शुक्रवार, 12 जून 2015

आत्मा की धमकी

मैं जाने-अनजाने भी कभी 'आत्मा' के चक्कर में नहीं पड़ता। आत्मा का चक्कर है ही बुरा। हर समय भय-सा बना रहता है कि आत्मा हमारे साथ कब-क्या कर जाए! सच बोलूं, मुझे जित्ता डर बीवी से नहीं लगता, उससे कहीं ज्यादा आत्मा से लगता है। आत्मा चाहे मेरी हो या किसी दूसरे की प्रयास यही रहता है कि दूर रहूं। यही वजह है कि मैं किसी भी लेखक की न आत्मकथा पड़ता हूं न ही उस पर लिखता। अगले की आत्मा कब मेरे लिखे का बुरा मान जाए, क्या पता। इसलिए इस पचड़े में न पड़ता ही बेहतर।

लेकिन इधर कुछ दिनों से मैं अजीब-सी मुसीबत में फंस गया हूं। मेरी आत्मा को यह अच्छे से मालूम है कि न मैं उससे बात करता हूं न भाव देता। फिर भी, उसकी कोशिश हमेशा मुझे रिझाने की ही रहती है। मगर मैं ऐसा कोई मौका ही नहीं आने देता।

इधर मेरी आत्मा ने मुझे अपनी 'गिरफ्त' में रखने के वास्ते एक नया पासा फेंका है। बोली है- मेरे जाने के बाद मेरा फेसबुक अकाउंट वो ही चलाया करेगी। जैसे मैं हर रोज- किसी न किसी बात या मुद्दे पर- स्टेटस अपडेट करता हूं, मेरे बाद, यह सब अब वो (आत्मा) किया करेगी। हालांकि मुझे इस बात की फिकर नहीं कि मेरे जाने के बाद मेरे फेसबुक अकाउंट का क्या होगा- रहेगा या डेड कर दिया जाएगा।

किंतु फिकर इस बात की अधिक हो रही है कि क्या मेरी आत्मा मेरे स्वभाव के मुताबिक स्टेटस डाल पाएगी? जैसे मैं सोशल मीडिया पर हर वक्त 'कूल मूड' में रहता हूं, क्या मेरी आत्मा रहेगी? सुना है, आत्मा- चाहे किसी की भी हो- बहुत गंभीर और गुस्सैल टाइप होती हैं। बर्दाशत करने की क्षमता न के बराबर होती है उसमें। कब-किसके शरीर में घुसकर, क्या हाल कर दें, क्या भरोसा।

मैं मेरी आत्मा की सारी चालें समझ रहा हूं। वो अभी से तत्पर हो ली है, मुझे रास्ते से हटाने में। मेरे तईं हर रोज कोई न कोई संकट पैदा कर ही देती है। अभी तीन-चार रोज पहले की बात है, मेरे शरीर में अंबरीश पुरी की आत्मा बनकर घुस गई। बार-बार मुझसे मोगाबो खुश हुआ, मोगाबो खुश हुआ कहलवाए जाए। और तो और मोहल्ले की जिन लड़कियों को मैंने कभी निगाह ऊंची करके नहीं देखा, उन्हें छेड़ने-छिड़वाने-उठाने तक की हरकतें कर चुकी है। अब घर वाले मय बीवी मुझ पर शक करने लगे हैं। मेरे आने-जाने, मिलने-जुलने, उठने-बैठने, खाने-पीने का हिसाब-किताब मांगने लगे हैं। कई दफा उनको समझाया कि जो दिख या हो रहा है, उसमें मैं कतई शामिल नहीं हूं, यह सब आत्मा का किया-धरा है, लेकिन कोई सुनने-समझने को तैयार ही नहीं।

अजीब मुसीबत में फंसा दिया है मेरी आत्मा ने मुझे। न निगलते बन पा रहा है, न उगलते। अभी दो दिन पहले ही धमकी दी है कि मुझे भूकंप में निपटवा देगी।

बताओ पियारे यह हाल तो तब है जब मैं किसी आत्मा-परमात्मा के चक्करों में नहीं पड़ता। दूर ही रहता हूं। यह तो उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली स्थिति हो गई।

पानी अब सिर के ऊपर से निकलता जा रहा है, तो सोच रहा हूं, एक व्यक्तिगत पत्र मार्क जुकरबर्क को लिख ही डालूं। अब मार्क ही इस मुसीबत से छुटकारा पाने का मेरा अंतिम सहारा है। कहीं मेरा फेसबुक अकांउट आत्मा के हाथों में पड़ गया तो मेरी रही-सही इज्जत भी बेइज्जत हो लेगी। जब आत्मा से दो-चार हाथ करने ही हैं तो क्यों न सीना तानकर किए जाएं। ताकि बाद में किसी प्रकार का गम या पछतावा न रह जाए। है कि नहीं...।

कोई टिप्पणी नहीं: