मंगलवार, 16 जून 2015

जिंदगी और स्टेटस

सोशल नेटवर्किंग का दायरा क्या बड़ा, जिंदगी अब 'स्टेटस' सरीखी हो गई। अब सबकुछ स्टेटस से मैनीज हो रहा है। कौन, कब, कहां, क्या खा रहा है, क्या पी रहा है, क्या सोच रहा है, क्या देख रहा है, सबकुछ स्टेटस पर अपडेट हो रहा है। एक के बाद एक स्टेटस इत्ती जल्दी-जल्दी अपडेट हो रहे हैं कि ध्यान ही नहीं रहता कुछ सेकेंड पहले किसने, क्या स्टेटस अपडेट किया था। स्टेटस का मकड़जाल इत्ता घना है कि बच पाना मुश्किल।

दिमाग का कमाल देखिए। कित्ती तेजी से कित्ते-कित्ते स्टेटस क्षण भर में सोच लेता है। जहां रवि पहुंचे न कवि पहुंचे का जुमला बदलकर अब जहां न रवि पहुंचे न कवि वहां स्टेटस पहुंचे हो गया। घटना के घटने भर की देर है और स्टेटस पर स्टेटस सोशल नेटवर्किंग पर हाजिर हैं। वन-लाइनर स्टेटस ने तो चुटकुले और व्यंग्य की परिभाषा ही बदलकर रख दी है। लंबे-लंबे व्यंग्य पढ़ने में अब उत्ता दिल नहीं लगता, जित्ता वन-लाइनर स्टेटस को पढ़ने में लगता है। गौरतलब है, फेसबुक से कहीं उम्दा वन-लाइनर स्टेटस टि्वटर पर लिखे जा रहे हैं। ऐसे-ऐसे फन्नी स्टेटस कि मुस्कुराए बिन रहा न जाए।

बंदा अब किसी के लीविंग स्टेटस पर ध्यान कम फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस पर ज्यादा देता है। स्टेटस बता देता है सामने वाले बंदे का मेंटल-लेवल क्या है। अभी हाल कहीं पढ़ा था कि अब बॉस लोग अपने एम्पलाइ के- काम के साथ-साथ- फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस पर ही निगाह रखा करेंगे। ताकि एम्पलाइ के दिलो-दिमाग में जो चल रहा है, पता लग सके। वो दिन दूर नहीं जब बंदे को कंपनी में नौकरी ही उसके फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस को पढ़-देखकर दी जाएगी। क्या कीजिएगा, जमाना ही इत्ता हाइ-टेक हो चला है। सब बदल रहे हैं तो कंपनियां भी क्यों न बदलें।

जिंदगी अब संघर्ष नहीं बल्कि स्टेटसमय हो गई है। जिंदगी से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात अब स्टेटस के रूप में नुमायां है। कह सकते हैं, जिंदगी को जीते रहने के लिए स्टेटस का दामन थामे रखना बहुत जरूरी है। ताकि जिंदगी को भी हमसे कोई शिकायत न रहे कि मेरे बारे में तुमने कभी कुछ अपेडेट क्यों नहीं किया।

अब तो कुछ देर खुद का या किसी और का स्टेटस अपडेट होते हुए न दिखे तो मन ही मन भय सा पैदा होने लगता है कि कहीं कोई बात तो नहीं। स्टेटस अपडेट होते ही इत्ता सुकून मिलता है मानो घर बैठे जनत मिल गई हो। मैंने तो लोगों को सुबह-सुबह अपने 'फारिग' होने का स्टेटस अपडेट करते भी देखा है। जरूरी नहीं स्टेटस 'टेक्स' करके ही अपडेट किया जाए, 'सेल्फी' ही काफी है। हर बात, हर मूमेंट की 'सेल्फी' अब हमारी जरूरत है।

मैंने तो सोच रखा है, जिस दिन मैं इस दुनिया-जहां से अंतिम विदाई ले रहा होऊंगा, पहले स्टेटस ही अपडेट करूंगा। ताकि स्वर्गलोक में बैठे यमराज को भी पता लग जाए कि बंदा आने को है। और मुझे लाने की अतिरिक्त तैयारियां भी उन्हें न करनी पड़ें। सुना है, अब तो स्वर्गलोक में भी सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल जोर-शोर से होने लगा है!

जिंदगी और स्टेटस एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। दोनों यों ही जुड़े रहें ताकि स्टेटस का स्टैंडर्ड बना रहे।

1 टिप्पणी:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

ये तो दिखाने वाले स्टेटस की बातें हैं
जो हम करते हैं और नहीं दिखाते हैं
वो अगर दिखाने लगें तब क्या होगा जी :)