी के भी प्रति मानवीयता का रिश्ता रखना या निभाना ही खुद की गर्दन फंसाने जैसा हो गया है पियारे।

ललित मोदी ने यह तो साबित कर ही दिया कि मियां शुरू से ही 'ऊंचा खेल' खेलने के 'शौकिन' रहे हैं। तब ही तो आइपीएल से लेकर सियासत के मैदान तक पर छक्के ही छक्के जड़ते रहे। संबंध भी इत्ते ऊंचे-ऊंचे बनाए कि आसानी से कोई हाथ भी डाल सके। वाह! इसे कहते हैं, जिंदगी को मस्त ऊंचाईयों के साथ जीना। बाद में अंजाम चाहे जो हो पर वर्तमान को तो भरपूर जी ही लो। है कि नहीं।

कहना न होगा, योग दिवस के साथ-साथ ही ललित मोदी ने सरकार और नेताओं को जमकर योगा करवा दिया। योग करवा-करवा करके हालत इत्ती पतली कर डाली कि हर वक्त खिले रहने वाले चेहर भी फिलहाल 'मुरझाए' हुए से हैं।

हालिया सीन देखकर तो यही लग रहा है कि सरकार और नेताओं को मोदी-प्रकरण में अभी कुछ दिन और यों ही हिलगे रहना होगा। मामला इत्ता बढ़ चुका है कि समाधान का रास्ता कम ही नजर आता है। विपक्ष और बुद्धिजीवियों को भी मसाला हाथ लग गया है अपनी भड़ास निकालने का। सो मजे से निकाल रहे हैं।

पर मुझे क्या...। चाहे ललित मोदी का मामला हो या मैगी-डिग्री का, मुझे तो 'मनोरंजन' का स्वाद चखने से मतलब। सो चख रहा हूं। आप भी चखें। खाली-पीली दिमाग का दही न बनाएं। क्योंकि मनोरंजन में ही जिंदगी का हर सुख छिपा है।

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सबसे अच्छा लगा मुझे क्या ?

Shah Nawaz ने कहा…

सही है…… वाकई मनोरंजन में ही जिंदगी का हर सुख छिपा है।

Shah Nawaz ने कहा…

सही है…… वाकई मनोरंजन में ही जिंदगी का हर सुख छिपा है।

Digamber Naswa ने कहा…

सच कहा है ... मतलब तो अनद से है ... वो मिल रहा है ... और सब की रोटियाँ भी सिक रही हैं ...