बुधवार, 10 जून 2015

पत्नी का बेलन

मैं भगवान से डरता हूं न शैतान से मगर 'पत्नी के बेलन' से बहुत डरता हूं। इत्ता डरता हूं, पत्नी जब रसोई में रोटी बेलती है, तब मैं घर में नहीं होता। न जाने ऐसा क्यों होता है, पत्नी को मुझ पर तब ही गुस्सा आता है, जब वो रोटी बेल रही होती है। कई दफा मैंने पत्नी के इस व्यवहार को 'अगंभीर' तौर पर लिया लेकिन जब यह 'नियम' बन गया फिर मुझे खुद को बचाना ही पड़ा। आखिर मेरी खोपड़ी की सुरक्षा मैं नहीं करूंगा तो क्या पड़ोसी आनकर करेंगे।

ज्ञात रहे, पत्नी मुझ पर गुस्सा करने का कोई अवसर नहीं छोड़ती। कई बार तो एंवई गुस्सा हो जाती है। जब कारण पूछो तो कहती है- 'मेरी मर्जी, मेरा गुस्सा।' पत्नी को अपने गुस्सा पर उत्ता ही कांट्रोल नहीं है, जित्ता नेता को अपनी जुबान पर। हालांकि पहले मैं खुद को ही सबसे अधिक गुस्से वाला समझा करता था लेकिन पत्नी के गुस्से के आगे मेरा गुस्सा भी 'फीका' पड़ गया है। पत्नी का गुस्सा मुझ पर वाया बेलन उतरता है।

सच कहूं, मेरे पास ऐसा कोई 'रिकार्ड' नहीं, जिसकी बिनाह पर मैं बतला सकूं कि अब तलक पत्नी कित्ते बेलन मेरी खोपड़ी पर तोड़ चुकी है। बेलन पत्नी तोड़ती है, खरीदकर मुझे ही लाने पड़ते हैं। ये बेलन बनाने वाले भी न, पता नहीं कौन-सी लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, एक दफा बेलन के खोपड़ी पर पड़ते ही दिन-रात के तारे एक साथ दिखाई पड़ने लगते हैं। अब तो मेरे पड़ोसी भी मुझसे हर हफ्ते बेलन के टूटने का सबब पूछने लगे हैं। अब उन्हें क्या बतलाऊं अपना दर्द-ए-दिल।

यों तो पत्नी को मेरी हर बात पर गुस्सा आता है। पर सबसे अधिक गुस्सा उसे मेरे लेखन पर आता है। उसका कहना है- मैं हर वक्त घर में बैठे-बैठे सिवाय पन्ने काले-पीले करने के कुछ और खास नहीं करता। होऊंगा मैं बड़ा लेखक मगर उत्ता बड़ा नहीं जित्ता खुशवंत सिंह और काफ्का थे। उसका तो साफ कहना है- मुझे लेखक न होकर हीरो या क्रिकेटर होना चाहिए था। मेरी तुलना सलमान खान से कर, ताना मारती है, एक सलमान है, जिसने अपने दम पर केस में खुद को बचा लिया और एक तुम हो जिसे मेरे अलावा बाहर तो छोड़ो पूरे खानदान में कोई नहीं जानता।

अक्सर ऐसे मुद्दों पर पत्नी से बहस मैं इसलिए नहीं करता खामखां उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाए और मेरी खोपड़ी एंवई काम में आ जाए। इसलिए बचता हूं, जित्ता बच सकता हूं।

हो सकता है, मेरा दर्द सुनकर आपको खूब 'हंसी' आ रही हो लेकिन मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं, दुनिया मैं शायद ही ऐसा कोई पति रहा होगा, जिसकी खोपड़ी अपनी पत्नी के बेलन से 'सुरक्षित' रही-बची हो! वैवाहिक जीवन में एक दिन ऐसा अवश्य आता है, जब पत्नी का बेलन होता है और पति का सिर। चूंकि मैं भुक्तभोगी हूं इसलिए इस दर्द को अच्छे से समझ सकता हूं। बेलन पत्नी के लिए वो हथियार है, जिसके दम पर वो पति को पल भर में काबू कर सकती है। चाहो तो आजमाकर देख लो पियारे।

मेरी खपोड़ी ने भी अब शिकायत करना छोड़ दिया है। उसे मालूम है होना-हवाना कुछ नहीं है। पत्नी के आगे भला किसकी चली है। मैंने भी खोपड़ी को समझा दिया है, झेलो जित्ता झेल सकती हो। मेरी भी 'मजबूरी' है, न मैं पत्नी से अलग रह सकता हूं न खोपड़ी को अलग कर सकता हूं।

ओह! पत्नी रसोई में रोटी बनाने पहुंच चुका है। मेरी भलाई इसी में हैं कि मैं यहां से निकल लूं। पत्नी का कोई भरोसा नहीं उसका बेलन कब, किस क्षण मेरी खोपड़ी पर आनकर 'टन्न' से बज जाए।

5 टिप्‍पणियां:

Praveen Behl ने कहा…

वाह रस्तोगी जी ! वाह ! क्या व्याख्यान किया हे आपने हम मर्द जात की एक ऐसी मुसीबत का ! जिसका ना आज तक कोई तोड़ हे और शायद ना होगा !

बहुत बढ़िया !

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया ।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को? = रामप्रसाद विस्मिल को याद करते हुए आज की बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

प्रवीणजी, सुशीलजी एवं सेंगरजी,

व्यंग्य टिप्पणी देने व पसंद करने के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया।

Kavita Rawat ने कहा…


वैसे बेलन की मार के बारे में बहुत सुनते हैं लेकिन पड़ी कितनों को यह पता नहीं चलता .. ..
बहुत रोचक प्रस्तुति