सोमवार, 1 जून 2015

हाय! गर्मी, हाय! बत्ती

अखबार बतला रहा है कि गर्मी 'विकट' पड़ रही है। टेम्प्रेचर 44-45 से ऊपर डोल रहा है। विकट गर्मी की मार से इंसान तो क्या जानवर का भी जीना मुहाल है। हर कोई हाय गर्मी, हाय गर्मी चिल्ला रहा है। विकट गर्मी ने कूलर और एसी का भी 'बैंड' बजा दिया है। ऊपर से बत्ती का न आना या आकर बार-बार चले जाना भी, गजब ढाह रहा है। लोग कभी गर्मी तो कभी बत्ती को 'कोस' रहे हैं।

लेकिन मैं गर्मी और बत्ती दोनों को ही 'एंज्वॉय' कर रहा हूं। गर्मी और बत्ती के साथ 'धैर्य' बनाए हुआ हूं। मैं जानता हूं, गर्मी या बत्ती को कोसते रहने से तीव्रता दोनों में से किसी भी कम नहीं होनी वाली। न गर्मी अपने ताप से पीछे हटने वाली है, न बत्ती अपनी आदत से बाज आने वाली। गर्मी और बत्ती के लिए यही दो महीने होते हैं, अपने मन की करने के लिए। फिर क्यों न उन्हें अपने-अपने मन की करने दी जाए।

जाहिर-सी बात है, गर्मियों में गर्मी नहीं पड़ेगी तो क्या दिसंबर-जनवरी में पड़ेगी! क्या करें हम भी 'मजबूर' हैं, अधिक गर्मी और अधिक जाड़े को कोसते रहने के लिए। अमां, गर्मी और बत्ती से अगर इत्ती ही 'परेशानी' है तो क्यों नहीं 'हिमालय की चोटी' पर घर बना लेते। न वहां गर्मी का झंझट न बत्ती का ज्यादा रगड़ा। हर मौसम में चकाचक ठंड का मजा लो। दुनियावी से झंझटों से मुक्ति अलग से।

गर्मी जब पड़ती है, तब हम केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। उनके बारे में कतई नहीं सोचते, जिनका करोबार ही गर्मी-जाड़े-बरसात के साथ जुड़ा है। गर्मी का अपना 'ठंडे का बाजार' है। तो बत्ती का 'जनरेटर' का। न गर्मी, न बत्ती दोनों के ही अपने हाथ में कुछ नहीं। सबकुछ ऊपर वाले के हाथ में है। ऊपर से जित्ती बत्ती आएगी, उत्ती मिलेगी। ऊपर से जित्ती गर्मी छूटेगी, उत्ती झेलनी पड़ेगी।

यों, गर्मी और बत्ती का इत्ता पता न चले मगर क्या करें अखबार और मौसम विभाग वाले बात-बेबात डराते रहते हैं। अभी पढ़ा कि पारा 48 पार तक जा सकता है। अमां, जब जाएगा तब जाएगा। उससे भी निपट लेंगे। लेकिन क्या यह पहले से बताना जरूरी है? कौन-सा पहले से बता देने से हम बढ़ते पारे को रोक लेंगे? पारे पर भला किसका जोर चला है। पारा तो अपनी 'मन-मर्जी' करने के वास्ते 'कुख्यात' है।

मैं तो कहता हूं, जित्ती गर्मी पड़ रही है, पड़ने दो। जित्ती बत्ती जा रही है, जाने दो। बस धैर्य का दामन न छोड़ो। क्योंकि जो-जो जब-जब होना है, वो-वो तब-तब होएगा ही। होने-हवाने के बीच अगर ज्यादा हथेली लगाने की कोशिश करोगे तो हथेली से भी हाथ धो बैठोगे।

सो, एंज्वॉय गर्मी एंड बत्ती।

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जब तक जीने की चाह हो जीते रहें , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Vandana Singh ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है