सोमवार, 15 जून 2015

डिग्री की मुसीबत

पियारे, 'फर्जी' तो छोड़ो मेरे कने 'ओरिजनल डिग्री' भी नहीं है। डिग्री लेने की कभी 'जरूरत' ही महसूस नहीं हुई। न कभी इस लायक पढ़ाई ही की, कि डिग्री मिलने पर कुछ 'गर्व' टाइप फील हो। एग्जाम दे दिया। पास हो गए। नई क्लास में आ गए। बात खत्म।

यों भी, डिग्री की जरूरत तो उन्हें पड़ती है, जिन्होंने पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में ऊंचे-ऊंचे झंडे गाड़े हों। देश के साथ-साथ अपने इलाके का नाम 'रौशन' किया हो। जिन पर न केवल परिवार बल्कि देश को भी गर्व हो। लेकिन मैंने मेरी पढ़ाई के साथ ऐसा कुछ नहीं किया। 'इजी टू गेट' के हिसाब से सबकुछ 'स्मूथली' चलता रहा। फिर भला मुझे डिग्री की क्या दरकरार?

बता दूं, बिन डिग्री मैंने कुछ कम झंडे नहीं गाड़े हैं। पढ़ाई में भले ही 'अव्वल' न रहा हूं किंतु लेखन के मामले में अपना और अपने शहर का नाम 'रौशन' कर ही रहा हूं। कईयों ने मुझसे पूछा भी है कि क्या आपके पास लेखन-वेखन की कोई डिग्री है? मैंने साफ मना कर दिया, न जी न मेरे कने लेखन-वेखन की कोई डिग्री नहीं, बस संपादकों की किरपा-दृष्टि है। उन्हीं के सहारे गाड़ी टॉप-गेयर में चल रही है। रही-सही कसर, मेरी कलम पूरी कर दे रही है।

दरअसल, डिग्री के साथ किस्म-किस्म के 'लफड़े' हैं। डिग्री हो तो मुसीबत, न हो तो मुसीबत और अगर फर्जी हो तो मुसीबत ही मुसीबत। फर्जी डिग्री के मारे एक नेताजी पड़े हुए हैं न मुसीबत में। फर्जी डिग्री को ओरिजनल बताके मियां नेता तो बन गए मगर जब भंडा फूटा तो कुर्सी और इज्जत दोनों ही हाथ से गए। अब पुलिस के साथ जा-जाकर फर्जी डिग्री के ओरिजनल रहस्य का पता लगवा रहे हैं।

यह तब है जब चुनी हुई सरकार घोषित तौर पर ईमानदार है। वैसे आज के जमाने में ईमानदारी और ईमानदारियों का कोई भरोसा नहीं कब में फर्जी निकल आएं। डिग्री की तो फिर भी जांच हो सकती है लेकिन फर्जी ईमानदारी की जांच इत्ता आसान नहीं।

लगता तो ऐसा है जैसे जांचों का मौसम आया हुआ हो। मैगी से लेकर डिग्री तक की जांच चल रही है। इत्ती तत्परता अगर पहले ही बरती गई होती तो शायद ये 'नौबत' ही न आती। मगर हम तो 'जब जागे तब ही सवेरा' के चलन पर चलने वाले लोग हैं। खामखा पेन क्यों लें?

मंत्रीजी की डिग्री भले ही फर्जी निकल गई हो लेकिन मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे कने डिग्री ही नहीं है। सारा झंझट ही खत्म। डिग्री लेने के लिए क्यों कॉलेज-विश्वविद्यालय को परेशान किया जाए। अब तो लोग इत्ता होशियार हो गए हैं कि आइआइएन की कथित डिग्री से काम चलाने लगे हैं। जब सबकुछ आइआइएन पर ही मिलने लगा है फिर भला ओरिजनल डिग्री का क्या करना?

एक मैं ही नहीं हर वो बंदा 'सुखी' है, जिसके कने डिग्री नहीं है। कम से कम सुकून की तो कट रही है। मंत्रीजी की तरह कोर्ट-कचहरी के चक्कर तो नहीं काटने पड़ रहे।

मुझे बिन डिग्री रहना मंजूर है मगर डिग्री के साथ रहना एक पल मंजूर नहीं। कभी कहीं पढ़ा था, डिग्री पास रहती है तो हार्ट-अटैक की संभवानाएं ज्यादा बनी रहती है। फिलहाल, मैं इन संभावनाओं से कोसों दूर हूं।